मंगलवार, 15 मार्च 2016

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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

Heart shaped Flower

The Heart-Shaped Flower, Anthurium

Anthurium is a genus of about 1000 species of flowering plants, the largest genus of the arum family, Araceae. General common names include anthurium, tail-flower, flamingo flower and lace-leaf. The name comes from the Greek and means "flower-tail." And indeed the flower of this plant is unusual. On long peduncles blossoms white, pink or red slightly re-curved towards the veil - bracts. It is dominated by a straight or slightly arched, different from white to red head - small flowers inflorescence. Plant leaves are large, smooth and shiny, and the flowers stand out above them due to high stalk




मंगलवार, 25 मार्च 2014

श्वानो के आतंक पर बैठक २६ को


 श्वानो के आतंक पर बैठक २६ को 

रतलाम
                                  शहर में पिछले दिनों से चले आ रहे कटखने श्वानो के आतंक को दृष्टिगत रखते हुए श्री सेवा संस्थान कि पहल पर कार्य योजना बनाए जाने हेतु एक बैठक का आयोजन दिनांक २६ मार्च शाम ५ बजे  स्थानीय नागरिक विश्राम गृह प्रांगण में रखा गया है।
                                 उक्त जानकारी देते हुए संस्थान कि अध्यक्ष डॉ लीला जोशी ने बताया कि नगर की इस समस्या के प्रति विचार विमर्श कर स्थानीय एवं जिला प्रशासन को अवगत कराया जाएगा।
                                 अखिल भारतीय उपभोक्ता परिषद्, रेलवे रिटायर्ड ऑफिसर्स एसोसिएशन, सखी क्लब तथा जीवदया पर कार्यरत अग्रणी संस्थाए यथा पीपुल्स फॉर एनिमल्स, बर्ड्स वाचिंग ग्रुप, जीवदया समिति तथा गौशालाओ के प्रतिनिधि इस बैठक में भाग लेंगे।  नगर के प्रबुद्धजनो को भी बैठक में उपस्थित रहने का आग्रह किया गया है।

सोमवार, 10 मार्च 2014

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बुधवार, 5 मार्च 2014

आधुनिक गाथा

वीर एवं महापुरुषों कि गाथाए अक्सर हमने पढ़ी -सुनी है।  ये गाथाए इतिहास के पन्नो पर उल्लेखित हैं।  अब मैं जो लिख रहा हूँ यह गाथा एक विद्यार्थी परिवार की  है।  आधुनिक व्यवसायिक युग में यह गाथा गाई जा सकेगी, इसलिए इसे गाथा कह रहा हूँ।
एक छोटे गाँव में एक विधवा रहा करती थी।  पति कि जो थोड़ी सी जमीन थी बस यही आसरा उसके गुजर बसर के लिए शेष बचा था।  दो लड़के और दो जुड़वाँ बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी के चलते उसे मजदूरी भी करना पड़ती थी।  खेत को उसने बटाई पर दे रखना उचित माना था।  सभी बच्चे छोटे थे जुड़वाँ बहने तो गोद में ही थी।  बड़ा बच्चा कोई ६ बरस का तो छोटा ४ बरस का ही तो था जब उसके पति का बिमारी के चलते निधन हो गया था।  परिवार के बड़े पहले ही चल बसे थे और दूसरा कोई आसरा न था।
बच्चे बड़े हो रहे थे।  स्कूल  जाने कि उम्र हो चली थी मगर उसके पास उन्हें पढ़ाने के बारे में सोचने तक कि गुंजाईश  नहीं थी मगर बच्चे पढ़ना चाहते थे।  वे जानते थे कि फाकाकशी में दिन काटने कि मजबूरी में माँ उन्हें पढ़ाने का जिमा नहीं ले पाएगी।  कई बार गाँव के लोगो को भी इस बारे में बात करते शब्द उनके कानो में जो पड चुके थे कि गरीब विधवा किस प्रकार इनका जीवन निबाहेगी, कैसे इन्हे पढ़ा लिखा पाएगी?
एक दिन निश्चय कर वे अपनी शिक्षा के बारे में पता करने पास के गाँव में लगने वाले प्रायवेट विद्यालय में जा पहुंचे।  वहाँ अपने प्रवेश की चर्चा उन्होंने प्रधानाचार्य से की।  प्रधानाचार्य स्कूल संचालन कि गतिविधि से पृथक थे सो उन्होंने अनभिज्ञता जताते हुए स्कूल संचालक से इस बारे में बात करने को कहा।  स्कूल संचालक का निवास गाँव में ही था सो वे उनके घर चले गए मगर स्कूल संचालक घर पर नहीं थे किसी काम से गए थे यह जानकार उन्होंने उनका इंतज़ार करने की ठानी।  शाम को जब स्कूल संचालक महोदय घर पहुंचे और उन्हें  मालूम हुआ कि दो नन्हे बच्चे उनके इंतज़ार में दोपहर से भूखे बैठे है।  उन्हीने तुरंत उनसे मिलने का फैसला किया।  गरीबी में कट रहे दिनों के बावजूद बच्चों का पढ़ाई के प्रति रुझान जानकर वे खुश हुए और जिस सेवा भाव से उन्हीने गाँव में स्कूल चलाने कि सोची थी उसकी परीक्षा का भी ये समय था।  वैसे भी गाँव में तब पढ़ाई के बारे कोई सकारात्मक रवैया होता न था और स्कूल चलाना खुद संचालक की परीक्षा ही होता था ऐसे में बिना किसी फीस के पढ़ाना बड़ी कठीन बात थी।  बच्चे स्कूल कि फीस के बदले स्कूल के काम मसलन साफ़ सफाई, पानी भरने जैसे काम को राजी थे यह जानकर वे अचंभित थे।
बच्चो को खाना खिलाकर उन्हें उनके गाँव में पहुचाने का बंदोबस्त कर उन्होंने बच्चों से कहा कि कल तुम अपनी माँ को साथ लेकर वापस स्कूल आना।  अभी तुम इनके साथ अपने गाँव जाओ तुम्हारी माँ को तुम्हारी चिंता हो रही होगी क्योकि तुम उन्हें कुछ भी बताकर जो नहीं आये हो।
अपने गाँव पहुंचते उन्हें रात हो आई थी।  विधवा माँ को चिंता हो आई थी कि न जाने ये बच्चे कहाँ चले गए है।गाँव के किसी व्यक्ति ने उन्हें गाँव से बाहर जाते देखने कि बात से तो वो और भी अधिक चिंतित हो उठी थी। बच्चे किसी बड़े व्यक्ति के साथ घर लौट आये तो घर पर मातम सा माहौल जान पड़ा।  बिना बताये घर से पता नहीं कहाँ , ना जाने कहाँ जाने का डर जो हो आया था।  किसी बड़े आदमी के साथ घर आने पर जब सारी बात विस्तार से पता चली और अगले दिन वापस पड़ोस के गाँव में जाने कि आवश्यकता समझते हुए माँ का ह्रदय पिघल सा गया था।
ना जाने कैसे कैसे पापड़ बेल कर आ गए थे उसके नासमझी कि उम्र के बच्चे ये जानकार उसने अपने लाडलों को भरपूर चूमा मगर काश ये बच्चे घर पर बता जाते तो शायद ऐसा कठीन वक्त उन पर ना गुजरता।
अगले दिन कुए से पानी लाकर बच्चों को नहलाया खुद भी स्नान कर बच्चों को धुले कपडे पहनाकर स्कूल जाने निकल पड़ी।  अनपढ़ गरीब विधवा सोच रही थी घर में मरद के ना रहने के बारे में।  वो किन बातो को पूछेंगे और वो कैसे जवाब दे पाएगी आदि बातों ने उसे व्याकुल कर रखा था।  बच्चों कि पढ़ाई का बंदोबस्त भी उसकी समझ के बाहर था।  फिर भी बुलावे पर उसे जाना ही था।
स्कूल पहुंचकर इस माँ ने अपने बुलवाये जाने कि बात कही।  स्कूल संचालक महोदय के आने तक उसे इंतज़ार करने को कहा गया।
स्कूल संचालक जब स्कूल आये और बच्चों को अपनी माँ के साथ बैठा पाया तो वह उसे अपने कक्ष में ले गए।  बच्चो के पढने की ललक जानकर बच्चों का प्रवेश निशुल्क कर दिया गया। पढ़ाई के लिए लगाने वाली सामग्री भी स्कूल से ही उपलब्ध करवाए जाने का निर्णय हुआ।  बच्चों के काम करने कि बात भी हुई और इतना स्वाभिमान इस छोटी उम्र में होने कि बात हुई और फिर इन बच्चो से काम न कराया जाने का आदेश भी दिया गया।
बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए और सरकारी नौकरियों में लग गए।
एक दिन स्कूल के प्राँगण में पुलिस अफसर की गाडी पहुँचने की खबर से सारा गाँव अचरज में था।  नए प्रधानाचार्य हांफते दौड़ते गाडी पर आ पहुंचे।  स्कूल संचालक जी के बारे में पूछा जाते ही चपरासी दौड़कर घर खबर दे आया। सब कुछ तुरत फुरत और इतना तेजी से घटित हुआ कि जब तक रमेश अपने भाई बहनो के साथ गाडी से उतरता स्कूल संचालक स्कूल आ पहुंचे थे।  चारों भाई बहन आगे बढकर उनके पैर छूने लगे जानकर थोड़ी सी राहत महसूस हुई।
बूढ़ा चुकी आँखों में अपने सम्मान के प्रति कृतज्ञता और विस्मय के भाव भरे थे।
रमेश सिंह ने कहा जो पुलिस कि वर्दी में था - क्या आपने हमें पहचाना , सर ?
फिर थोड़ी चुप्पी जानकार उसने बात आगे बढ़ाई।  सर मई आपका रामू  . फिर हाथो के इशारे से दिखाते हुए बोला ये राधु है, ये पुष्पा और कविता।  आपके आशीर्वाद से आज हम इस मुकाम पर हैं।
"चलो कक्ष में चलते है " स्कूल संचालक ने कहा।
सभी कक्ष में पहुंचे और बातचीत का दौर चल पड़ा। प्रधानाचार्य जो अब कोई नए व्यक्ति थे से अपने शिक्षको के बारे में चर्चा की।  फिर स्कूल संचालक महोदय की मदद के बारे में बताया।
अपने जेब से एक लिफाफा निकालकर उन्होंने स्कूल संचालक महोदय को दिया और कहा कि ये मेरी पहली तनख्वाह है।  भाई बहनो ने भी इसी तरह अपनी पहली तनख्वाह उनके हाथ में धर दी तो वातावरण इस श्रद्धा के प्रति नतमस्तक हो गया।  एक सन्नाटा और गर्व से भरी खामोशी वहाँ महसूस कि जा सकती थी।
स्कूल संचालक कि आँखे नाम हो आयी थी वे शून्य में डूब गए थे।
रमेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा - " सर ! स्कूल का हैम पर उपकार है ही मगर उससे बड़ा क़र्ज़ भी हमारे सर पर अभी है।  हैम कभी उऋण तो हो नहीं पाएंगे मगर जिस तरह हमारी मदद में आपने अपने हाथ बढाए थे वे और भी ताकतवर बन खड़े हों इसके लिए हमारी और से ये तुच्छ भेंट के स्वरुप में १५००० रुपये रखने का आग्रह है।
गरीब विधवा कि इन संतानों ने संस्कारों को जीवंतता प्रदान कर दी थी यह जानकार उनके द्रवित ह्रदय से आशीर्वाद बरसने लगा था।  उन्होंने कहा - तुम धन्य हो।  तुम्हारी माता धन्य है।  मेरी सेवा के मोल मे मै तुम्हारे ये पैसे नहीं ले सकता। ……
वे आगे कुछ भी कहते रमेश पैरो में झुक गया और बोला - " यदि आप हमारी निष्ठा का समर्पण यदि नहीं लेंगे तो हैम सिर  उठाकर जी न सकेंगे।"  राधु बोला - "ये गुरु दक्षिणा रख लीजिये श्रीमान।  हमें अब यही आशीर्वाद स्वीकार होगा कि आपने हम जैसे अन्य बच्चों के उत्थान में हमें आशीर्वाद दे दिया उक्त राशि स्वीकार कर।" पुष्पा बोल पड़ी - " शिक्षा का दान तो वैसे ही सर्वोपरि होता है मगर हमारी सक्षमता आपकी और विद्यालय कि देन  है।  उसकी दक्षिणा समझ कर ये स्वीकार करे। मगर कविता ने तो हद कर दी।  कहने लगी " विद्या और आपका क़र्ज़ चुका पाना हमारे बस का नहीं है अगर आपने यह दक्षिणा स्वीकार नहीं की  तो अगले माह मै अपनी होने वाली सगाई से इंकार कर दूंगी और आजन्म विवाह नहीं करुँगी।
क्या करते स्कूल संचालक।  ऐसे गुनी विद्यार्थी पाकर वे नट मस्तक जो थे।












रविवार, 5 जनवरी 2014

सुश्री डॉ. लीला जोशी

सुश्री  डॉ. लीला जोशी
पिता–स्व. श्री जमनादत्त जोशी
माता –स्व. श्रीमती पार्वती जोशी
जन्म स्थान – रतलाम
जमनादतजी के 8 बच्चो में तीसरा स्थान
प्राथमिक शिक्षा - रतलाम के रेल्वे स्कूल से
माध्यमिक एवं हाई स्कूल -  गंगापुर सिटी 1954
ईटर साईंस  - महारानी कॉलेज, जयपुर 1956
मेडिकल शिक्षा - एम.जी.एम. कॉलेज, इन्दौर 1961
22 वर्ष की उम्र में रेल्वें के शासकीय सेवा में सन १९62 में असिस्टेंट सर्जन के रूप में नौकरी प्रारंभ की । पहली  पोस्टिंग कोटा में रही । तत्पश्चात 29 वर्ष कोटा में निरंतर प्रमोशन पाते हुए मेडिकल  सुपरिटेन्डेंट तक का सफर तय किया, फिर  91 में  एग्जीक्यूटिव (हेल्‌थ)डायरेक्टर के रूप में प्रमोशन पाकर रेल मंत्रालय दिल्ली में पदस्थ हुई। वहां से मुम्बई आकर मेडिकल डायरेक्टर का पद संभाला, अन्त में गुवाहाटी आसाम से चीफ मेडिकल  डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत हुई। उल्लेखनीय है कि रेलवे में प्रथम महिला चिकित्सक कहलाने का सौभाग्य है जब लेप्रोस्कोपी सर्जन के रूप में आपने काम किया।
नौकरी करते हुए प्रत्येक लेवल पर अवार्ड मिलते रहे,  जिनमें विशिष्ट सेवा पदक जो रेल मंत्रालय द्वारा रेल्वें  सप्ताह में मिला। उन तमाम अवार्डो की संख्‌या लगभग 10 रही। महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी अभिरूची को ये अवार्ड समर्पित रहें।
रेलव के हर लेवल के अकादमीक कार्यों का प्रमोशन करने का नियम रखा। इसके चलते हुए इन्टरनेशन लेवल पर मेक्सिको में आपका शोध पत्र प्रस्तुत किया गया।सिंगापुर और वाशिगटन में रिसर्च पेपर पढ़ने का मौका मिला। उक्त कार्य शासकीय सेवाओं से पृथक कार्य है ।
सत्तर के दशक में फेडरेशन ऑफ़ ऑब्स्ट्रेटिकस एंड गायनेकोलॉजिकल सोसायटी से जुड़ी।अपने सेवा काल के दौरान रतलाम, कोटा और देहरादून में ऑब्स्ट्रेटिकस एंड गायनेकोलॉजिकल सोसायटी का गठन कर रास्ट्रीय सोसायटी के मेन स्ट्रीम से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। फॉग्सी के इस गठन से लोकल लेवल पर कार्यरत स्त्री रोग विशेषज्ञों को राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म मिला।
फिर जन्म स्थान रतलाम की ओर अचानक 1997 में रूख किया और जैन दिवाकर हॉस्पिटल की शुरूआत में शामिल होकर  इसे स्थापित किया। यहाँ शिविरि लगाकर लगातार निःशुल्‌क सेवाओं को गतिमान किया।
गुवाहाटी में पदस्थ रहते मदर टैरेसा से मुलाक़ात होने का विशेष संयोग रहा। मदर टैरेसा गुवाहाटी में एड्‌स रोगियों के लिए विशेष आवासीय व्‌यवस्था के उद्‌घाटन समारोह में आई थी, और उनके मुलाकात के दौरान उन्होंने सुश्री डॉ.लीलाजोशी का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा हमें आपके जैसे सेवाभावी चिकित्सकों की  आवश्यकता है। उनके इन शब्‌दों में जैसे जादू भरा था। उनके स्पर्श ने विगत स्मृतियों में आदिवासी महिला की रक्ताल्पता से हुई मृत्यु को स्मरण कराया, और जीवन को नई दिशा सेवा मूल्य को समझने के लिए दी।
रतलाम आकर लगाए जा रहे शिविरों में मूलतः ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय का विशेष ध्यान रखा गया।

फिर २००३ में स्थापना हुई आदि सामाजिक सेवा संस्थान की।  इसमें राजमल जी जैन एवं विमलचंदजी जैन एवं अन्य सदस्यों ने रूचि ली। गर्भावस्था के दौरान कई महिलाओं में रक्ताल्पता  के लक्षण और मातृ मृत्यु को लगातार भुगतना पड़ा, जिससे विचार उपजा कि रक्ताल्पता को किसी प्रकार नियंत्रित किया जाए। इसके लिए  रक्ताल्पता को स्कूल लेवल पर ही चिन्हित किया जाना तय हुआ और श्री सेवा संस्थान के रूप में रक्ताल्पता मिशन की शुरूआत हुई। 2003 में गर्भवति माताओं के लिए खुराक में आयरन की दवा, निःशुल्‌क चेक अप तथा पोष्टिक आहार वितरण  की शुरूआत की गई। यह तमाम व्‌यवस्था समाज के डोनेशनसे चलती आई है, जो निरंतर चल  रही है मगर रक्ताल्पता को इस स्तर के पहले  ही नियंत्रक में लेना आवश्यक जाना। इसके लिए जिला चिकित्सालय में भरती गर्भवत्तियों तक आहार एवं दवा पहुँचाना लगातार जारी है, फिर भी गर्भवती माता  के स्तर के पूर्व ही लड़कियों में रक्ताल्पता पर नियंत्रण होना चाहिए यह विचार रहा। 2007 में स्कूल के लेवल पर आदिवासी छात्रों तक आना जाना और उन्ही के स्थान पर जाकर रक्ताल्पता के कारण जानकर उनका निराकरण करने के लिए शरीर के लोह तत्व को बढ़ाना लक्षित हुआ। शासकीय अस्पतालों से दवाई लाना हर छात्र की डिमांड बन रही थी। इसके लीए उन्हीं के विद्यालय में आयरन की गोलियाँ वितरित होना चाहिए इसके लिए रतलाम ऑब्स्ट्रेटिकस एवं गायनेकोलॉजिकल सोसायटी तथा मुख्य जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से चर्चा करना तय हुआ।बच्चों का रक्त परीक्षण करना एक महत्ती जरूरत होने के बावजूद शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग के स्कूलो में शिविर लगाना समस्या बना रहा। दूरस्थ स्थानों पर जाने आने तथा सेवाओं की उपलब्‌धता की आवश्यकता रही। विभिन्न  सामाजिक संस्थाओं का रूझान इस ओर मोड़ने की आवश्यकता थी, डोनर्स की जरूरत थी। संस्था के सदस्यों ने अपनी सेवाओं के साथ आर्थिक जरूरतों को भी पूरा करने में कसर नही रखी।
श्री सेवा संस्थान के अध्यक्ष के तौर पर सुश्री डॉ. लीला जोशी ने अपने अभियान को लगातार दिशा दी अपने इस अभियान से पोष्टिकआहार के जरिये 30,000 गर्भवती माताएं, आयरन टेबलेट और दवाओं के जरिए स्कूली  छात्र लगभग 2,50,000  तत्पश्चात आई.वी. आयरन सुक्रोज के लिए  केम्प की शुरूआत कराकर प्रतिमाह सरवन में 200 गर्भवती माताओं को लाभ दिलवाया गया। अब तक लगभग 2150 माताएं लाभ ले चुकी है ।
दवाओं केलिए जिला प्रशासन तथा स्वास्थ्य विभाग ने अपना सहयोग जारी रखा है, जबकि वाहन व्‌यवस्था स्वयं संस्था को या सामाजिक संस्थाओं के सहयोग मिलता रहा है। पोष्टिक आहार, समाजसेवीजनों से प्राप्त सहयोग पर निर्भर है।
संस्था का ऑडिट प्रति वर्ष किया जाता है और प्रत्येक इवेंट के प्रति जिला  प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास, शिक्षा एवं आदिवासी विकास विभागों को सूचना दी जाती है ।
स्कूलो में शिविर लगाए जाने में विभागों का सहयोग प्रशंसनीय रहा है, उल्लेखनीय है कि पूर्व पुलिस अधीक्षक डॉ. रमनसिंह सिकरवार साहब  ने नगर सुरक्षा समिति के माध्यम से एनीमिया गतिविधि में उपयोगिता दर्ज की ।
शासकीय सहयोग अप्रत्यक्ष मिलता रहा, जबकि आर्थिक गतिविधियां संस्था को स्वयं ही संचालित करना अनिवार्य रही है ।
संस्था के निरंतर गतिमान रहने के साथ अपना अनुसंधान लगातार जारी है। सीमित क्षेत्रों में कार्यरत रहने के साथ संस्था द्वारा सम्पूर्ण जिले में रक्ताल्पता अभियान में गति लाने के प्रयास जारी है । सरवन के अतिरिक्त, बाजना, रावटी, शिवगढ़ डिस्पेंसरिज में प्रतिमाह 4 से 5 कैम्प की जरूरतों का आंकलन किया गया है। इसके लगने से गर्भवती माताओं का स्वास्थ्य सुधार तो होगा ही, साथ ही बच्चों में कुपोषण भी कम होगा ।
वर्तमान में कुपोषित माता  से उत्पन्न नवजात के प्रति भी आई.वी. आयरन सुक्रोज इंजेक्शन की जरूरत महसूस की गई है।
स्वास्थ्य विभाग एवं जिला  प्रशासन से इस बाबत्‌ चर्चा की आवश्यकता महसूस की जा रही है ।
श्री  सेवा संस्था सम्पूर्ण जिले को एनिमिया फ्री करने के प्रति संकल्पबद्ध है । इसमें पोष्टिक आहार,12/12/12  तथा  आई वि आयरन सुक्रोज का अभियान जारी रखे हुए है। मातृ मृत्यु दर, कुपोषण तथा विकलागता के नियंत्रण में इन अभियानों का अपना महत्व  है। संस्था की गतिविधी में शासकीय सहभागिता की जरूरत है  । सम्पूर्ण प्रदेश में इन अभियानों की आवश्यकता को देखते हुए स्वयं सहायता समूहों को इस प्रकार की ट्रेनिंग तथा विशेषज्ञ सुविधाओं के जरिये स्वस्थ भारत का स्वप्न संस्था का उद्धेश्य है ।