रविवार, 3 मई 2009

एक कहानी

एक कौवा था ।
बड़ा प्यासा था।
उसने अपने दोस्त से कहा भाई बड़ी गर्मी है और प्यास भी लगी है क्या करूं।
कौवा बोला चिंता न कर , हमारा शहर बड़ा दयावान है, गर्मी में पानी की व्यवस्था देता है ।
वो कैसे ? पहले ने पूछा । भाई हमें तो बड़ी मशक्कत करना पड़ती है । कंकड़ पत्थर मटकों में डालने पड़ते है तब जा के कहीं थोड़ा सा पानी नसीब होता है।
दूसरा कौवा उसे वाटर कूलर के पास ले गया ।
प्यासे कौवे ने कहा : ये कहाँ ले आए अलमारी में कोई पानी होता है क्या ? फ़िर यहाँ लोगों ने पीक मारकर गंदा कर रखा है ऐसी जगह पानी कैसे पीते हैं?
शहरी कौवे ने चोंच लगाकर पानी पीकर दिखाया ।
गाँव का प्यासा कौवा भी उसी तरह चोंच अडा कर पानी पीने लगा । पानी पीने के बाद उसने कहा भाई पानी तो बड़ा ठंडा था , व्यवस्था भी सुंदर कर रखी है मगर ये गंदगी रास नही आई।
कोई बात नही । अगली बार "पानी" खरीदकर पीना वो भी यहाँ उपलब्ध है।
क्या ? पानी खरीदकर ?
हाँ भाई बोतल बंद मिलता है न इसलिए ।
भाई कमाल है शहर भी

3 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

kahani aur chitra dono hi sunder hai.

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया कहानी . आनंद आ गया . बधाई.

Anil Pusadkar ने कहा…

करारी चोट की है आपने,पानी तो खरीद कर ही पीना पडता है।प्याऊ वगैरह तो जैसे अब गुज़रे ज़माने की बात हो गये।