सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

म्यूजियम

कल लिखने बैठा था तभी यह मुद्दा जेहन में आया था ।
भारत की स्वतन्त्रता के बाद निजी क्षेत्र में कोई म्यूजियम शायद ही बनाया गया होगा जैसा कल मुद्रा निधि के नाम से प्रारंभ किए गए सिक्कों के म्यूजियम से सम्बंधित शुभारम्भ से जुड़ासंस्मरण लिखा था।
मुझे याद आया अपनी बीते दिनों का सफर और पूना का वो म्यूजियम जिसे सिर्फ़ सुपारी काटने के काम आने वाले सरौते को समर्पित कर स्थापित किया गया है। विरासत के उपहार के रूप में संजोये गए ये चकाचोंध से पूरित म्यूजियम भारतीय इतिहास के साथ साथ चीजें इकट्ठी करने के शोकीनों में जज्बा बनाए रखते हैं ।
फ़िर याद आए वो दिन जब माचिस, पोस्टेज कलेक्शन बीते दिनों किया करते थे । दीवानगी की वो हद जिसके चलते स्वर्गीय मौसाजी श्री एन एन जोशी जी (भोपाल ) ने साबुन इकट्ठे करना शुरू किए थे और उनके ड्राइंग हालमें लगभग २२००० साबुनों का शानदार संकलन देखने को मिला करता था । आए दिन उनके इस शौक को अखबारों और 1980 के दौर में प्रारंभ हुए नए नए टी वी चैनलों ने दिखाना प्रारम्भ किया था । यह संग्रह आज मौजूद है मगर जो संकलन करने की प्रवृत्ति उनमे थी वो अब मेरे भाईयों में कदापि नही है । मुझे याद है उनका जज्बा जब उन्होंने मेरे हैदराबाद जाने के बारे में सुनते ही फ़ोन लगाकर कहा : वहाँ के किसी एम्पोरियम से साबुन खरीद कर लाना पड़ेंगे और उन्हें भेंट देते वक्त मेरी इस गिफ्ट को वे बताते नही थके थे की राजेश ने उनको आंध्र से विशेष साबुन खरीद कर दिए, उनके संकलन में रूस इटली यु एस और अन्य देशो के साबुन सहज ही शामिल हो गए थे। वे जहाँ कहीं भी जाते साबुन खरीद लाया करते थे मगर उनका जो भी परिचित विदेश जाता वहाँ से साबुन जरूर खरीद कर लाता था । हम सब मजाक करते की मौसाजी साबुन नहाने के लिए भी दिया करो , उन्होंने हमारे बेवजह के डर से लोक्कर्स बनावालिए थे ।
भारत भर में यूँ तो कई म्यूजियम बने हैं मगर ये राजा महाराजाओं को मिले अनूठे उपहारों से भरे हुए है उनकी राजसी विलासिता को ये प्रर्दशित करते मालूम होते है । रतलाम में डाक टिकटों का संग्रह रखने वाले मेरे मित्र का फोटो उनकी संग्रहशीलता के लिए आज अखबार में है श्री निगम नगर के उन संग्राहकों में हैं जिन्होंने १ लाख से अधिक स्वदेशी टिकिट इकट्ठे कर अपना काम जारी रखा है ।
आजकी यह पोस्ट उन सभी जनों को समर्पित है जिन्होंने किसी प्रकार संकलन करने की वृत्ति पाल राखी है और आने वाले वक्त के लिए उनका संकलन निधि के रूप में दर्ज होगा ।
राज्य शासन इस प्रकार की प्रव्रत्तिधारियों के संकलन को सार्वजानिक करने का बीडा उठा ले तो हो सकता है कई नई नवेली प्रवृत्ति और संकलन सामने आए.........

5 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

अरे आप ने बचपन की याद दिला दी......माचिस के रंग बिरंगे कवर , डाक टिकट.....और देश विदेश के सिक्के इक्कठे करने का शौक हमे भी था और जैसे जूनून था....कभी कभी तो सड़क पर पडी खाली माचिस की डिब्बी भी उठा लेते थे ....आज भी कहीं कहीं न ये सब पडा होगा ....."

Regards

hem pandey ने कहा…

डाक टिकट संग्रह और सिक्का संग्रह का शौक लोगों में बहुत पहले से है.अब लोग नए नए शौक पालने लगे हैं

रंजन ने कहा…

साबुन का संग्रह.. ये तो नयी बात पता ्चली..

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी हमारे यहां कई लोगो ने पुराने ट्रेकटर का शोक पाल रखा है , तो किसी ने, पुराने टेंको , ओर तोपो का, बहुत अच्छा लगा आप का आज का लेख.
धन्यवाद

Science Bloggers Association ने कहा…

सरकारों के पास आजकल ऐसी सोच कहां, वे तो हर समय अपने वोट बैंक के बारे में सोचा करती हैं।