बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

दिल

रखा था महफूज़
अपने दिल को, अपने ही सीने में
जज्ब कर

ले गया कोई उसे
चुराकर/ छीनकर/ खींचकर
ख़ुद ही से

ये गज़ब हो गया !
बेगाना वो
अपना हो गया मगर

कातिल था दिल का
उतारकर खंजर चक से
खींच गया बेदर्द
अहसास दे गया
जिंदगी का
मगर



जान भी न पाये
ये था कौन ?
अचानक जो बन गया अपना

मातम तक मनाने न दिया
हाय! कत्ले दिल का

8 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावभीनी कविता

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर....

राज भाटिय़ा ने कहा…

राम राम अरे जल्दी से इसे मेडिकल ले जाओ भाई...:)
राजेश जी, बहुत ही सुंदर रचना, बेहतरीन.
धन्यवाद

seema gupta ने कहा…

मातम तक मनाने न दिया
हाय! कत्ले दिल का
" वाह वाह कोई हसीं कातिल रहा होगा......."

regards

G M Rajesh ने कहा…

kal raat kuchh yu hi sujh gayaa tha
vaise hi
pahlaa prayaas tha
sanshodhan ho to batayen

kumar Dheeraj ने कहा…

बढ़िया शेरे अंदाज पेश किया है आपने । पढ़कर गहराई में चला गया । लिखते रहिए आभार

kumar Dheeraj ने कहा…

बढ़िया शेरे अंदाज पेश किया है आपने । पढ़कर गहराई में चला गया । लिखते रहिए आभार

Harkirat Haqeer ने कहा…

कातिल था दिल का
उतारकर खंजर चक से
खींच गया बेदर्द
अहसास दे गया
जिंदगी का मगर

ये to गज़ब हो गया Rajesh_ ji....!!!