शनिवार, 2 मई 2009

कबर कहाँ कहाँ


एक सुंदर कबर देख
मन न माना
लगा दी पोस्ट
देखो दोस्त
कबर पे महफूज है कुरान
पत्थर को भी मिल गई जैसे जान
पौधों ने सुन्दरता बढ़ाई
किसी को देख किसी की याद आई
कोई किस्से बातें पुरानी
यार की भी तो थी कहानी
जायेंगे हम कभी
एकाध बना देना कबर हमारी कहीं
धूल न खाने देना, बस यही एक इल्तजा है
वरना कबर में रहना भी सजा है

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

गहरा दर्शन है आपकी बात में.

विनीता यशस्वी ने कहा…

Kavita aur picture dono hi achhe hai...

श्यामल सुमन ने कहा…

कब्र की शानदार तस्वीर। एक मशहूर शेर है बशीर बद्र साहब की-

जिन्दगी तू ने मुझे कब्र से भी कम दी है जमीं।
पाँव फैलाऊँ तो दीवार पे सर लगता है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

बहूत सुन्दर, बधाई हो