शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

ओपिनियन

आज अखबार पढ़ रहा था । फंडामेंटलिस्ट को फंडू कह कर, कपड़े उतार कर पीछे के हिस्से में मार लगा कर, पाश्चात्य संस्कृति अपनाने की वकालत की गई है।
भाई, आज वर्ल्ड ट्रेड ओर्गेनिजेशन के पिछलग्गू बन कर विश्व व्यापी मंदी से हम प्रभावित है और हमारी सोच का पाश्चात्यपन हमारी उधार वादिता के नए आयामों पर अग्रसर है। कर्ज की दुनिया बड़ी दिलेर हो गई, अब बेरोजगारी का आलम, अब उस पर मध्यवादिता को लाछन के उनकी सोच पाश्चात्य के अनुकूल न होने से वे सजा के काबिल हो जाए ? ये ठीक बात नही।
महिलाओं के प्रति अभद्रता को नितिपरक संस्कृति से बदलने के बजाय उलाहने देकर पाश्चत्य मानसिकता के अधिग्रहण पर विचार तो होना चाहिए। यह बात गले उतरने वाली नही की सिद्धांतवाद की आड़ लेकर महिलाओं से मारपीट हो । मगर इसका जवाब पाश्चात्य संस्कृति अपनाना कदापि नही होगा वरन इसका जवाब परम्पराजन्य संस्कृति में हासिल है ।
पहरावे, भाषा और कमाने के विकल्प की सार्वजनिक स्वतन्त्रता हमारी अपनी सभ्यता के साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों में दर्ज होकर हमारे अपने संविधान में मान्य बिदु हैं तो यहाँ पाश्चात्य मार्गदर्शन की आवश्यकता क्या हमारे अपने विकलांग मानस की परिचायक नही कहलानी चाहिए ?
अखबार भी इस तरह की धारणा को प्रोत्साहित करते हैं तो यह खेदजनक है .......

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