सोमवार, 28 जुलाई 2008

समाज सेवा का जज्बा

श्री वरुण कपूर लगभग ५ वर्ष पूर्व रतलाम में एस पी के पद पर रतलाम आए । मेरा उनका परिचय बस वैसे ही हो गया । नगर सुरक्षा समिति की बैठक में मेरा प्रस्ताव था की नगर में रूबेला टीकाकरण का आयोजन किया जाना चाहिए , मुझसे इस सम्बन्ध में ऑफिस आने को कहा गया तो मैं वहां विस्तार से चर्चा करने पहुँचा ।
उन्होंने २५००० रुपये देने की बात की और कार्यक्रम किए जाने को प्रोत्साहित किया । पर मैं तो पहले ही सारी तैयारी किए था सो मैंने उनका ऑफर मना किया और पैसे की व्यवस्था के सम्बन्ध में तत्कालीन डी डी पी श्री के एन जोशी को फोन लगाने और कार्यक्रम को शासकीय तरीके से करने की चर्चा की। यह हमारा पहला कार्यक्रम था। इसमे २००० किशोरावस्था में आई लड़कियों को वेक्सिनेट किया जाना लक्षित था। फ़िर कई गरिमामय कार्यक्रम रतलाम में हुए और बाढ़ सी ही आ गई । नित नए विचार और सभी को प्रोत्साहन श्री कपूर का जज्बा रहा और एक पुलिस अफसर का समाज सेवा से जुड़ना शहर की विशिष्ट गतिविधि बन गया ।
इस दौर में प्रिंस चार्ल्स के मेहमानों में उनका शामिल होना आदि नगर में इतिहास रहा । और उनके घर में दुसरे नन्हे का आगमन भी यहीं हुआ । फ़िर प्रमोशन लेकर वे डी आई जी छतरपुर बने और लगभग एक वर्ष बाद पुनः रतलाम मंदसौर नीमुच डी आई जी रेंज के लिए रतलाम पदस्थ हुए ।
पूर्ववत स्नेह के चलते गतिविधियाँ पुनः प्रारम्भ हुई जिसमे टेनिस असोसिएशन का गठन और स्पर्श चिकित्सा से मेरा जुडाव हुआ । स्पर्श चिकित्सा के लिए मसूरी से प्रसिद्द वैज्ञानिक डॉ मुल्कराज दास जो नासा को छोड़कर इस पद्धति से लोगों का उपचार कर रहे है, रतलाम बुलवाए गए थे । सात दिनों के इस शिविर को आज भी लोग याद करते हैं जिसका सम्पूर्ण दायित्व मुझे सौंपा गया था।
एक पुलिस अफसर में समाज सेवा का जज्बा बिरला अनुभव है । अपने रूटीन को छोड़कर जनता को पोजिटिव एनर्जी देना शायद ही कहीं और हुआ हो मेरी नजर में, मुझे अवसर मिला, यही क्या कम कम है ?

सेवा के पग

श्री सत्यनारायण भटनागर हिन्दी साहित्य जगत की जानी मानी हस्ती है ।
आपका साहित्य देश के किसी भी कोने में हर रोज़ कहीं न कहीं छपता जरूर है।
सम सामयिक हो राजनीती चाहे अध्यात्म या फ़िर कोई बच्चों की कहानियाँ उनकी लेखनी में ये सब शामिल है।
उनके विचार अधिकतम लोगों तक पहुंचे ऐसी भावना उनकी रहती है। कृतित्व के धनि ये महामना अब हमारे पारिवारिक सदस्य बन गए हैं । गत वर्ष आपने वृद्धाश्रम के निवसियों को हर माह एक दिन का भोजन अपनी और से स्वीकृत किया है सेवा का पर्याय बनने के लिए उन्हें धन्यवाद !

रविवार, 27 जुलाई 2008

मुलाक़ात

अजहर हाशमी सर की कविता
बेटियाँ पवन दुआये हैं
मध्य प्रदेश की दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल हो गयीं है।
इस बात की बधाई देने मैं कल उनसे मिलने को गया
उनकी प्रसन्नता इस बात को लेकर थी की जिन लेखकों को उन्होंने
बचपन में पढ़ा है उनके साथ यह कविता उन्हें सम्मान दे गई
हाशमी साहेब को धन्यवाद् की गुरुजनों का आदर उनके मन में विद्यमान है।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

असल प्रार्थना करें

बरसात दगा दे गई अबकी बार फिर ।
ढोल , नगाडे बजाने लगे । देवालयों में शिवलिंग पानी में डुबोये जाने लगे । मजारों पर चादरें चढाई जाने लगीं ।
कोई भी तो असल प्रार्थना नहीं कर रहा था । पेड़ काट दिए गए थे भरचक गर्मी में , पौधारोपण कर फोटो खिंचवाए गए थे , जंगल घटा ही हैगोचर भूमि को भी नहीं छोडा गया है संपत्ति विस्तार के निमित्त ।
अब भी उम्मीद में हूँ कि असल प्रार्थना शुरू होगी । पर्यावरण कि ही रक्षा होगी।

मुहब्बतें खामोश हो गयीं

बचपन का साथ
वो याराना
सब हवा हो गया
माँ पिता भाई
बहन का प्यार
सब बेगाना हो गया
चाहत दीवानगी
सब ऐसी हो गई
की सिर्फ़ और सिर्फ़
पैसे से प्यार हो गया
ढूंढ रहा हूँ
मुहब्बत की मंजिल
तो पाया के सब कुछ
मुझसा ही तो हो गया
मिलेगा अब हम सफर कैसे
दुआ की तो पाया
फ़िर एक बच्चा कहीं
दूर मैदान से दौडा आया
लहराया प्यार
लुटाया दुलार
पर जैसे ही देखा
माँ बाप को उसके
लगा
मुहब्बतें
खामोश हो गयीं।


गुरुवार, 24 जुलाई 2008

हमारा सिविक सेंस

कल बैठा था की एक मित्र राजेंद्र अग्रवाल अपने मकान के निर्माण की सामग्री का आदेश देने मुकेश जी के यहाँ पहुंचा जहाँ मुझे अशोक गंगवाल जी का इन्तजार था। बातो ही बातो में उसने मुझे कालोनी में बन रहे मकान का हवाला दिया और बताया कि एक सज्जन अपने निर्माणाधीन मकान पर एक करोड़ रूपया खर्च कर चुके हैं । उसीने यह भी बताया कि मकान के चारों ओर इन सज्जन ने अतिक्रमण करके तीन तीन फीट छत बाहर निकाल ली है।
मैं दंग था , अगर करोड़ों हैं तो एक सुंदर मकान मर्यादा में क्यों नहीं बन रहा। आखिर कब जागेगा हमारा सिविक सेंस ..................................................

भोजन करना चाहिए ........ जरूर............

बचपन ही से मालवा की सौंधी गंध वाली भाषा , ग्रामीण क्षेत्र में आते जाते रहने और मकान मालिक के जैन धर्मावलम्बी होने से कानो में पड़ती रही और हम बचपन ही से हिन्दी, अंग्रेजी केa साथ-साथ मालवी भाषा सीख गए जबकि हम है मराठी भाषी परिवार से। पिताजी गुजरात के वडोदरा शहर के होकर उच्च शिक्षा इंदौर से लिए हैं । नौकरी की शुरुआत उन्होंने इंदौर नगर पालिका में ओव्हर्सियर तथा बाद में हाऊसिंग बोर्ड में अधिकांश समय रतलाम रह कर पूरी की। हाऊसिंग बोर्ड यानी मेरे पिताजी श्री मोहनराव घोटीकर ऐसी छवि उनकी यहाँ लंबे समय तक रही। हमारा जनम रतलाम जिले का ही है , जिले के गाँव पिपलोदा जो अब ब्लाक है और नानीजी और माँ की कर्म स्थली रहा है हमारा जन्म स्थल है।मिटटी की सौंधी खुशबू ,अमराइयां,कुवें की रहट, दूर दूर तक बिछे खेत हमारी जिन्दगी का यादगार हिस्सा हैं। कोई के साथ यहाँ की संस्कृति और ग्रामीण परिवेश ने हमें यहीं का बना डाला है । मैं अपनी नौकरी छोड़ व्यवसाय करते वक्त जब श्रेष्ठी जनों के संपर्क में आया तो पहले पहल वे मेरी भाषा पर पकड़ की वजह से समझ नही सके की मैं कोई महाराष्ट्रियन व्यक्ति हूँ। मेरा कई घरों में आना जाना रहा और फ़िर रोटरी क्लब रतलाम सेंट्रल को सेवाएं देने का अवसर कई स्थानीय लोगों के नज़दीक ले आया और मेरी भाषा मुझे सबका स्नेह पात्र बनने में सक्षम बनाती है ।आशा जी जातिवाद पढ़कर आपने सुझाया अतः लिख रहा हूँ । मैं अमूमन किसी के घर जाने से बचता हूँ परन्तु जब कभी भी जाना होता है तो मेरा पेट फूलकर गुब्बारा हो जाता है खा-खाकर । आप हैरत करेंगी की लगातार कोईनई वैरायटी या मिठाई, चाय, ठंडा सामने रखकर मनवार और कसमें फ़िर बस ये आखिरी है अब और कुछ नही लायेंगे । मैंने एक बात गांठ बाँध ली है वह की जो व्यवहार अपने लिए पसंद न हो उसे दूसरों से न निभाओ सो मेरे यहाँ आने वाले से मैं अत्यधिक मनवार नही करता और साथ ही यह जताना नहीं भूलता की आपका स्नेह अति कष्टकारी रहता है जो स्वेच्छापूरक आप ग्रहण करें मुझे अच्छा लगेगा यदि आप स्वेच्छा से आपकी कोई पसंद ही बता दे तो। जो और जैसा कष्ट आप के स्नेह का मैं भुगतता हूँ वैसा आप न भुगतें।

मुझे कई दफा यह भी अहसास रहता है कि सारी दुनिया भोजन पर टिकी हुई है । भरे पेट कि भूख शायद अधिक तीव्र होती है। और एक गृहिणी के बनाए पकवानों की तारीफ अनिवार्य होती है , इससे महिलाये प्रसन्न होती हैं सो आनंद के क्षणों को प्रदान करने का श्रम त्याज्य नहीं है चाहे अधिक भोजन से आपको कष्ट ही क्यों न हो ?

अब कृपया यह न लिख दीजियेगा कि पेट तो आपका ही है और संयमित जीवन की परीक्षा हम महिलायें भोजन से ही करती है।

सोमवार, 21 जुलाई 2008

जातिवाद

बचपन के दिनों से मुझे याद रहा है कि सर्वधर्म समभाव की भावना तथा ऊँचनीच का अन्तर न होना हमारी शिक्षा के मजबूत पहिये थे तथा सबके हित में कार्य करने कि प्रेरणा उसका केन्द्र बिन्दु हुआ करती थी।

समाज में श्रेष्ठ मने गए ब्राम्हण कुल में जन्म के बावजूद घर में भी कभी श्रेष्ठता-हीनता पर कोई वार्तालाप सुनाई नही दिया। स्कूल में छोटे कद कि वजह से अग्रिम पंक्ति में मुझे बैठाया जाता रहा। मन लगाकर पढने कि वजह से मेरी छबी विशिष्ट छात्र के रूप में हो गयी थी, इस वजह से अन्य छात्र साथ रहने को उत्सुक रहते थे। गुमसुम रहने के कारण मेरी नज़र में वह विशिष्ट बन गया था । स्कूल के मध्यांतर में उसकी मदद के लिए भी मन रहता। इस मदद कि वजह से उससे नजदीकी हो गई थी। मेरी मदद से उसका आत्म विश्वास बढ़ने लगा था। वह मुखर होने लगा था। फ़िर गाँव में कैसे बसर होती है,मछली या तोते कैसे पकड़ते हैं आदि बातें मुझे बताता जो मुझे उत्सुक बना देते कि वाह इसकी दुनिया भी! खेती और जमीन कि जानकारी उसीने मुझे दी। उसकी गरीबी के हालत भी मुझे मालूम हो चले थे। उसकी मदद से तो बाकि दोस्त खुश होते पर नजदीकी उन्हें अच्छी नही लगती थी। कभी कभी वो घर भी आने लगा और होम वर्क कर चला जाता, इससे मेरी धाक मुहल्ले के लोगों में बढ़ने लगी और सदाचरण का वास्ता मुहल्ले के अन्य बच्चों के बीच प्रेरणा बना दिया गया था। मैं अपना होम वर्क अपने से बड़ी कक्षा में पढ़ रहे दोस्तों के साथ किया करता और उनका रिविज़न मैं कराता उनका सहायक बनकर पर इससे मुझे एडवांस में ही अगली कक्षा के विषय याद हो जाते यही मेरी विशिष्ट योग्यता बन गयी। छठी में पढने के बावजूद आठवीं कि गणित को सुलझाना मेरे लिए कठिन नही रहा था और फ़िर अगली कक्षा के छात्र मेरी मदद लेने लगे थे। बैंक परीक्षा में जुटे मेरे सीनियर दोस्तों का लॉजिक भी मेरे लिए आसान था जबकि मैं दसवीं का छात्र था।

मेरा वो मित्र दुसरे विषय का छात्र था पर कभी कभार मुझसे मदद के लिए आता रहता था और मुहल्ले के सीनियर मेरी मदद लेते देखकर उसे हैरानी होती थी। उसने मेरा पैटर्न अपना लिया था। गरीब परिवार का यह दोस्त ग्यारहवीं पास कर नौकरी पर लग गया। मैं भोजन कर रहा कि अचानक एक दिन महीनो बाद आकर उसने मुझे चौंका दिया था उसकी नौकरी कि बात बताकर। अपनी कमाई से खरीदी साईकिल पर बैठाकर वो मुझे अपने घर ले गया। उसके आत्मविश्वास से मैं दंग रह गया था। खेत के पास बने कच्चे घर पर उसने माँ को पुकारा जो मिटटी सने हाथों में तुंरत बाहर आगई, उसकी झुर्रीदार शारीरिक रचना, पके बाल और केसरिया साड़ी मुझे अब भी याद है। उसने बताया था माँ को कि यही वो दोस्त है जिसने उसकी हर मोड़ पर पढ़ाई में मदद की है। मुझे याद है उसकी माँ का वो ममतामयी स्पर्श और नम आँखें। उसका आग्रह था कि मैं भोजन उसके साथ करके जाऊँ जबकि भोजन लेने के तुंरत बाद ही तो मैं उसके घर पर था। काका ,पिता, बड़े-भाई, पड़ोसियों से मुलाकात करूँ । उसने अपनी सफलता में मुझे जोड़ा था, जो मुझे गाँव के लोगो के बीच महत्व दे रहा था। पर भोजन के आग्रह को अस्वीकार करते ही कहने लगा कि हाँ भाई तुम तो ठहरे ब्राम्हण और हम जाती के नीच, क्यो करोगे हमारे साथ भोजन? मुझे बड़ा बुरा लगा था कि अभी तो अपनी सफलता में मुझे जोड़ रहा था और अचानक उलटफेर कर जात-पांत कहाँ ले आया। खाना तेरे सामने ही खा कर आया हूँ अध-घंटा भी तो नही बीता और जिद है तो खेत पर चने सेक कर खा लेंगे तू भोजन कर ले। चाय मैं पी लेता हूँ । वह नही माना था। अब प्रमोशन लेकर पुलिस विभाग में कहीं अफसर है, याद तो करता है मगर उसके तेवर जात पांत पर जस के तस् है।

विचारने के लिए


This attached photo was taken at a competition in June 2006 The competition was between 9 women for best makeover They had every possible beauty treatment available to them over a period of 12 hours before the contest. Look at the before and after photos. It really is Shocking! Conclusion - there are no ugly women, the woman 2 nd from the left won the contest.

सोमवार, 14 जुलाई 2008

मिलिए इस पते पर

रोटरी क्लब रतलाम सेन्ट्रल डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम पर