सोमवार, 30 मार्च 2009

सीख

आओ बच्चों तुम्हे सिखाये
ये धरती कहलाती इंसान की
पानी जमीन जंगल छोड़ा न उसने
इतने बड़े शैतान की
पनाह में हम है उसके
कहीं नहीं भगवान् भी
ठिठक कर रह जाना
दिख जाए जो परछाई भी
रहमो करम से जी रहे जिसके
है बड़ा हैवान ही

जंगल का हर जीव ठिठकता
आज हमें महसूस कर
शैतान , हैवान कहता
इंसान के दिख जाने भर
हम न सुधरे, ना सुधरेंगे
कोई कुछ भी कह ले गर
कोई कुछ भी कह ले गर ...................

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

नव संवत्सर की शुभ कामनाएं


नव संवत्सर का चेत्र माह से आरम्भ होता है
आज विक्रम संवत २०६६
तथा
शालिवाहन शक १९१३ आरम्भ होने जा रहा है ।
गुडीपाडवा , चेटीचंड की शुभ कामनाएं ।

बुधवार, 25 मार्च 2009

नारायण और लक्ष्मी

लक्ष्मी जी धन से सम्बंधित हैं ।
नारायण लोकोपकार से ।
धन लोकोपकार के बगैर ठहरता नही है , यह ठीक प्रकार से जान लेने योग्य है ।
लोकोपकार के बगैर धन की प्राप्ति संकट लाती है यह भी जान लेना चाहिए ।
इसीलिए श्री विष्णु भगवान् जो लोकों के पालक हैं लक्ष्मी के साथ है ।
भगवान् सत्यनारायण जो प्रतीक है वो आपको सदैव उसी तरह बने रहने की प्रेरणा है जैसे किसी नौजवान को हल्दी लग जाने के बाद विवाह मंडप की और जाते समय व्यक्ति में मौजूद खूबियों को अभिव्यक्त करता है ।
वरमाला डाला प्रतिक सिर्फ़ नारायण की स्तुति कराता है ।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

तकरार


जहाँ प्रेम है वहाँ तकरार भी तो है
मकसद दोस्ती का फ़िर कायम भी तो है

आज लड़े, कल फ़िर मिल जायेगे
यह जहाँ हम ही तो खूबसूरत बनायेंगे

बस्ती आज बनाना है
मौसम भी सुहाना है

मकसदों का खेल
आज की तकरार है

सोमवार, 23 मार्च 2009

फ़िल्म "मनी है तो हनी है "

कल "मनी है तो हनी है " देखी


हँसी खेल में उद्यमी बनाने के सपने खूबी से दर्शित किए गए है ।


काफ़ी समय के बाद औधोगिक मूल्यों को समर्पित फ़िल्म देखनेका सौभाग्य मिला ।


निर्माता निर्देशक पटकथा लेखक को धन्यवाद !

चलिए जंगल की सैर पर







भगवान् बुद्ध कोरिया से


शनिवार, 21 मार्च 2009

आप देखें


हाथी डूबा

या के

डुबो दिया

पता नहीं

मगर फोटो जीता

मुकाबला है

जरूर

आरामगाह

कहते है आराम बड़ी चीज है , मुह ढक के सोईये

गुरुवार, 19 मार्च 2009

कुछ कहने को तो हो

कह दिया
जो
उँगलियों ने लबों से
निखर
गई
रंगत भी
अब कहने को
बाकी क्या ?
कुछ कहने को तो हो

मंगलवार, 17 मार्च 2009

आख़िर एक जीव कितना बेहाल किया जायेगा ?

चारों और से घेर दिया अब आक्रमण हो तो दोषी जानवर ही होगा
क्योंकि बेजुबान अपना पक्ष तो रख नही पायेगा ना ।
आईये
पिछले कुछ बरसों से चली आ रही मेरी लड़ाई जिसमे तेंदुआ बचाना जरूरी हो गया है में
शरीक हों

शनिवार, 14 मार्च 2009

रंगपंचमी की बधाई

पकडो अब तो जाने


गुरुवार, 12 मार्च 2009

होली के बाद अब गल और चूल

अब जहाँ तक मध्य प्रदेश के निवासियों का प्रश्न है गल और चूल से से वे वाकिफ हो सकते हैं मगर मैं सोचता हूँ किसी ने नजदीक से इसे देखा नही होगा ।
गल देव का मन्दिर इन दिनों बड़ी रौनक से भरा होता है , होली से रंग पंचमी के मध्य इन मंदिरों के अहाते में अपनी निष्ठा और मन्नते पूरी होने पर आदिवासी समाज एक रिवाज अदा करता है । यह रिवाज है लगभग ३० फ़ुट ऊँचे लकड़ी से बने फिरकीदार जो धरती के समानांतर घूमने वाला चक्र होता है, पर लटकाया जाकर पूरा किया जाता है । जहाँ तक चूल की बात है मैं मानता हूँ इससे अधिकतम लोग वाकिफ होंगे ही । चूल में जमीं में गड्ढा खोदकर अंगारे भरे जाते है और इस पर नंगे पैर चलकर अपनी मनाते पूरी की जाती या फ़िर मन्नत पूरी होने पर इस पर चलकर श्रद्धा अर्पित की जाती है ।
गल की पूरी जानकारी देना उचित रहेगा । एक लंबा खडा किया लकड़ी का ३० फ़ुट ऊँचा खम्भा जिसके उपरी सिरे पर लगी कील में जमीं के समानांतर लगभग १० से १२ फ़ुट का एक पाट जो बीच में से बाँट दिया जाकर कील पर घूमने लायक बनाया जाता है । इस पाट के एक सीरे पर आदमी को लटकाया जाता है और दुसरे सीरे को जमीन पर रस्सी से बंधकर जमीं पर दौड़ते हुए घुमाया जाता है ।
पहले जो व्यक्ति अपनी मन्नतों के पूरा हो जाने पर इस पर घूमना चाहता है उसकी पीढ में एक नुकीला कांटे दार हूक घुसा कर फंसा दिया जाता है। फ़िर उसे ऊंचाई पर पहुचा कर बांधा जाता है । उसकी मन्नत के अनुसार उसके रिश्तेदार जमीन पर भागते हुए जीते चक्कर वह बताता है उतनी बार घुमाते है । लोहूलुहान होकर अपनी ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट करने का यह साधन गल कहलाता है । काफ़ी बड़ी संख्या में लोग इस मन्नत का लाभ उठाते हैं । अब नई पीढी पीढ में हूक भले न लगवाए मगर कपड़े से बांधकर लटकने को बेताब रहती है । शादी सगाई आदि की मन्नतों की पूर्ति के बाद गल देवता के प्रति आस्था का यह विरला प्रकटीकरण है जिसमे २ वर्ष पहले जाकर देखने का मौका मिला था ......
आशा है भारत भूमि के विरले रिवाजो परम्पराओं से आप वाकिफ होकर सोच में होंगे ......

बुधवार, 11 मार्च 2009

खेल के होली देखा अपने को

जला डाली लकडियाँ
भर बाल्टियां फेंका रंग

पी भांग
और रही शराब की तरंग

खेल डाली होली
रिवाज़ जो निभाने है


जब आईने में देखा
अपने को तो
थे दंग

मंगलवार, 10 मार्च 2009

होली है


गुरुवार, 5 मार्च 2009

होली पर्व भगौरिया

आदिवासी अंचलों जिसमे आदिवासियों का प्रणय पर्व भगोरिया सदियों से मनाया जाता रहा है। आज की पोस्ट इस पर्व को समर्पित है । भगोरिया पर्व होली की मस्ती में आदिवासी भाईयों में शादी विवाह का उपयुक्त समय माना जाता रहा है । नाम से ही पता चल जाता है की भगोरिया भागने भगाने से सम्बंधित होना चाहिए । जी हाँ , समस्त प्राकृतिक परिवर्तन के इस दौर में अमराई फूलती है , टेसू छटा बिखेरने लगते है उसी समय इस क्षेत्र में ताड़ के पेड़ से एक मादक रस की प्राप्ति भी होने लगती है । सारा जहाँ खट्टी मदमाती खुशबु से महक उठता है और हर व्यक्ति को बैचेन कर डालता है । शरीर में ऐसी मस्ती का आलम इस प्राकृतिक आबोहवा से भर जाता है की इंसान कुछ भी कर गुजरने की स्थिति में आ जाता है । आदिवासी अंचल में यही मादकता नौजवानों को इतना डुबो देती है की युवक युवतियां मचल उठाते है । होली की फाग मस्ती असल में यही है । लड़किया जहाँ भाग जाने तक बेताब हो उठती है तो युवकों में न चाहते हुए भी भगा ले जाने की मानसिकता बन आती है । होली के इस दौर में हाट बाजार भी निराली छटा से प्रेरित हो जाते है रंग बिरंगे परिधान और प्रणय निवेदन का माहौल इन बाजारों का सुर्ख चटख प्रभाव दर्शित करने लगता है । सजे धजे युवक , आभूषणों से लदी युवतियां बरबस आकर्षण का केन्द्र बन जाती है । बांसुरी की सुरीली तानों से आसमान गूँज उठता है पहाड़ पठार इसकी प्रतिध्वनि से उन्मादित करने लगते है । नृत्य समूहों का बिरला स्वरुप देखते ही बनता है तो ताडी नाम की शराब जो ताड़ वृक्ष की प्राक्रतिक देन है पीये झूमते मस्त लोगों की टोलियाँ । जानकर आश्चर्य होगा हमारा समृद्ध वातावरण किस बेताबी से भर उठता है । झूले झूलते लोग तो कहीं दाँव लगाते । पान की गिल्लोरी यदि किसी युवती ने कबूल ली तो समझो रिश्ता पक्का ।

होली की दिन हमारे लिए रंग से सराबोर होने का पल हो मगर हमारी आदिवासी संस्कृति के लिए गृहस्थी बसाने का समय होता है ।

जो छुट गया उसके लिए माफ़ी लेकिन जिंदगी की यह रौनक देखने काबिल होती है ।

एक टीस यह की शाम के सूर्यास्त तक ही आप यहाँ बने रह पाते हैं , उसके बाद दुनिया दानव रूप धर लेती है बेबस पुलिस भी आपको यहाँ रुकने नही देती जबकि यहाँ हर तरह से रंगीन माहौल तो होता है मगर सामाजिक बन्धनों के अधीन । आप यहाँ रुक नही सकते चाहे कितने ही चीर परिचित ही क्यों न हो । शराब कभी भी माहौल बिगाड़ सकती है और ह्त्या होना बड़ी बात नही ।

कट्ठीवाडा, जोबट, मेघनगर, आम्बुआ वे ठीकाने है जहाँ के हाट बाजार होली पर बुलाते हैं मस्ती से झूमने को ..... झाबुआ और अलीराजपुर जिले बरबस आकर्षण पैदा करते हैं

बुधवार, 4 मार्च 2009

उसने देखा मुझे ऐसे,

कल पानी की लिखी बात
होली पर गया गीत
देखा उसने मुझे आश्चर्य से
गया हो मुझसे जैसे जीत
फ़िर गर्दन घुमाई ऐसे
गोया हो मन का मीत
होली है सो लिख ली अपने पर
वरना है नही ये अपनी रीत

मंगलवार, 3 मार्च 2009

तिलक होली


हमारे स्थानीय अखबारों में धूम मची है पानी कैसे बचाए ? की
काफ़ी दिनों से जो सूझ पड़ा वो छपता जा रहा है । पानी बचाने सहेजने आदि की प्रवृत्ति पर बल दिया जा रहा है ।
जल अभिषेक , पानी रोको जैसे प्रयासों में सरकार भी लगी रही है ।
अब होली के दिन पानी बचाने का ढिंढोरा पिटा जा रहा है । कह रहे हैं पानी का अपव्यय रोकने के लिए यह जरूरी हो गया है की होली न खेली जाए ।
हमने पिछले कई बरसों से होली खेलना जरूर बंद कर दिया है मगर होली के बजाय रंगपंचमी पर हमारे नेता अपनी गैर निकालते है और त्योहारों की महत्ता प्रतिपादित कर संस्कृति बचाने की प्रेरणा का काम करते है इस दिन सारे शहर में मतवालों की गीली होली टंकारों से पानी उडाकर खेली जाती है , पानी बचाने की सुध इसमे नही ली जाती, क्यों?

आपकी बारी होली लिखने की

सोमवार, 2 मार्च 2009

रविवार, 1 मार्च 2009

होली मनाओगे कैसे ?

बारिश कम भई
जाने कौन की नजर लगी
अब होली कैसन खेले
पानी जो है नई

पूछा एक मित्र से भैया
अकाल पडत रहा
होली अब कैसे ?
कहत रहा : जाने कैसे

अखबार में पढा , लिखत रहे
तिलक होली मनाएंगे

घर में पानी रहा नही
अब क्या पड़ोसी नहलायेंगे?

कल टीरेंन में कहत रहे एक भाई
उज्जैन ने जल दूत की टीम है बनाई

लेकिन जाना जब हमहूँ
नालं में बहे रहा पानी से जियादा लहू

कहे रहे थे
पानी की लड़ाई थी

होली हम मनाएंगे चाहे तुम जो कर लो


बर्फ का लड्डू हो या विदेशी आईसक्रीम
चाहने वाले सारे जहाँ
होली है तो याद आ गया ठंडा
ऐसे दीवाने चाहे जहाँ
मैंने उडाते देखा समोसा चील को
यह जगह मालूम नहीं है कहाँ
कुछ याद आ जाए सुहाना गर
लिख भेजना अपने ब्लॉग पर
खेलो चाहे ना खेलो तुम
मगर होली तो मनायेगा सारा जहाँ