रविवार, 31 अगस्त 2008

serrogate

कई वर्षों पहले हम जानते थे की रानिया अपनी सुन्दरता बनाए रखने के लिए अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए धाय नियुक्त किया करती थी । अब बच्चा पैदा करने के लिए भी दूर कहीं एक कोख तलाशी जा रही हैं। सुन्दरता की इस संस्कृति को मेडिकल साइंस की आड़ में परोसा जा रहा है जो आगे जाकर पुनः विकृति को जनम देगा । निःसंतान दंपत्तियों के लिए अवसर तथा गरीब कोख को सुअवसर की आड़ में चालु हुए इस कार्य का आगे जाकर कुछ नया ही हश्र होगा यह तय है ।
इंतज़ार करें ................ वो दिन भी दूर नहीं ।

शनिवार, 30 अगस्त 2008

मगजपच्ची

तीन दोस्त अपने साथ कुछ लड्डू लेकर यात्रा को निकले । घूमते घामते एक पेड़ के नीचे थकान मिटाने को बैठे तो नींद लग गई । पहला दोस्त उठा तो देखा बाकि के दोनों दोस्त बेखबर सो रहे है। उन्हें उठाना उचित नही लगा तो भूख मिटाने के लिए लड्डू के तीन हिस्से किए । एक लड्डू अतिरिक्त बच गया तो वो पास खड़ी गायको खिला दिया । जब दूसरा मित्र उठा तो उसने भी यही किया की तीन हिस्से कर अपना हिस्सा खाया अतिरिक्त एक लड्डू कुत्ते को डाल दिया। तीसरे की बारी आई तो वह भी तीन हिस्से कर अपनी भूख मिटा कर अतिरिक्त एक लड्डू गैया को खिला कर सोया । सवेरे तीनो ने आपस में चर्चा की और बचे हुए लड्डू तीन हिस्सों में बांटेअतिरिक्त एक को कुत्ते को खिला दिया ।

सवाल यह है की कुल कितने लड्डू लेकर वो लोग चले थे ।

संख्या पूर्णांक में है।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

बीजिंग की जमीन पर चमके नए सितारे

चीन ने बीजिंग की जमीन पर 8 अगस्त 2008 की रात को ओलिम्पिक के उद्‍घाटन समारोह में आतिशबाजी से आकाश में अलौकिक चमक बिखेरकर सबको मंत्रमुग्ध किया था। लेकिन इसके बाद इससे कहीं ज्यादा चमक बिखेरी उन खिलाड़ियों ने, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से न सिर्फ अपने देश बल्कि पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया। किसी भी ओलिम्पिक का सबसे अधिक आकर्षण 100 मीटर फर्राटा दौड़ होती है, जबकि इन खेलों का समापन मैराथन दौड़ के साथ होता है। ओलिम्पिक की इन दोनों ही प्रमुख स्पर्धाओं में दुनिया ने नए चैम्पियनों को देखा।
100 मीटर में उसेन बोल्ट ने बाजी मारी तो मैराथन में केन्याई एथलीट चैम्पियन बना। धरती का सबसे तेज धावक : यूसैन के लिए बीजिंग हमेशा के लिए इसलिए भी यादगार बन गया, क्योंकि उन्होंने यहाँ 'फर्राटा डबल' पूरा कर नया इतिहास रचा। 100 मीटर दौड़ 9.69 सेकंड के विश्व रिकॉर्ड समय में पूरी करने के बाद उन्होंने 200 मीटर दौड़ भी 19.30 सेकंड के विश्व रिकॉर्ड समय में पूरी की। इस तरह वे पहले एथलीट बन गए, जिन्होंने एक ही ओलिम्पिक में 2 स्पर्धाओं में विश्व कीर्तिमान तोड़े। यही नहीं, वे 1984 में अमेरिका के कार्ल लेविस के बाद 'फर्राटा डबल' बनाने वाले पहले धावक बन गए। बोल्ट ने 200 मीटर दौड़ में अमेरिका के माइकल जॉनसन का 1996 के अटलांटा ओलिम्पिक में बनाया 19.32 सेकंड का पिछला रिकॉर्ड तोड़ा।
मैराथन में वांसिरू का रिकॉर्ड प्रदर्शन : 21 बरस के सैमुअल वांसिरू ओलिम्पिक मैराथन जीतने वाले पहले केन्याई धावक बने। उन्होंने 42.15 किलोमीटर का फासला रिकॉर्ड 2 घंटे 6 मिनट और 32 सेकंड में तय किया। केन्या इससे पहले दो बार पुरुष मैराथन का रजत पदक जीत चुका था, लेकिन यह पहला मौका है, जब उसने मैराथन में सोने की चमक देखी। वांसिरू ने तीन बरस पहले ही मैराथन दौड़ में हिस्सा लेना प्रारंभ किया था और हाफ मैराथन में रिकॉर्ड स्थापित किया था।
बीजिंग में केन्याई एथलीटों ने हैरतअंगेज प्रदर्शन करके 14 पदक जीते, जिसमें पाँच स्वर्ण शामिल थे। उससे आगे सिर्फ अमेरिका 23 पदकों के साथ प्रथम और रूस 18 पदकों के साथ दूसरे नम्बर पर रहा। युवा सनसनी पामेला जेलिमो भी महिला वर्ग में केन्या का परचम लहराने में सफल रहीं। उन्होंने महिला वर्ग में केन्या के लिए पहला स्वर्ण पदक 800 मीटर में जीतकर खाता खोला था।
अनूठी शैली : जमैका की शैली एन. फ्रेजर की जिन्दगी की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। शैली का बचपन बेहद तंगहाली में बीता। जब वे अपनी माँ के साथ सड़क किनारे सामान बेचती रहती और ऐसे में पुलिस के आने पर उन्हें सामान लेकर भागना पड़ता था। इसी भागदौड़ ने उन्हें एथलीट बना दिया। बीजिंग ओलिम्पिक में शैली महिलाओं की 100 मीटर फर्राटा दौड़ में 10.78 सेकंड के समय के साथ दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गईं। वैसे फर्राटा दौड़ में जमैका का ही जलवा रहा, जहाँ उसने 'क्लीन स्वीप' करते हुए तीनों पदकों पर अपना कब्जा जमाया। शैली के बाद दूसरे नंबर पर रहने वाली शेरोन सिम्पसन ने 10.98 सेकंड के साथ रजत और केरोन स्टुअर्ट ने 10.98 सेकंड के साथ काँस्य पदक जीता।
इथोपिया की दिबाबा का दबदबा : जिस तरह पुरुषों में यूसैन बोल्ट दो स्पर्धाओं को जीतकर 'ओलिम्पिक डबल' बनाने वाले 1984 के बाद (कार्ल लेविस) पहले एथलीट बने तो यह गौरव महिला वर्ग में इथोपिया की दिबाबा ने प्राप्त किया। वे दुनिया की पहली ऐसी महिला एथलीट बनीं जिन्होंने 5 हजार मीटर के बाद 10 हजार मीटर में स्वर्णिम सफलता प्राप्त की। 10 हजार मीटर में वे नया ओलिम्पिक रिकॉर्ड स्थापित करने में सफल रहीं।
बेकेले का 10 हजार मीटर का खिताब बरकरार : केनेनिसा बेकेले ने अपने ही ओलिम्पिक कीर्तिमान को सुधारते हुए पुरुषों की 10 हजार मीटर दौड़ के स्वर्ण पदक पर कब्जा बरकरार रखा। इथियोपिया के बेकेले ने 27 मिनट 01.17 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता और एथेंस में बनाए अपने 27 मिनट 05.10 सेकंड के कीर्तिमान को सुधारा ।
केनेसिसा ने इससे पहले बीजिंग में 5 हजार मीटर में भी स्वर्ण पदक जीता और अपना 'ओलिम्पिक डबल' पूरा किया। आश्चर्य की बात तो यह है कि उन्होंने 5 हजार और 10 हजार दोनों में ओलिम्पिक रिकॉर्ड कायम किए। एथेंस में भी केनेनिसा ने 5 हजार मीटर में रजत पदक पाया था। इस तरह अब तक वे 3 ओलिम्पिक स्वर्ण और 1 रजत पदक जीत चुके
एलेना इसिनबाएवा की स्वर्णिम छलाँग : गत ओलिम्पिक चैंपियन रूस की एलेना इसिनबाएवा ने इस बार भी अपनी स्वर्णिम छलाँग का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने ऊँची कूद में अपने ही विश्व कीर्तिमान में सुधार करते हुए स्वर्ण पदक जीता। इस साल यह तीसरा प्रसंग है जबकि इसिनबाएवा ने नया विश्व रिकॉर्ड कायम किया है। बीजिंग से पहले रोम और मोनाको में विश्व रिकॉर्ड ध्वस्त कर चुकी थीं। बीजिंग में इसिनबाएवा ने 5.05 मी. की ऊँचाई पार की। उन्होंने अपने पुराने रिकॉर्ड को 0.01 सेंटीमीटर से ध्वस्त किया
माइकल फेल्प्स ने पानी से निकाला सोना और रचा इतिहास : जब भी बीजिंग ओलिम्पिक का जिक्र ‍‍छिड़ेगा तो सबसे पहला नाम अमेरिका के सोने से लदे तैराक माइकल फेल्प्स का नाम जुबाँ पर आएगा। फेल्प्स ने जब भी स्व‍िमिंग पूल में छलाँग लगाई, वे सोना लेकर ही लौटे। उन्होंने 400 मीटर व्यक्तिगत मेडले, 4 गुणा 100 मीटर फ्रीस्टाइल रिले, 200 मीटर फ्रीस्टाइल, 200 मीटर बटरफ्लाई, 2 गुणा 400 मीटर फ्रीस्टाइल रिले, 200 मीटर व्यक्तिगत मेडले और 100 मीटर बटरफ्लाई और 4 गुणा 100 मीटर मेडले रिले में भाग लिया और सभी में सोना बटोरकर ओलिम्पिक इतिहास के पन्नों पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करवा दिया। अमेरिकी तैराक स्पिट्ज ने 1972 के म्यूनिख ओलिम्पिक खेलों में सात स्वर्ण पदक जीते थे, लेकिन आठ स्वर्ण जीतकर ओलिम्पिक में नया इतिहास बनाने की गरज से चीन की जमीन पर कदम रखने वाले फेल्प्स ने पानी में ऐसा तूफान मचाया कि स्पिट्ज का रिकॉर्ड इतिहास बनकर रह गया। उन्होंने आठ में से सात स्पर्धाओं में नया विश्व रिकॉर्ड कायम करने के साथ स्वर्ण पदक जीते।एथेंस ओलिम्पिक के मिले सोने के छह तमगों को मिलाकर ओलिम्पिक में फेल्प्स के स्वर्ण पदकों की संख्या कुल 14 हो चुकी है और अभी भी उनकी प्यास नहीं बुझी है। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वे 2012 के लंदन ओलिम्पिक में भी उतरकर अपने स्वर्ण पदकों की संख्या को बढ़ाना पसंद करेंगे।
जलपरी स्टेफनी राइस : जिस प्रकार ओलि‍म्पिक तैराकी में फेल्प्स का जादू सिर चढ़कर बोला, उसी तरह महिला वर्ग में ऑस्ट्रेलिया कीस्टेफनी राइस ने 'जलपरी' बनने का सम्मान प्राप्त किया। राइस ने अपना गला तीन सोने के पदकों से सजाया। उन्होंने 400 मीटर व्यक्तिगत मेडले और 200 मीटर व्यक्तिगत मेडले में विश्व कीर्तिमान स्थापित किए जबकि तीसरा स्वर्ण पदक उन्होंने मेडले रिले में जीतने में सफलता प्राप्त की।
साइकिलिंग में क्रिस छाए : बीजिंग ओलिम्पिक के वैलोड्रम (साइकिलिंग ट्रैक) पर ब्रिटेन के क्रिस होय को कोई भी चुनौती नहीं दे पाया। वे यहाँ पर तीन स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब रहे। 100 साल बाद (1908) साइकिलिंग में तीन स्वर्ण पदक अर्जित करने वाले वे पहले ब्रिटिश खिलाड़ी हैं। क्रिस ने एथेंस ओलिम्पिक में भी स्वर्ण पदक जीता था, लिहाजा अब उनके स्वर्ण पदकों की संख्या चार हो गई है।
वेबदुनिया से साभार

बुधवार, 27 अगस्त 2008

बोल्ट ने जीता चीन का दिल

रविवार, 24 अगस्त 2008
बीजिंग ओलिम्पिक के महानायक एवं तूफानी धावक उस्मान बोल्ट ने सिर्फ ट्रैक पर जंग के साथ ही चीन के लोगों का दिल भी जीत लिया, जब भूकंप प्रभावित शिचुआन प्रांत के बच्चों के लिए उन्होंने 50,000 डॉलर दान के रूप में दिए। ओलिम्पिक में 100 मीटर, 200 मीटर और चार गुणा सौ मीटर की रिले दौड़ का स्वर्ण जीतने वाले जमैका के इस फर्राटेदार धावक ने कहा कि हमने यहाँ अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि लोगों ने खेल का मजा लिया होगा।बोल्ट ने दक्षिण पूर्व चीन में भूकंप पीड़ित लोगों के जल्दी ही इस संकट से उबरने की कामना की। उन्होंने कहा कि इस त्रासदी से उबरकर आगे बढ़ना होगा। ओलिम्पिक से लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।शिचुआन और नजदीकी इलाकों में 12 मई को आये भूकंप में करीब 70000 लोग मारे गए और 18000 लापता हो गए। करीब एक करोड़ लोग बेघर हो गए।बोल्ट ने कहा कि उन्होंने टीवी पर भूकंप की रिपोर्ट देखी है। उन्होंने कहा कि मुझे उन लोगों के लिए दुख है, लिहाजा मैने टीम प्रबंधन को कुछ करने के लिए कहा।बोल्ट ने चीन के रेडक्रास फाउंडेशन के महासचिव लियू शुआंगो को 50000 डॉलर का चेक भी दिया। व्हीलचेयर पर आए शिचुआन के दो बच्चों ने बोल्ट को तोहफे के तौर पर अपनी बनाई तस्वीरे दी।बोल्ट ने कहा कि इन बच्चों का बेहतर भविष्य होना चाहिए। अभी ये बच्चे हैं और इनकी जिन्दगी में सिर्फ खुशियाँ होनी चाहिए। मैं इनकी मदद करना चाहता हूँ।

सोमवार, 25 अगस्त 2008

देने का गुर दिया......

धन्यवाद जमैकन धावक उसैन बोल्ट
स्वर्ण तो तुमने जीता ही ओलिम्पिक में , देश का नाम भी रोशन किया , पर मैं तुम्हारा आभारी हूँ की तुमने भूकंप पीडितों की दशा को समझा और दान दिया ।
तुमने संस्कृति पैदा की दान के साथ, दिया , देने का गुर भी

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

वृद्धाश्रम

वृद्धाश्रम से स्वतन्त्रता दिवस मना कर लौटते वक्त हरजीत भाई ने सवाल किया : संख्या इतनी कम क्यों है?
विस्तृत चर्चा हुई , उपेक्षित - प्रताडित वृद्धों , बदलते परिवेश, पाश्चात्य संस्कृति की विकृति आदि पर विचार चिंतन हुआ।
सुकून की बात यह थी कि वर्तमान में निहायत जरूरतमंद एवं निराश्रित वृद्ध ही अन्तःवासी हैं। एकल परिवार कि संस्कृति और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट से इन स्थानों पर निवासी बढ़ेंगे।
ईश्वर करे अपनी विरासत के बोध से लबरेज परिवार खुशहाल रहें और वृद्धों को घर में सुकून मिले..................

सोमवार, 18 अगस्त 2008

खेल से स्थापित होते मूल्य

भारतीय मुक्केबाज़ अपने मुकाबले जीतकर क्वार्टर फायनल में जा पहुंचे हैं। हम सभी हिन्दुस्तानी आशा लिए बैठे हैं कि फ़िर कोई पदक भारत के खाते में दर्ज हो।
बेंटम वेट के राउण्ड १६ के मुकाबले में विश्व चैम्पियन सर्जेई वोदोप्यानोव को हराकर अखिल कुमार ने विजय हासिल की और अपनी सफलता में समग्र परिवेश को धन्यवाद दिया जिसमे परिवार, मित्र, सहपाठी, खेल प्रशिक्षक सभी शामिल हैं तो इस बात को सुनकर लगा कि भारतीय मूल्य स्थापित होने लगे हैं। अखिल के अनुसार खून पसीना बहाकर खेलने में जो सार्थक माहौल प्रेम परिवेश का प्राप्त होता है, उसी का परिणाम है कि ओलिम्पिक में वे इस मुकाम को हासिल कर सके।
धन्यवाद अखिल........... भारतीय मूल्यों के पुनर्स्थापन को शब्दों में अभिव्यक्त करने के लिए।
विजेंदर और जितेंदर दोनों भी अखिल को अपना साथी और मार्गदर्शक मानते है बकौल उन्ही की जुबानी मैंने उन्हें सुना इंटरव्यू के दौरान। ७५ किलोग्राम वर्ग में विजेंदर ने जीत में सुविचारित रणनिति के साथ रिंग में उतरने के वक्त उनका काम और दिमाग बनाने में प्रशिक्षकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया तो लगा की खेल में बाहर बैठे लोग अपनी भूमिका का निर्वहन भली प्रकार जब करते हैं और माकूल नीतियों में खिलाडी उन्हें समझ पाता है तब ही किसी पदक की गुंजाईश की जा सकती है।
खैर फिलवक्त शुभकामनायें ........... और
प्रार्थना ईश्वर से ......
पदक के साथ मूल्यों का पुनर्स्थापन भी हो............

मंगलवार, 12 अगस्त 2008

पिता के प्रेरण का पारस

एक स्वर्ण पदक पाकर स्वर्णमयी हुए भारतीय खेल जगत के रातों रात सितारे बने अभिनव बिंद्रा की सफलता में अभिनव के पिता का प्रेरण , समर्पण, योगदान और पुत्र के सपने में हमराह बन जाने के गुन और आदर्श ने हमारी सभ्यता का बोध करा दिया है।

जिस भी किसी पुत्र को उसकी इच्छित दिशा में आगे बढ़ने का सुअवसर उसका पिता प्रदान करता है वह पुत्र निश्चित ही सफलता का चरम छूता है। इसके लिए पुत्र में भी अपने पिता का आज्ञाकारी होने का गुन होना जरूरी तत्व है।

हमारी सभ्यता और संस्कृति से लुप्त हो रहे सामाजिक विश्वास की कड़ी में "बिंद्रा परिवार" ने "पारस"ढूंढ निकाला है। यह विरासत का पारस गुम न होने पाये।

शुभकामनाएं !

सोमवार, 11 अगस्त 2008

बैंक मेनेजर

रोज़ सवेरे उठकर अपनी सूटकेस उठाना फिर गाडी उठाकर बैंक पहुंचकर अपने दफ्तर की गतिविधियों का संचालन करना रोज़ ही का काम था।
प्रोबेशनरी बैंक ऑफिसर की परीक्षा पास करके प्रमोशन लेते हुए मेनेजर के पद पार आते आते दुनियादारी से दूर हो कब अपने ही अपने तक "वो" सिमित हो गया , जानता नहीं था।
सीनियर्स के अनुभव और ट्रेनिंग - बैठकों ने उसे डिपोजिट बढ़ाने के एक मात्र लक्ष्य से एकात्म कर दिया । लोन के आवेदन कर्ताओं से उसे खीझ होती थी , रिकवरी उसे सशंकित लगती जिसके मारे लोन देना बुरी बात लगती। कोई लोन ना मांग ले उससे अतः किसी से मुस्कुराकर बात करना अपने गले आफत बुलाने जैसा महसूस होता जिससे उसके जीवन में दोस्तों की कमी हो गई।
वो जो हिन्दुस्तान को उंचाईयां देने में आर्थिक तंत्र के माध्यम से रीढ़ बन सकता था दकियानूसी मानसिकता से ग्रस्त होकर रह गया था।
उसकी सिमित दुनिया में उसका घर, परिवार, दफ्तर,गाडी,कर्मचारी,डिपोजिटर्स और वरिष्ठ अधिकारियों के संपर्क शेष बच रहे थे जब वह रिटायर हुआ । रिटायर होने के बाद उसकी पत्नी ने रिश्तेदारों से कायम रखे संबंधों की राह पार उसकी जिन्दगी डाली थी और वो सोचता था कि अगर उसकी पत्नी बीच ही में साथ छोड़ जाती तो.............

रविवार, 10 अगस्त 2008

दूध में मक्खी

नौकरी करते हुए बच्चों की पढाई , उनकी नौकरी - बिजिनेस , शादी कराते हुए अपने सपनों का मकान बनाकर रिटायर हुए तो सोचा था किनियमितता और धर्म-ध्यान में मन रमा लेंगे ।
सुभाह उठकर सैर को जाना, नहा-धोकर पूजन फिर नाश्ता कर मंदिर जाना सब्जी लाना जैसे काम करने के बाद भी पहाड़ जैसे दिन काटना मुश्किल हो गया ।
अखबार कहीं जाकर पढ़ना, फिर व्यवस्था और नेताओं में बेवजह नुक्स निकालना , बीती बातों को याद कर बुद्धिमत्ता परोसना उनके दिन काटने का जारिया भले हो परन्तु "वे" निरर्थक थे रिटायर कि तरह।
लोगों की निगाहों में..........

भारत को पहला स्वर्ण

पहले पहल १० मीटर रायफल शूटिंग का स्वर्ण अभिनव बिंद्रा के खाते में

भारतीय ओलिम्पिक इतिहास रचा

बधाई अभिनव ! हमें फख्र है तुम पर !

अनुभव जीवन का

गुजरात में बिताए दिन आज भी स्मृति-पटल पर अंकित हैं। मेरी, अजय कपूर और अभय चंद्रात्रे की जोड़ी चिर-परिचित हुआ करती थी वडोदरा में। एक दिन पावागढ़, जो विश्वामित्री नदी का उद्गम है और माँ काली के पवित्र मन्दिर के लिए धार्मिक आस्था का केन्द्र होकर प्रसिद्द है, येज्दी-हीरो होंडा लेकर करीब चलिस किलोमीटर दूर पहाडों की गोद में पहुंचे । उन दिनों यह स्थान अपने प्राकृतिक स्वरुप में हुआ करता था और पैदल चढाई के अतिरिक्त कोई साधन नहीं था। उन्हीं दिनों एलीवेटर लगाने का काम प्रारम्भ हुआ ही था । हम इस चढाई पर चढ़ते हुए जान बुझकर सीढियां छोड़ पत्थर पकड़ते हुए चढ़ने लगे थे , अपनी मस्ती में मस्त बिना रुके देखे पलटेचढ़ते हुए यूँ ही अचानक कम करने वाले मजदूरों द्वारा छोड़ी गई एक रस्सी उठा ली थी । पर्वतारोहण को हम में से कोई जानता नही है आज तक और यह रस्सी लिए हम एक ऐसी जगह पर जा पहुंचे जहाँ से नीचे जाने और उपर चढ़ने का कोई रास्ता ही नही था बस एक पेड़ जो पहाड़ से डालीनुमा निकल रहा था हमारा एक मात्र सहारा बना था। जहाँ हम रुकने को मजबूर थे वहां कोई २०० मीटर की खाई और १२ फुट ऊंचाई और हम तीनो की थरथराहट थी जिसे काबू में रखकर रस्सी को डाली में फेंक कर , जैसे तैसे लटकते बदन छिलाते डाली पर चढ़कर निकल पाने में कामियाब तो हुए पर होंसलों की इस उड़ान पर आज तक फख्र नहीं महसूस कर पाते और हमारी बेवकूफी हमें शर्मिंदा करती है। आज का ये लेख उन नौजवानों को दे रहा हूँ जिनके बुलंद होंसले गलतियां किया करते हैं और कई बार तकदीर उनके साथ नहीं होती।

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

हमारा ओलिम्पिक




खेल महाकुम्भ नजदीक क्या , कल ही से शुरू होने वाला है। हम भारतीय कितने प्रतिनिधि खिलाड़ियों के साथ किन किन खेलों में शामिल हो रहे हैं और कितने पदकों की दौड़ में शामिल हैं यह बात ब-मुश्किल कुछेक लोग जानते होंगे।

हम निश्चित तौर पर उन्ही खिलाड़ियों से आस लगाए बैठे होंगे जिन्होंने गई मर्तबा अपना जोरदार प्रदर्शन किया है , पदक भले ला पाने में असमर्थ रहे तो क्या? किंतु हम कोई नई प्रतिभा अवश्य ही नही ढूंढ पाये , यह भी तय ही है। हमारी हॉकी की टीम इस बार नही खेलेगी इसकी चिंता बीच में की गई और राजनितिक बखेडा खड़ा कर शान्ति बहाल है।

स्थानीय स्तर पर खेलने वाले खिलाडी गुपचुप तरीके आजमा कर राज्य राष्ट्रीय स्तर पर जाने कैसे भी नौकरियां हासिल कर स्वार्थ सिद्ध कर चुके होंगे यह भी हमारे लिए गौण बातें हैं। देश के इतिहास को जाने तो ओलिम्पिक के ८८ वर्षीय समय में मात्र १५ पदक हमारे खाते में दर्ज हुए हैं , जो हमारा अब तक का रिकॉर्ड है।

खेलना ज्यादा जरुरी है या खेल नियम या दोनों ? खेल बजटप्रतियोगिता की नियमितता ?, प्रशिक्षकों की वयवस्था? इत्यादि प्रश्नों पर हमारी खामोशी भी बड़ी अचम्भे से भरी हुई है।

दोष निकालने वालों की संख्या अधिक है बजाय उपायों को दर्शाने के ।

मूलतः कुछ करने दिए जाने के निरंतर प्रयासों की उपेक्षा ही देश में देश-भक्ति और अन्तर-राष्ट्रीय विचारधारा में क्षीणता के कारक हैं। एक अड़चन हमारे विकृत विचार भी , जिसकी वजह से अपने सुख को पाना तो चाहते है परन्तु किसी को आगे बढ़ते देखना कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते।

कल की ही तो बात है.......

वो पुलिस में नया नया भर्ती होकर आया था , आज से कोई २५ बरस पहले। तब उसके पास हुआ करती थी एक दरी, एक फटा सा कम्बल, कुछेक बर्तन। उसकी बहनों के ब्याह के लिए उसके गरीब माँ बाप आस लिए आए थे।
उसने पहली सायकल किश्त भुगतान पद्धति से खरीदी थी । पुलिस में होने के कारण उसकी किश्ते बनाने को तब कोई व्यापारी तैयार नही था पर इमानदार एवं देशभक्त इस सिपाही ने उस वक्त कठिन परिस्थितियों में पूरे पैसे का भुगतान किया था।
आज वो शहर के धनाढ्य लोगों में शुमार है, उसके नगर में चार मकान, तीन दुकाने हैं और उसके खानदानी रईस होने का ढिंढोरा भी है।

बुधवार, 6 अगस्त 2008

नागराज वासुकी के एक दिवसीय मेले में



नागराज वासुकी के एक दिवसीय मेले में
देव भूमि भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय ईलाके की सुदूर वादियों में पर्यटक स्थल के रूप में ज्ञात मनाली के समीप लगभग ८ किलोमीटर की ऊंचाई पर बसे गांव हालाण में नागराज वासुकी का मेला भरता है जिसे देखने मैं अकेला अपने बेस केम्प नग्गर से जिप्सी लेकर चल पड़ा हूँ ।


कुल्लू जिले के ग्राम हालाण के मेला स्थल तक जाने के लिए कच्चे सड़क मार्ग पर मेरी जिप्सी सरसराते हुए चढ़ रही है। पर्वतीय जंगलों के बीच नाचते गाते आ रहे लोगों के द्वारा बजाया जा रहा संगीत सुनाई देने लगा है। पहाडों की शांत रहने वाली वादियों में ढोल, नगाडे, ढोलक, तुरही, तुतारी, झांझ और मजीरे की प्रतिध्वनियों ने एक ऐसा समां पैदा कर दिया है कि आवाज़ कहाँ से आ रही है बताया नहीं जा सकता है। देवदार के सघन जंगलों में एक अलग सी खुशबु , लैंड स्लाइड के खतरे और जंगली जानवरों कि मौजूदगी वाले इस स्थान पर आने के लिए, मैं जहाँ ठहरा हूँ वहां के चौकीदार ने एसा कुतूहल रचा है कि उसके आमंत्रण पर मैं इस स्थान और उसके घर जाने को बेताब हूँ। आनंदमयी क्षणों के साथ, सुमधुर धुनों कि थाप के साथ मेरी जिप्सी रेंगती हुई चल रही है । खड़ी चढाई और गहरी खाइयों वाले रस्ते में ड्राईवर बड़ी संजीदगी से और कौशल के साथ ड्राइविंग कर रहा है।


रतलाम से मोटरसाइकल लेकर निकले मेरे दल के अन्य सदस्य दुसरे स्थानों की और जा चुके हैं । साज्जा त्यौहार के दौरान पहाडों में लगने वाले इस मेले में मैं अकेला पहुँचने जा रहा हूँ। मुरलुराम जो मेरे रेस्ट हॉउस का चोकीदार है मेरे पहुँचने के इंतज़ार में खड़ा है । उसने बताया कि यहाँ तक पहुँचने वाली ये पहली गाड़ी है जो मैं लेकर पहुंचा हूँ। आनंद के हसीं पलों को मैं जरा भी गवाना नही चाहता हूँ , इसलिए उसके घर के सामने जो मेला प्रांगन से ही लगा लगा सा है , गाड़ी खड़ी करने के बावजूद और उसके भरपूर निवेदन को अस्वीकार करके उसे अपने साथ कर अपना केमेरा लिए मैं लगभग दौड़ सा पडा हूँ । समुद्र मंथन, कश्यप अवतार, हलाहल विषपान, लक्ष्मी प्राकट्य और अमृत कलश के कथानक से जुड़े इस कथानक के पात्र जिनकी रस्सी बनाकर मंदराचल पर्वत से समंदर मथा गया , नागराज वासुकी बस कुछ ही मिनिटों में यहाँ खड़े पहाडों के बीच बनें २०० मीटर चौडे ५०० मीटर लंबे मैदान के बीच लगभग ५०० वर्ष पुराने देवदार वृक्ष के नीचे बने ओटलेनुमा स्थान पर प्रतीकात्मक रूप में आने वाले थे। नागराज वासुकी पुराणों में वर्णित प्रमुख नागों में से हैं और आज इस मेले में उनके १८ पुत्रों से मिलने (जो अलग अलग जगह रहते हैं) पाताल से आने वाले हैं । पहाडों की ऊँचाईयों में पाताल स्थित नागराज वासुकी के निवास को देखने के लिए मैंने अपनी गर्दन पूरी उपर की और तान दी है और एक अनुमान से मैंने यह स्थान देख लिया है। पीछे पलटने पर अपने पैरों में मुझे जो नदी बहती नजर आ रही है वो इस जगह से कोई ६० किलोमीटर दूर बहती है की ओर देखने पर डर लग रहा है तो मैं पलट कर खडा हो गया हूँ ।


संगीत की ध्वनियाँ निकट आती जा रही है। नागराज वासुकी की जिस पालकी को यहाँ लाया जा रहा है वो अपने स्थान से सुबह ७:०० बजे निकली है और लगभग २:३० बजे यहाँ पहुँचेगी। इस पालकी को एक व्यक्ति उठाकर लेकर । आयेगा जबकि ऋषियों , देवताओं की पालकियों को उठाने वाले व्यक्तियों की संख्या अलग अलग है । जैसा मुझे बताया गया है नागराज वासुकी तीन बार अपने निवास स्थान से निकल कर स्नान करते है जिनमे पहली बार वे अपने पिता के निवास खीरगंगा , दूसरी बार मनाली में बने महर्षि वशिष्ठ के प्राकृतिक गर्म कुण्ड पर स्थित ठंडे पाने के सोते में और तीसरी जगह जहाँ में खडा हूँ, अपने putron से मिलने के वक्त । परम्परानुसार चांवल से बनाई गई लुगडी शराब का प्रचलित सेवन, वृक्ष कटे जाने पर सामाजिक बहिष्कार का बंधन और नाग जाती के मेले में पहुंचकर मैं तो आश्चर्य पूरित अनुभूति से भर गया हूँ। नागराज वासुकी पधार चुके हैं उनकी पालकी के आगे रंग बिरंगे वस्त्र , टोपी पहने हाथों में रुमाल हिलाते विवाहोत्सुक युवाओं का दल नृत्य करते हुए अनायास पेड़ों के बीच से प्रकट हुआ तो मैं दृश्य से अभिभूत हो कर रह गया हूँ ।


फोटो खींचते हुए मैंने नागराज के दर्शन किए हैं । अन्य कार्यक्रमों का वृत्तान्त बताते हुए मुरलुराम बता रहा है इस परम्परा में बलि प्रथा का निर्वहन नहीं होता है जबकि बाकी सभी दूर ये अनिवार्य है , समाज में विवाह उत्सुक युवाओं का परिचय सम्मलेन, विकट चढाई और घने जंगलों में आयोजित होने वाले मेले में प्रायः महिलायें नहीं आती थी । अब सड़क बन जाने से वे आने लगी हैं । मेले में भरपूर शराब के सेवन और दावत की बात उसने बतलाई । हिमाचल के मेलों से पहली बार रूबरू होते समय मैं सुकून महसूस कर रहा हूँ । अपने केमेरे में पलों और दिमाग में स्मृतियाँ संजो कर वापस लौट रहा हूँ अपने बेस कैंप की ओर नागराज वासुकी के पुत्रों का आगमन होने लगा है । ठीक वैसे ही जैसा स्वयं नागराज का हुआ है। मैं जिप्सी में बैठ गया हूँ और देख रहा हूँ मेला स्थल पर लगी दुकानों की और जिसमे जलेबियाँ और नमकीन के साथ सिगरेट, बीडी , तमाखू और पाउच रखे है । इन दुकानों की संख्या भी कुल २० के अन्दर ही है। शाम ढल चली है मेरी गाड़ी धीरे धीरे ढूलकते हुए पहाड़ उतर रही है और मैं सोच रहा हूँ। विकट चढाई वाले इन मेलों के बारे में जो सुदूर प्रान्तों के लिए अनभिज्ञ बने हुए हैं । आज नाग पंचमी के अवसर पर आपको तथ्य की जानकारी दे रहा हूँ।

सोमवार, 4 अगस्त 2008

सफलता ?????

पोलियो करेक्टिव सर्जरी कैंप २०००-२००१ में आज मरीजों के पट्टे काटे जा रहे थे और साथ ही फिजियोथेरेपी की समझाईश ताकि अब तक घिसट कर चलने वाले ये बच्चे ठीक से खड़े होकर बिना सहारे के चलफिरसकें।

बच्चों को चलाये जाने के वक्त मैं भी एक सहयोगी था । मैंने एक बच्चे को उठाकर खडा किया ही था कि उसका पिता बोल पड़ा और अपंगता कि याद दिलाकर कहने लगा कि ये चल नहीं पायेगा ।

मैंने लड़के को कडाई से हिदायत देकर खडा किया और उसके पिता को डाँटते हुए झिड़की सुनाई ।

कलेक्टर मनोज झालानी मेरा रूप और हौंसला देख दंग थे कि मेरे कहने पर १६ वर्षीय उस लड़के ने बिना सहारे १६ कदम रख दिए । ये मेरी सफलता थी , शायद?

मेरी नजर जब झालानी जी पर पड़ी तो सभी मुस्कुरा दिए थे , एक साहसिक प्रयत्न पर
और दूसरी और उसका पिता खडा था शर्मिन्दा......

शनिवार, 2 अगस्त 2008

सुखद स्मृतियाँ

वो हर दिन की तरह भीख मांग रही थी । कोई उसे दुतकारता , कोई कुछ कहता, कोई सलाह देता तो कोई कुछ पैसे देकर पीछा छुड़ाता। वो रोज़ की ही तरह मेरे पास आई थी और उसकी झोली के छुट्टे पैसे मैंने अपनी जरूरत के लिए निकाले और गिन कर नोटों में तब्दील कर रहा था । उससे बात करते हुए उसका दर्द भी हल्का करते जा रहा था । उस बूढी भिखारिन को मुझसे बात कर जी हल्का करने की आदत हो चली थी की अचानक वो आना बंद हो गई । बडे दिनों के बाद जब वो वापस आई तो मैंने गुस्से में पूछा कहाँ चली गई थी ? में तो समझा के मर गई हो।
वो हंसी और अपनी बिटिया के ब्याह की सुखद स्मृतियों को सुनाने लगी। मैं तो जन्नत में था उसकी बातों से। भगवान् का वो आसरा भी जताना भूली नहीं थी । कल उसकी बिटिया को लिवाने जाने का बताया तो दिल न माना था। मार्ग व्यय दिए जाने पर उसकी दुआएं और आंसू अलग बयानी कर रहे थे। उसकी सुखद स्मृतियाँ दुआओं के साथ मेरी हो चली थी ................................

अकेला चला था मैं

वोह हंसी शाम थी , सुहावना मौसम , डगर खालीऔर उस पर मैं ।
सोचता जाता था दुनिया की निराली बातों को , दोस्तों के नजरियों को , रिश्तेदारों की चाहत को।
फिर देखा जीवन की हकीकत को । लुभावने रंग ढंग को समझ नहीं पाया था ।
वो दौड़ थी उनकी किस बेकरारी में समझ नहीं पाया था । वो जाते नजर आते थे दूर कहीं ।
पर अकेला चला था मैं, राह पर अपनी और दिन सुहाना था, शाम सुहानी थी।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

एक शाम हनुमान के नाम

पंडित विजयशंकर जी मेहता; भास्कर समूह से जुड़ा एक नाम है । सत्यनारायण भगवान की कथा से आपने प्रबंधन को जोड़ा और फ़िर हनुमान चालीसा को लेकर जीवन प्रबंधन पुस्तिका की रचना की।
दैनिक भास्कर अखबार के रतलाम दफ्तर से मेरा संपर्क पारिवारिक है । ब्यूरो चीफ अजय तिवारी मेरे सहपाठी रहे हैं और मुझे भास्कर का सदस्य मानते हैं । पंडितजी द्वारा एक शाम हनुमान जी के नाम किया जाना विदित हुआ तो अजयजी ने मुझसे फ़ोन पर चर्चा की और मेरा अभिमत और सहयोग की अपेक्षा रखीएक अच्छे धार्मिक मनोयाग को नकारने का प्रश्न नही था। हमने सारी व्यवस्था पर एक नजर डाली तथा एक टीम का गठन कर कार्यक्रम किए जाने की शुरुआत कर दी।
रोटरी के अध्यक्ष के रूप में मुझे सत्र का परिचय अध्यक्ष /सचीव प्रशिक्षण कार्यशाला में उज्जैन में जिस दिन लेना था ठीक उसी दिन नगर में हमें उक्त कार्यक्रम एक शाम हुनमान के नाम करना था। मैं सुबह उज्जैन के लिए निकलने के पहले जितना मेरा दायित्व निर्धारित था उसे पूरा कर चुका था । अब सिर्फ़ कार्यक्रम स्थल पर तथा दिशा निर्देशों में मेरी जरूरत थी सो मोबाइल पर बाकि काम हो जाने की बात से मैं आश्वस्त होकर उज्जैन को निकल गया और सम्पूर्ण दिन एक अलग तरीके से बिता कर शाम को कार्यक्रम से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व रतलाम पहुँच गया था।
पंडित जी की ये सभा शुरूआती दौर की थी पर हमारी युवा टीम जो नगर में पहली बार धार्मिक आयोजन करने जा रही थी पूरे उत्साह से जुट गई थी। कई लोगों ने इस कार्यक्रम को नगर के धार्मिक आयोजन करने वाली संस्थाओं से कराने पर जोर दिया था परन्तु अब यह आशा और अपेक्षा से अधिक एवं प्रशासन, राजनीतिज्ञ, प्रबुद्ध-जनों एवं धर्मावलम्बियों का उपस्थित होना हमारी रणनिति को सराह रहा था। चूँकि इस पूरे कार्यक्रम की टीम बनाने से लगाकर सभी व्यवस्था मुझे चेयरमैन के रूप में सौंपी गई थी। यह कार्यक्रम स्वतंत्र हैसियत से होना था, भास्कर को इससे थोड़ा दूर रखते हुए इसे करना था जो निति के तहत जरूरी भी था। लगभग ३०,००० से अधिक की उपस्थिति और पंडित जी का संवाद हनुमान जी ने संपन्न कराया ये संस्मरण याद आते ही दृश्य उपस्थित हो जाते है। प्रबंध की जिस अवधारणा को पंडितजी सुना कर गए उसकी मिसाल कार्यक्रम किए जाने के वक्त हम सभी महसूस कर गए हैं।
जहाँ तक पंडितजी की बात है उनके जीवन में भी यह अविस्मरनीय क्षण रतलाम में बन चुके हैं। अब वे सारे देश में एक साथ हनुमान चालीसा का पाठ नेट के जरिये कराना चाहते है आप भी अपने नगर में उक्त आयोजन के सहभागी बन सकते है ।