सोमवार, 16 अगस्त 2010

विनायक और गणेश की जन्म श्रुति वराह पुराण से

गणेश चतुर्थी प्रथमेश भगवान् गणपति की आराधना का पर्व है ,जिसे हम सभी भारत वासी श्रद्धा और प्रार्थना कार मनाते है । वराह पुराण में भगवान् गणेश की विघ्नहर, विनायक, गजास्य और भावपुत्र के रूप में उत्पत्ति का उल्लेख है । कथानक इस प्रकार है :
तप ही को धन मानने वाले ऋषियों के मार्ग में विघ्न आने लगे विघ्न निवारण के लिए वे भगवान् शंकर के पास गुत्थी सुलझाने की इच्छा लेकर पहुंचे ।

उन्होंने प्रार्थना कर कहा - " हे महादेव हम देवताओं से भिन्न असुरों के कार्य में ही विघ्न उत्पन्न करना आपके लिए उचित है , हमारे परोपकारी कार्यों में नहीं " ।

देवताओं के कहने पर भगवान् शंकर प्रसन्न हुए और निर्निमेष दृष्टी से भगवती उमा की और देखा । उन्हें विचार आया की पृथिवी , जल, तेज और वायु चक्षुगोचर होती है परन्तु आकाश की कोई मूर्ति नहीं दीखती ? ब्रह्मा जी के मुख से सुने शब्द याद आये की "शरीरधारियों की ही मूर्ति संभव है " और वे हंसने लगे । आकाश का शरीरधारी न होना के कारण इसकी मूर्ति असंभव है। फिर तो शंकर भगवान द्वारा पृथिवी , जल, तेज और वायु के सहयोग से एक अद्भुत कार्य संपन्न हो गया और उनकी हंसी थमने के पूर्व ही वहां उपश्थित समुदाय का समक्ष एक परम तेजस्वी देव कुमार प्रकट हो गया, उसका मुख तेज से चमक रहा था । सभी दिशाए इस तेज से चमकने लगी। भगवान् शिव के समस्त गुण उसमे सन्निहित थे । प्रकट होकर वह अपनी सस्मित दृष्टी , कान्ति, दीप्त मूर्तितथा रूप के कारण उपस्थित समस्त समुदाय को मोहित कर रहा था । उसका रूप बड़ा ही आकर्षक था ।
भगवती उमा उसे निर्निमेष दृष्टी से देखने लगी । माँ उमा की आँखें एकटक बालक को निहार रही देख कर भगवान् शंकर के मन में क्रोध का प्रादुर्भाव हो गया और उन्होंने शापित वाणी में कह दिया -" कुमार! तुम्हारा मुख हाथी के मुख सामान हो जाए और पेट लंबा भी । सर्प तुम्हारा यज्ञोपवित हो जाए । इतना कहने पर भी उनका क्रोध नहीं थमा जैसी जैसे क्रोध में उनका त्रिशूल धारी शरीर हिलता जाता रोम कुपो से तेजोमय जल के साथ अनेक विनायक उत्पन्न होते गए । उन सभी के मुख हाथी के मुख के समान और काले शरीर धारी थे । उनके हाथों में अनेक तरह

के अस्त्र थे । देवता सोचने लगे की हमारी अभिलाषा तो बालक के साथ ही पूरी हो गई थी मगर इसके चारों और ये गण कहाँ से आ गए ?

ब्रह्माजी विमान पर विराज मान होकर वहां आ पहुंचे और देवताओं से कहा की " देवताओं तुम धन्य हो तुमने त्रिनेत्री भगवान् रूद्र के कृपापात्र होकर असुरों के निकृष्ट कर्मो में विघ्न उत्पन्न करने वाले गणेश जी को प्रणाम करने सौभाग्य पाया।"
फिर वे भगवान् शंकर से बोले -" आपके द्वारा उत्पन्न यह जो बालक है इसे इन विनायकों का स्वामी बना दीजिए , यह मेरी प्रार्थना है। वर प्रभाव से आकाश को शरीरधारी बनने का और प्रथिवी आदि अन्य महाभूतो के साथ रहने का सुअवसर प्राप्त हो।" इससे एक ही आकाश अनेक विनायको के साथ व्यवस्थित हो जाए।" इस बात को सुनते ही समस्त विनायक वहां से चले गए । ब्रह्माजी ने कहा -" हे देव! आपके हाथ में समुचित अस्त्र है आप ये अस्त्र तथा वर इस बालक को दे देवे , यह मेरी प्रार्थना है । "
भगवान् शंकर तब उत्पन्न बालक गणेश से बोले -" क्रूर स्वभाव के ये सभी विनायक उग्र स्वभाव के हैं । पर ये सभी तुम्हारी सेवा करेंगे । देवताओं , यग्यदान आदि समस्त शुभ कार्यो में श्रेष्ठ स्थान तुम्हारा होगा । सर्व प्रथम पोजा पाने का अधिकार भी तुम्हारा होगा । एसा न होने पर उस कार्य की सफलता बाधित होगी । यह कहकर विभिन्न तीर्थ क्षेत्रो का जल लेकर भगवान् शिव ने उनका अभिषेक किया ।


देवताओं ने समस्त विघ्न शांत किये जाने की प्रार्थना की । अभिषेक और स्तुति के बाद वे माँ उमा के गोद में शोभा पाने लगे । यह सारी क्रिया चतुर्थी के दिन संपन्न हुई अतः तभी से यह तिथि सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त हुई । इस कथा के पठन और श्रवण मात्र विघ्न कभी भी पास नहीं फटकते हैं ।

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