सोमवार, 4 मई 2009

दर्पण

दर्पण से दिल ने पूछा : क्या राज है जो दूसरो को हु-ब-हु दिखा देते हो?
दर्पण ने कहा : मेरे दिल यानी शीशे से पूछो ये बात कि वो बिल्कुल साफ़ छान देता क्यों है?
दिल ने कहा : आगे से तो ठीक है मगर पीछे से कुछ भी नही दीखता ?
दर्पण ने कहा : ठीक ही तो है , जो बताना हो सामने ही बता लो , पीछे से क्या?
भाई बात तो ठीक कही मगर दीदार तो तुम बाहरी कराते हो.......
ग़लत कह रहे हो जनाब , दीदार मैं कराता नही , तुम्हारी सोच का रिफ्लेक्शन ही दीखता है तुम्हे फ़िर इसमे मेरी गलती कहाँ ? वैसे भी मैं तो तुम्हे ठीक उल्टा ही दिखाता हूँ और तुम इसे उल्टा समझते हो.....ज़रा पूछो अपने मन से

2 टिप्‍पणियां:

gargi gupta ने कहा…

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

गार्गी
www.abhivyakti.tk

hem pandey ने कहा…

दर्पण के बहाने गहरी बात कही है. साधुवाद..