गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

रविवार, 26 अप्रैल 2009

रंग







शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

खताएं , अहसास और ज़माना



लाया अहसास सुनहरा पंछी
मन की मुरादे पाने की
संगीत झनझनाया ऐसे
पंक्तिया हों, गाने की
लबों पे बात आई , थम गई
अहसास नहीं लौटाने की
महसूस किया ऐसा कुछ
भरे भरे पैमाने सी
सपनीली आंखों में बसा क्या ?
बात किसे बताने की ?
कोई अपना होगा कहाँ
बेबसी इसी जमाने की
बतला भी तो सकते नही
निशब्द अदा है खताने की

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

आँखें


देखी आँखें जो आपकी

दिखा क्या नजर में ?

हसरते जो हमारी थी

फ़िर दिल बेकाबू हुआ

मगर निगाहें थी आपकी

जो समझ पाते ज़रा





गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

पानी और बिजली


पानी और बिजली, यह किसी फ़िल्म का टाइटल होने जैसा है। मगर सच तो यह है की यह जिंदगी के धरातल का अहम् हिस्सा है। पानी और बिजली सनातन सच है। बारिश के दौर में पानी के साथ बिजली को हमने सदियों से महसूस किया है। हम भूल गए हैं कि पानी और बिजली एक दूसरे के पूरक है।
पानी की जरूरत को आज घर-घर में बिजली का उपयोग कर सुविधाजन्य बनाया गया है। खेती किसानी में बिजली और पानी का सच भी हम जानते है। आज जो पैदावार किसान ले रहा है उसमे बिजली का बड़ा योगदान है इससे भी सभी वाकिफ है। किसान ने बिजली का दोहन किया और भूमिगत जल की बड़ी संगृहीत राशि को खाली कर दिया अब सतह पर और वर्षाजल के भरोसे रहा नही जा सकता। नदी तालाब और यहाँ तक कि उद्गम स्थलों तक पर इंसान ने अपना प्रभुत्व कायम कर डाला है। वोटों और नोटों की खातिर हम प्राकृतिक पर्यावास को ध्वस्त कर चुके है।
अब बिजली का संकट खडा है तो उसकी वजह है पानी का नदियों में ना होना। जब बिजली होती है तो सारा पानी सोख डालने का जतन होता रहता है। सिंचाई विभाग का दायित्व होता है कि वो पानी उपलब्ध कराये। कितना और कैसे इससे हमारा कोई वास्ता नही होता ।
अब बीते दिनों कि बात ले एक किसान मेरे पास आए और बोले : भैया बैंक से कर्ज दिला दो ।
मैंने पूछा : भाई क्यो?
उसने बताया : एक ट्यूबवेल खोदना है।
आपके पास जमीन कितनी है तो बताया : १२ बीघा
क्या कुआ है ? मैंने पूछा
हाँ है मगर पानी नही है
कोई ट्यूबवेल खोदा था ?
हाँ ४०० फुट का होल गिराया था ।
तो फ़िर अब नया होल क्यों ?
आस पास में ७०० से १००० फुट खोदा जा चुका है तो मेरे होल में पानी पूरा नही पड़ता
७०० से अधिक खोदे पर तुम्हे पानी मिल जायेगा ?
उम्मीद है , निश्चित नही कह सकता ।
अभी तक जो कुआ है उसका क्या इस्तेमाल करते हो?
वह बोला : ट्यूबवेल का पानी निकाल कर पहले इसमे भरता हूँ फ़िर कुए में इकट्ठा हुआ पानी खेत में लगाता हूँ ।
मैंने सोचा मामला गंभीर है बिजली का बेवजह दो बार उपयोग हो रहा है तो मैंने कहा : एक पानी कि टंकी क्यो नही लगाते बिजली बचेगी ? जतन करना। कुए में पानी बनाए रखने का उसे बंद मत कर देना ।
कहा : अगर कोई योजना हो तो बताओ , टंकी लगा लूंगा।
सोचा पानी का दोहन करेगा किसान, बिजली का दुरुपयोग भी मगर सुविधा के लिए शासन कि योजना चाहिए ।
मैंने कहा : बिजली का बिल जो भरते हो उतनी बचत से तुम्हारी टंकी कि लागत निकल जायेगी और बिजली का दुबारा उपयोग बेवजह नही होगा थोडा सोचो इस बारे में ।
उसने कहा भैया , आपके पास लोन के चक्कर में आया था ये क्या बताने लगे ?मैंने कहा : अगर आपको मेरी बात भली से समझ में आ जाए तो जमीन की गहराई में उतरने से बच जाओगे
वो बोला : कहते तो आप बराबर है मगर मेरे अकेले के बूते तो यह होगा नही ? अकेला चना भी कभी भाड फोड़ सकता है क्या ?
मैंने कहा : आप वो चना बने जो उगेगा और अनेक चने पैदा करेगा फ़िर भाड़ फूटने में देर क्या ?
वो खुशी खुशी गया , क़र्ज़ का भूत उतार कर ।
कह गया पानी बचाना ही बढाना है। आपने बिजली बचाने की जुगाड़ दे दी है तो बिजली भी बढ़ ही जायेगी।

सवारी का आनंद

what an idea जी want this karnaa जी
motorcycle बनेगी car जी
हमें पड़ेगा आराम जी
मिटेंगी तकलीफें जी
पर हो hindustaan में भी


मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

पंख

दिल को लगे पंख, लगा उड़ने
मन की तरंग, लगा कहने
देखा उसे, जिस जिसने
किया महसूस, हर किसीने
आज ठहरा हुआ था, अपने साथियों में
अपनी आजादी का जश्न मनाने

बता रहा था उड़ान में अपनी
देखा, जाना, क्या-क्या था उसने
बताया समय के भी आगे था वो
आख़िर निकल आए थे जो पंख

रविवार, 5 अप्रैल 2009

दुनिया से लुप्त हुए वन्य जीवों से रुबरु हों

सिरियन वाइल्ड एस
जावन टाईगर
पेसेंजर पिजन
पाय्रेनियन आइबेक्स
बूबल हर्तेबीस्त
बैजी रिवर डोल्फिन
तेकोपा पूप फिश
तस्मानियन टाइगर
गोल्डन टोड
कुअग्गा
कार्रेबियन मोंक सील


शनिवार, 4 अप्रैल 2009

गर्मियों के मजे

आई लुभावनी गर्मियाँ
लाई खुशियाँ दर्मियाँ
करेंगे मिलजुलकर एश
ठंडा ठंडा होगा पेश
कहीं पहाड़ तो कही नदियाँ
बुलाती सदा इसी दरमिया
गाना खाना और घूमना
नही फिकर के पढना लिखना
नानी मौसी मामी बुलाती
चाची अपने मैके ले जाती
फ़िर वापस आ सुनायेंगे किस्से
कैसी गर्मियां थी, तपती फ़िर से
पापा ने विदेश के प्रोग्राम बनाए
शादी ब्याह फ़िर माथे आए
जाना था अबके परदेश
पड़े हैं अब अपने ही देस

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

ये जो है जिंदगी

दुनिया के हर कोने पर घूमा
मगर देखा न एसा नज़ारा
नई सोच है
नई उमंग भी
प्यासा खरीदे पानी
ये जो है जिन्दगी

इन्द्रधनुषी रंगों में


बुधवार, 1 अप्रैल 2009

आज स्थापना दिवस है बर्ड्स वाचिंग ग्रुप का

१ अप्रैल २००० को बर्ड्स वाचिंग ग्रुप का गठन जन जाग्रति के उद्देश्य को लेकर किया गया । तब से अब तक विभिन्न गतिविधियों का संचालन कर हमने मध्यप्रदेश के भोगोलिक बदलावों के साथ अन्तरराष्ट्रिय मानदंडों को समर्पित होकर काम किए। जल जंगल और वन्य जीवो के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया।
शासन की विभिन्न योजनाओं में अपनी सहभागिता निभाई ।
रतलाम जिले में जो प्रेशर बर्ड्स वाचिंग ग्रुप ने बनाया उसके परिणाम सामने आने लगे। जिले में अपनी विशेष उपलब्धता से सबको रुझाने वाला परिंदा खरमोर आज संख्यात्मक रूप से वृद्धि को प्राप्त है तो इसमे ग्रुप की फाईंडिंग महत्वपूर्ण है ।
आज ९ वर्षीय कार्यकाल के दौरान समस्त प्रकार की पर्यावरणीय गतिविधिया संचालित करने के बाद मन में सुकून है की कहीं ना कहीं हमने अपने जीवन को सार्थकता देने में प्रयास किया है ।
उत्तर से दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में इस दरमियान सदस्यों ने ट्रेक्किंग, मोटर सायकल यात्रा, जंगल के दौरे करने के बाद सुझावों से भी वन विभाग को रुबरु कराने में कसर नही बक्षी। सघन वनों में रात गुजाने के अवसर सदस्यों ने नही गँवाए।
हेमिड हाईट्स , सुर सरोवर , माधव, सीता माता , गीर , गांधीसागर, बोरी, सतपुडा, बांदीपुर और कान्हा किसली जैसे स्थानों को महसूस किया। जंगल और प्राकृतिक दशाओं को समझा और कोशिश की ताकि लोग बाग़ वन्य जीवन की महत्ता को समझें।
कई लोग मोगली , चिडिमार के उपनाम भी देने लगे तो काफ़ी लोगों के लिए ये बड़ा ही कौतुक भरा विषय बना रहा। आज के भौतिकतावादी समय में जबकि लोग अपने खीसे भर रहे हों , पर्यावरण पर समय जाया करने को मुर्खता समझते हैं ।
१ अप्रैल को मुर्ख दिवस मनाया जाता है इसी बात को लेकर हमने मूर्खताएं की और पर्यावरण को समर्पित होकर काम किए बर्ड्स वाचिंग ग्रुप की स्थापना की और धन्य हुए ।
ग्रुप का ब्लॉग भी समर्पित किया और पाया की लोगों के लिए पर्यावरण कोई आकर्षक बात नही है । भारत को छोडें तो पायेंगे की लोग अधिकतम मानव अपने भोजन के लिए मांसाहार पर निर्भर करता है और जानवर उसके भोजन का अनिवार्य अंग है । इसको बचाने का काम जिनका भोजन है वो ख़ुद कर ही लेंगे हम चिंतित क्यो हैं?
धन्य है १ अप्रैल ..........