मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

पंख

दिल को लगे पंख, लगा उड़ने
मन की तरंग, लगा कहने
देखा उसे, जिस जिसने
किया महसूस, हर किसीने
आज ठहरा हुआ था, अपने साथियों में
अपनी आजादी का जश्न मनाने

बता रहा था उड़ान में अपनी
देखा, जाना, क्या-क्या था उसने
बताया समय के भी आगे था वो
आख़िर निकल आए थे जो पंख

3 टिप्‍पणियां:

विनीता यशस्वी ने कहा…

आज ठहरा हुआ था, अपने साथियों में

अपनी आजादी का जश्न मनाने

Achhi kavita...achhi picture...

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

seema gupta ने कहा…

बताया समय के भी आगे था वो
आख़िर निकल आए थे जो पंख

" बेहद नाजुक और सुंदर पंखो की चंचलता का सुंदर चित्रण.."

Regards