शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

फागुन की बहार जब छाती है


फागुन की बहार जब छाती है
उन्ही दिनों होली आती है
रंग जाता है सारा जहाँ
और फैलता है उन्माद
मस्ती का दौर छाता है
कोई अपना याद आता है
कली कली खिल जाती है
जब बचपन की शैतानी याद आती है
गर मिल जाता है कोई सपना
बेगाना हो जाता अपना
होली याद दिलाती है
जब बहार फागुन की छाती है

2 टिप्‍पणियां:

hem pandey ने कहा…

होली का खुमार छाने लगा.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सुंदर कविता, लेकिन यह पेड तो पतझड का लगता है, लेकिन है बहुत सुंदर .
धन्यवाद