रविवार, 18 जनवरी 2009

बुद्धिजीवियों का शहर विचारहीन क्यों?

शहर में सामाजिक गतिविधियाँ जारी हैं, इनमे अधिकतम वार्षिक गतिविधियाँ अपने रंग में है। शहर के बाशिंदे अब चुप से हैं और लगता है जैसे किसी सदमे में हैं। कोई नया विचार न तो सुनाई दे रहा है ना ही कोई सोच नजर आती है। वो लोग जो हंमेशा दूसरो से प्रतिस्पर्धा करते दीखते थे आज वे भी व्याकुल नजर आते हैं।
चुनावों में जो रंग चढ़ा था वो अब विपरीत अर्थों में दिखाई दे रहा है। बड़े आक्रोश के साथ निर्दलीय जीता दिया गया लेकिन बुद्धिजीवी नगर जो सदा से अपने अभिन्न सोच के साथ प्रस्तुत होता आया है, अब आंधी के बाद के सदमे सा महसूस किया जा रहा है। पता नही लोगों का निरंतर चिंतन अब थमा हुआ सा क्यों महसूस होता है। क्रियाशीलता की कमी भी यहाँ लगने लगी है। एक तीव्रता जो हमेशा से महसूस होती आई है वह कहीं लुप्त हो गई है। इन तमाम बातों पर जब कुछ मित्रों से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया : आप ठीक कह रहे है।

मेरे विचार से लोग अब परिवर्तन के जवाब में नया नेटवर्क समझ नही पा रहे है, और जो परिवर्तन उन्होंने जिस भी कारण किया उसका जवाब नही होगा। विचारों का सम्बन्ध लीडरशिप से नही, मन की गति से होता है। शायद शहर के युवा कही लुप्त हो गए हैं जो शहर की तकदीर बदलने का जज्बा रखते है ।

4 टिप्‍पणियां:

Dr.Parveen Chopra ने कहा…

समझ नहीं आ रही इतनी चुप्पी क्यों साधे हुये हैं ये सब के सब ---कहीं ठंडी की वजह से रजाईयों में तो दुबके नहीं पड़े हैं !!

संगीता पुरी ने कहा…

हां , युवा के हाथों में ही होती है जमाने को बदल देने की ताकत।

Udan Tashtari ने कहा…

बुद्धिजीवी तो अक्सर आत्ममुग्ध ही पाये जाते हैं आजकल तो उनका शहर तो विचारहीन होना ही है.

seema gupta ने कहा…

विचारों का सम्बन्ध लीडरशिप से नही, मन की गति से होता है। शायद शहर के युवा कही लुप्त हो गए हैं जो शहर की तकदीर बदलने का जज्बा रखते है ।
" सच कह रहे है आप, युवा तो देश का भविष्य होतें है....मगर.."

regards