शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

पीढियों से अन्तर है मानसिकता का

कल शाम को चर्चा चल निकली की लड़के लड़कियों के अन्तर के बारे में।
विषय सदैव लड़कियों की चिंता से ग्रस्त रहा करता है। एक पिता सदियों से अपनी कन्या के ब्याह के मामले से चिंतित हो जाया करता है। अपनी लड़की की शादी के बारे में वो उसके छुटपन से जुड़ जाता है और इसके सम्बन्ध में वह सहेजने की प्रवृत्ति धारण करता है , ठीक भी है लडकियां माता तुल्यहोती है और परिवार को ऊंचाई की और वह अपनी उत्पत्ति से ही ले जाने लगती है ।
जबकि यदि लड़के का जन्म हो तो बेफिक्री और मदहोशी का आलम इस कदर हावी रहता है कि सिर्फ़ बच्चा पढ़ लिख ले और उसकी गृहस्ती बसा कर निवृत्ति.....
कभी किसी पिता को मैंने लड़के के भविष्य कि पायदान पर पूँजी देते नही पाया , कभी स्वावलंबन से उसे किसी व्यवसाय में लगाने का धैर्य सधे नही देखा , कभी गारंटी कि जुगत में भी नही देखा .......
शादी के बाद ससुर कुछ करेगा और बहु अपने साथ लायी पूँजी से पति को सन्मार्ग पर ले जायेगी हमेशा इस धारणा से ग्रस्त समाज को पाया ....
कानूनी पिता ही दामाद का भला करेगा कि व्याप्त सोच को नौकरियों ने इतना बदल डाला है कि अब ससुर भी वेल इस्टेब्लिशड कमाता दामाद पसंद करता है ।
पीढी दर पीढी चली आ रही विचारधारा हमारी मानसिकता कि परिचायक है समय आ गया है इसे बदल डालने का अब बेटों के बारे में सोचे उन्हें अपने पैरो पर खडा करने कि कवायद कराये । उनके आत्मनिर्भरता के निमित्त सरकारी कागजों से हटेंकुछ पूँजी उनके भविष्य को भी समर्पित करें .......
बेटियों कि जो चिंता आप करते है पैसे बचाने में , बेटों को नौकरी कराने के बजाय उन्हें ख़ुद कुछ कर दिखाने का जज्बा बढाए उनके भविष्य के लिए भी पूँजी जुटाए ......
कल यह चर्चा उद्योग विभाग के जी एम् से बात करते उस वक्त पैदा हुई जब वे नगर के नौजवान युवा उद्यमियों को तलाशते हताश हैं और जिले में नौकरियों कि तलाश करते बेरोजगार युवाओं कि टोलियों के बावजूद उद्योग लगाने के लिए आगे आने वाले नौजवनों कि कमी से चिंतित थे ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

बुधवार, 28 जनवरी 2009

झुग्गीवासियों को स्लमडॉग कहना चाहिए?

फ़िल्म स्लम डॉग मिलेनियर
कौन बनेगा अरबपति किताब के बाद निर्मित हुई है। यह किताब मैंने पढ़ी और पाया कि वास्तविकता के काफ़ी नजदीक ले जाकर लेखक इसे लिख पाने में सफल रहे हैं । बधाई देना चाहूँगा कि यह प्रयास फिल्मांकन तक जा पहुंचा है । मगर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले नागरिक इस फ़िल्म के टाइटल में स्लम डॉग के रूप में इंडिकेट कर दिए गए हैं।
अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कर झुग्गी के निवासियों को स्लम डॉग कहना किसी भी सभ्यता के अनूकुल कदापि नही । कथानक निश्चित ही श्रेष्ठ है और कहानी भी इसमे किसी समुदाय को लजाने का इरादा तो निश्चित ही नही है , जो फ़िल्म के नाम में नजर आता है । मर्यादा कहती है नाम बदल देना चाहिए । अपमानित कराने वाले शब्दों को हटा देने से अपसंस्कारित भाषाइ दुर्बलता को तिलांजलि ही तो मिलेगी ।

सुंदर चित्रांकन में विषय प्रलय











रविवार, 25 जनवरी 2009

गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएं


ध्वज आरोहण समारोह दिल्ली में
आज कु परिधि घोटीकर (मेरी भतीजी) ने रतलाम की अपनी स्कुल गतिविधि में हिस्सा लेकर गणतंत्र दिवस के सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रस्तुति यहाँ नेहरू स्टेडियम में दी ।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

हैरान हूँ मैं

कल जैव विविधता पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया । जिला पंचायत द्वारा उक्त कार्यक्रम वन विभाग के जरिये कराये जाने की बात थी । उच्च कक्षाओं में पढ़ रहे स्कूल के छात्र , जीव विज्ञान के महाविध्यालयीन विभाग अध्यक्ष , वन विभाग के अधिकारी /कर्मचारी , बर्ड्स वाचिंग ग्रुप अध्यक्ष भारत गुप्ता , नगर में पर्यावरणविद के रूप में ख्याति पा चुके एवं पुरुस्कृत हो चुके श्री खुशाल सिंह जी पुरोहित , खेती की पुरानी नस्लों के संवर्धन में जुटे श्री राजेन्द्र सिंह जी , पर्यावरण प्रेमी सुभाष जी शर्मा की मौजूदगी रही जबकि कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कृषि वैज्ञानिक श्री नरेन्द्र ताम्बे थे और आतिथ्य नगर विधायक श्री पारस सखलेचा और सी ई ओ श्री डॉ संजय गोयल साहब का था।
वक्ता संबोधन के रूप में मैंने एक सवाल सदन में रख कर जानना चाहा की मध्य प्रदेश के राजकीय पशु पक्षी के नाम उपस्थित समुदाय में कितने महानुभाव जानते हैं ?
जानकर अचरज होगा स्कुल के छात्रों में दो , एक प्रोफेसर, चार वनविभाग के कर्मचारी और बर्ड्स वाचिंग ग्रुप अध्यक्ष भारत गुप्ता को ही जवाब पता था जबकि सदन में लगभग १५० व्यक्ति मौजूद थे ।

सोमवार, 19 जनवरी 2009

नई पीढी की सोच निराली

एक अधेड़ कौआ शाख पर बैठा था की उसके पास एक नौजवान कौआ आ बैठा । परिचय लेने पर अधेड़ कौवे को पता चला कि नौजवान कौआ उसके दोस्त का बेटा है और यह भी कि आगामी दिनों में वो विदेश जाना प्लान कर रहा है । अधेड़ कौवे ने उसे सलाह देना शुरू कर दिया कि देखो बेटा दूर विदोशों में इंसान का खतरा अधिक रहता है किसी भी इंसान से दूर रहना आदि ।
इतने में पेड़ के नीचे से एक आदमी जेब में हाथ डाले गुजरा, अधेड़ बोला देखो इससे कोई डर नही । नौजवान बोला उड़ लो अंकल । अधेड़ हस कर बोला मैंने कहा न कि कोई डर नही ....... वोह अपनी बात पूरी कहता उसके पहले ही एक पत्थर उसे आ लगा ।
तब से कहते हैं उम्र से अनुभव जरूर मिलता है मगर विचारों को गति नौजवान ही दे सकते हैं

अच्छा उपाय है भ्रूण ह्त्या रोकने के लिए

A worried woman went to her Doctor and said : 'Doctor, I have a serious problem and desperately need your help! My baby is not even 1 yr। old and I'm pregnant again. I don't want kids so close together.' So the doctor said: 'Ok, and what do you want me to do?' She said: 'I want you to perform an abortion, and I'm counting on your help with this.' The doctor thought for a little, and after some silence he said to the lady: 'I think I have a better solution for your problem. It's less dangerous for you too.' She smiled, thinking that the doctor was going to accept her request. Then he continued: 'You see, in order for you not to have to take care of 2 babies at the same time, let's kill the one in your arms. This way, you could rest some before the other one is born. If we're going to kill one of them, it doesn't matter which one it is. There would be no risk for your body if you chose the one in your arms. The lady was horrified and said: 'No doctor! How terrible! It's a crime to kill a child! 'I agree', the doctor replied. 'But you seemed to be ok with it, so I thought maybe that was the best solution. The doctor smiled, realizing that he had made his point. He convinced the mom that there is no difference in killing a child that's already been born and one that's still in the womb. The crime is the same!

रविवार, 18 जनवरी 2009

बुद्धिजीवियों का शहर विचारहीन क्यों?

शहर में सामाजिक गतिविधियाँ जारी हैं, इनमे अधिकतम वार्षिक गतिविधियाँ अपने रंग में है। शहर के बाशिंदे अब चुप से हैं और लगता है जैसे किसी सदमे में हैं। कोई नया विचार न तो सुनाई दे रहा है ना ही कोई सोच नजर आती है। वो लोग जो हंमेशा दूसरो से प्रतिस्पर्धा करते दीखते थे आज वे भी व्याकुल नजर आते हैं।
चुनावों में जो रंग चढ़ा था वो अब विपरीत अर्थों में दिखाई दे रहा है। बड़े आक्रोश के साथ निर्दलीय जीता दिया गया लेकिन बुद्धिजीवी नगर जो सदा से अपने अभिन्न सोच के साथ प्रस्तुत होता आया है, अब आंधी के बाद के सदमे सा महसूस किया जा रहा है। पता नही लोगों का निरंतर चिंतन अब थमा हुआ सा क्यों महसूस होता है। क्रियाशीलता की कमी भी यहाँ लगने लगी है। एक तीव्रता जो हमेशा से महसूस होती आई है वह कहीं लुप्त हो गई है। इन तमाम बातों पर जब कुछ मित्रों से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया : आप ठीक कह रहे है।

मेरे विचार से लोग अब परिवर्तन के जवाब में नया नेटवर्क समझ नही पा रहे है, और जो परिवर्तन उन्होंने जिस भी कारण किया उसका जवाब नही होगा। विचारों का सम्बन्ध लीडरशिप से नही, मन की गति से होता है। शायद शहर के युवा कही लुप्त हो गए हैं जो शहर की तकदीर बदलने का जज्बा रखते है ।

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

विकट परिस्थिति

आज सुबह एक दंपत्ति से मुलाकात हुई । वे लोग स्वर्ण जयंती रोजगार योजना में आवेदन कर बैंक से ऋण चाहते हैं । मैंने उनसे पूछा की वे कितनी रकम चाहते हैं? और मिल जाने पर क्या करेंगे ?
उन्होंने बताया : पति को किडनी की तकलीफ है और अब इलाज तक के लिए कुछ नहीं बचा है। उद्योग विभाग ने उनकी फाइल को इंदौर बैंक की और रवाना किया है , बैंक प्रबंधक ऋण देने को तैयार हैं । मगर , फाइल के पहले के ४५ ऋण आवेदनों को पहले ऋण देने के बाद ही नंबर आयेगा । वक्त कितना लगेगा वे बता नहीं सकते। अगर पहले के ऋण आवेदनों को यदि छोड़ देते हैं तो यह रिश्वत लिया जाने जैसा है सो पहले के आवेदन पहले देना होंगे।
दंपत्ति से पुछा की वे इस ऋण का करेंगे क्या ?
जवाब था कंगन स्टोर प्रारम्भ करूंगा और घर से टिफिन सेंटर भी चालु करूंगा । ऋण कितना चाहा गया है ? के जवाब में उत्तर था ४०००० रुपये ।
इनका कोई घर नही है , कोई गारंटी दे नही सकते , पहले फोटोग्राफी का व्यवसाय करते थे अब तकलीफ की वजह से वो भी सम्भव नही रहा । यार दोस्त रिश्तेदार वगैरह भी काफ़ी मदद कर चुके हैं बस अब कमाई के लिए आत्म निर्भर होने के लिए रोजगार आवेदन किया है ।
गैस का कनेक्शन भी नही है बर्तन भी खरीदना पड़ेंगे टिफिन सेंटर के लिए ......आदि
एक और पूंजीवाद ने देश को नईऊंचाई दी है तो बेरोजगार हुए भाई अब दर दर की ठोकर खा रहे हैं । बिना गारंटी के ऋण अब कब मिलेंगे पता नही , बच्चों का भविष्य कैसे बनायेंगे ?
विचार नही है असल बात है , यदि कोई तरीका हो तो बताये ........

सोमवार, 12 जनवरी 2009

गिल साहेब से चर्चा

रोटरी अधिवेशन में गिल साहेब आतंकवाद पर संभाषण दे रहे थे । हॉल में उन्होंने बताया की उन्होंने एक वेब पर सुचनाये और जाग्रति के लिए मुहीम चला रखी है । और यह की उनकी इस साईट को हिन्दुस्तान में कम लोग हिट करते हैं । मैंने उनसे जानकारी ली तो उन्होंने कहा इसे ज्यादा लोग पढें उनकी चाहत है , भारत में कम लोग जगे हुए है एसा उनकी बातों से लगा । फ़िर उन्होंने अपना पता जाहिर किया जो आप भी हिट करे जरूर से .......

।satp.org
http://www।satp.org/
e-mail: icm@del3.vsnl.net.in और icm@satp.org

write him to:
Executive Director
Institute for Conflict Management
11, Talkatora Road
New Delhi 110001.

सोमवार, 5 जनवरी 2009

यह कैसे

अखबार में ख़बर थी तेंदुए को धार जिले में वन विभाग के अधिकारी कर्मचारियों की मौजूदगी में मार गिराया गया , जावरा में जब्त तीतर जीवदया सोसायटी को सौप दिए गए , क़ानून ताक़ में रखकर। समझ नही पा रहा हूँ विभाग के अधिकारी क्यों क़ानून से छेड़छाड़ में लगे है?

रविवार, 4 जनवरी 2009

शनिवार, 3 जनवरी 2009

साईंबाबा और आरक्षक करणसिंह


बकौल करणसिंह


अपनी बच्ची को लेकर मन्दिर को गया , गलती से पर्स घर भूल आया था।


रास्ते में उसने पोहा जलेबी देखा था सो मचल गई ।


मैंने जेब टटोली, पता चला खाली है ,सो मैंने उसे फुसलाया और कहा बाबा के मन्दिर से लौट कर दिलवाऊंगा ।


मन्दिर गया , दर्शन किए , बच्ची को पुजारी ने आवाज़ लगाई और पास बुलाया ।


मैंने कहा जाओ , पुजारीजी से प्रसाद ले लो ।


देखता हूँ ...... क्या? पुजारी जी ने उसे पोहा जलेबी का नाश्ता थमा दिया है......

साईं बाबा और आरक्षक करणसिंह

आरक्षक करणसिंह वर्तमान में डीआई जी कार्यालय में पदस्थ है ।
मुझसे जब भी मिलते हैं , बड़ी खुश मिजाजी से बातें करते है । अभी कुछ दिनों पहले उनके साथ हुए वाकये उन्होंने सुनाये ।

बकौल करणसिंह
सुबह उठकर मन्दिर जाना मेरा नित्य कर्म है । गुरुवार को जल्दी जाता हूँ । अभी दशहरे के लगभग में मन्दिर गया तो बाबा के गले में पडा हार मुझे अच्छा लगा प्रार्थना करते वक्त सोच रहा था की ये हार मिल जाए तो घर पर बाबा को चढ़ा दूंगा ।
मन्दिर से निकल कर घर गया , वहाँ से १० बजे ऑफिस जाने के लिए निकला , लोकेन्द्र टाकीजवाली रोड से गुजर रहा था तो किसी ने आवाज़ लगाई , देखा मन्दिर के पुजारीजी खड़े हैं । पुजारीजी ने पूछा कहाँ जा रहे हो ?
मैंने बताया ऑफिस का टाईम है सो वहीं जा रहा हूँ । वो बोले अभी मत जाओ , वापस घर को जाओ । मैं सोच में पड़ गया ....... । इतने में उन्होंने मुझे एक पाकेट थमा दिया बोले ये घर पर बाबा को चढ़ा देना ।
मैं घर गया और पैकेट खोला देखता हूँ की उसमे वाही हार था जिसे सुबह प्रार्थना करते हुए चाह रहा था की मुझे मिल जाए ..........

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

कुछ मजाक हो जाए नए साल में

कांच की दीवार पर बैठे दोस्त से पूछा : ऊपर क्या कर रहे हो ?
जवाब मिला दूसरी और देख रहा हूँ ...

एक दोस्त ने अकल लगाई नव वर्ष संदेश में लिखा : आई एम् दी बेस्ट
सुहाया नही तो पूछा : अपने आपको बड़ा और श्रेष्ठ कहने वाले तुम ज़रा बताओ तो जाने की तुम वाकई में श्रेष्ठ हो ।
सवाल है की स्कुल टीचर कक्षा में सन ग्लासेस क्यों पहनती हैं ?
दो दिन तक जवाब नही मिला
फ़िर पूछने वाले दोस्त ने जवाब दिया : अरे भाई इतनी छोटी सी बात का जवाब नही दे सके ?
आजकल कक्षा के छात्र ब्राईट जो होते हैं ?

गुरुवार, 1 जनवरी 2009