गुरुवार, 12 मार्च 2009

होली के बाद अब गल और चूल

अब जहाँ तक मध्य प्रदेश के निवासियों का प्रश्न है गल और चूल से से वे वाकिफ हो सकते हैं मगर मैं सोचता हूँ किसी ने नजदीक से इसे देखा नही होगा ।
गल देव का मन्दिर इन दिनों बड़ी रौनक से भरा होता है , होली से रंग पंचमी के मध्य इन मंदिरों के अहाते में अपनी निष्ठा और मन्नते पूरी होने पर आदिवासी समाज एक रिवाज अदा करता है । यह रिवाज है लगभग ३० फ़ुट ऊँचे लकड़ी से बने फिरकीदार जो धरती के समानांतर घूमने वाला चक्र होता है, पर लटकाया जाकर पूरा किया जाता है । जहाँ तक चूल की बात है मैं मानता हूँ इससे अधिकतम लोग वाकिफ होंगे ही । चूल में जमीं में गड्ढा खोदकर अंगारे भरे जाते है और इस पर नंगे पैर चलकर अपनी मनाते पूरी की जाती या फ़िर मन्नत पूरी होने पर इस पर चलकर श्रद्धा अर्पित की जाती है ।
गल की पूरी जानकारी देना उचित रहेगा । एक लंबा खडा किया लकड़ी का ३० फ़ुट ऊँचा खम्भा जिसके उपरी सिरे पर लगी कील में जमीं के समानांतर लगभग १० से १२ फ़ुट का एक पाट जो बीच में से बाँट दिया जाकर कील पर घूमने लायक बनाया जाता है । इस पाट के एक सीरे पर आदमी को लटकाया जाता है और दुसरे सीरे को जमीन पर रस्सी से बंधकर जमीं पर दौड़ते हुए घुमाया जाता है ।
पहले जो व्यक्ति अपनी मन्नतों के पूरा हो जाने पर इस पर घूमना चाहता है उसकी पीढ में एक नुकीला कांटे दार हूक घुसा कर फंसा दिया जाता है। फ़िर उसे ऊंचाई पर पहुचा कर बांधा जाता है । उसकी मन्नत के अनुसार उसके रिश्तेदार जमीन पर भागते हुए जीते चक्कर वह बताता है उतनी बार घुमाते है । लोहूलुहान होकर अपनी ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट करने का यह साधन गल कहलाता है । काफ़ी बड़ी संख्या में लोग इस मन्नत का लाभ उठाते हैं । अब नई पीढी पीढ में हूक भले न लगवाए मगर कपड़े से बांधकर लटकने को बेताब रहती है । शादी सगाई आदि की मन्नतों की पूर्ति के बाद गल देवता के प्रति आस्था का यह विरला प्रकटीकरण है जिसमे २ वर्ष पहले जाकर देखने का मौका मिला था ......
आशा है भारत भूमि के विरले रिवाजो परम्पराओं से आप वाकिफ होकर सोच में होंगे ......

4 टिप्‍पणियां:

विनीता यशस्वी ने कहा…

Bahut achhi aur rochak jankari di apne...

Udan Tashtari ने कहा…

रोचक जानकारी-दिलचस्प!! आभार!

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर जानकारी दी आप ने
धन्यवाद

hem pandey ने कहा…

मेरे लिए नयी जानकारी है. मध्य प्रदेश के किस क्षेत्र में यह प्रचलित है- यह जानकारी दी होती तो और अच्छा होता. 'गल' देवता की जानकारी भी नयी है. उत्तराखंड के कूर्मांचल क्षेत्र में 'ग्वल्ल' देवता पूजे जाते है.