शनिवार, 6 जून 2009

बचपन के दिन और पेपर कटिंग

हाई स्कुल के दिनों में मेरा संपर्क नए छात्रों से हुआ था । मैंने अपनी स्कुल जो माध्यमिक शाला थी को छोड़कर हायर सेकेंडरी में प्रवेश लिया था और मेरी मुलाक़ात अशोक कुलकर्णी से हुई यूँ तो आज तक मेरे संपर्क में कई सहपाठी है मगर अशोक उन मित्रों में है जो आज तक दोस्ती के रिश्ते की डोर से बंधा है ।
दीपावली के समय उसके घर जाना हुआ था और वो दिन मुझे याद है जब उसके हाथों से कटे कागज़ की सुंदर रचनाये में देख सका और उसकी इन रचनाओं से रु ब रु हो पाया । अभी पिचले बरस की बात है मैंने उसके घर जाने की बात फ़ोन पर की और वो मुझे स्टेशन लेने आया था उसके घर पहुँचने पर मालूम हुआ की उसकी माताजी का देहांत हुए मात्र पन्द्रह दिन बीते है और वह अभी सारे काम कर लौटा है । खैर उसक्र घर जाने का पहला अवसर मुझे समय पर ले गया था इसका संतोष रहा ।
उसकी बच्ची से मैंने पूछा की पापा की कला को वो सीख रही है या नही ?
अशोक ने जवाब दिया अरे भाई अभी व्यस्तता का दौर ऐसा है की समय नही है , लेकिन बिटिया को सिखाना तो है ही .......

एक मित्र राजेश भी है जो लगातार अपनी कला और प्रोफेशन के साथ नया कर रहा है आज वो भारत भर के उन १५ लोगों में शामिल है जो ठेवा कला के निष्णात है......
फ़िर कभी इस बारे में लिखूंगा मगर आज इतना ही काफ़ी है

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