मंगलवार, 24 नवंबर 2009

याद करें अपना बचपन

दौड़ती नदिया थी
बहता पानी था
क्या खूब घोड़े
और मस्ताना तांगा था

मम्मी के साथ जाते थे
नदी किनारे जब
खोल के कपडे
नहाने से पहले
देखो यही करते थे न सब ?
अब बदल गई है पावन नदिया
घोड़े बदले गाडी में
टी वी देख दिन गुजारते
पैसे के ठाठ हैं अब
बेहतर कहते जिंदगी इसको
सब कुछ चलता पैसे से
ख़तम हो गया बचपन अब तो
स्कूलों के ठेलम पेले में

3 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर कविता जी. धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

याद किया ...सही यथार्थ उकेरा रचना के माध्यम से.

seema gupta ने कहा…

सच कहा बचपन ना जाने कहां खो गया, सुन्दर रचना
regards