मंगलवार, 3 मार्च 2009

तिलक होली


हमारे स्थानीय अखबारों में धूम मची है पानी कैसे बचाए ? की
काफ़ी दिनों से जो सूझ पड़ा वो छपता जा रहा है । पानी बचाने सहेजने आदि की प्रवृत्ति पर बल दिया जा रहा है ।
जल अभिषेक , पानी रोको जैसे प्रयासों में सरकार भी लगी रही है ।
अब होली के दिन पानी बचाने का ढिंढोरा पिटा जा रहा है । कह रहे हैं पानी का अपव्यय रोकने के लिए यह जरूरी हो गया है की होली न खेली जाए ।
हमने पिछले कई बरसों से होली खेलना जरूर बंद कर दिया है मगर होली के बजाय रंगपंचमी पर हमारे नेता अपनी गैर निकालते है और त्योहारों की महत्ता प्रतिपादित कर संस्कृति बचाने की प्रेरणा का काम करते है इस दिन सारे शहर में मतवालों की गीली होली टंकारों से पानी उडाकर खेली जाती है , पानी बचाने की सुध इसमे नही ली जाती, क्यों?

आपकी बारी होली लिखने की

1 टिप्पणी:

विनीता यशस्वी ने कहा…

Hum logo ki yahi to problem hai...jo kaam karne chahiye unko na karke dusre kaam mai lage rahte hai...