रविवार, 28 नवंबर 2010

अब ये देख के आप क्या कहेंगे ?


नीलगाय की उड़ान


झूठा ही सही मगर है दमदार

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

लाचार हो जाती हैं परिस्थितियाँ जिनके आगे

दीपावली का त्यौहार बीता। शहर की परम्परा के अनुसार अगले दिन यानी पडवा/ प्रतिपदा के दिन अपने प्रियजनों से मुलाक़ात और बुजुर्गो का आशीर्वाद लेने के लिए उन तक जाने की परम्परा है। सुबह से लेकर शाम तक का यह दिन सुकून से बीता। दिन भर की मेल मुलाक़ात के बाद मैं घर जाकर भोजन करना चाह रहा था सो अपने मित्र से बिदा लेनी चाही, तो उसने कहा कि "सुबह खेत से सब्जी लाया हूँ वो बनी होगी, तो फिर तुम घर क्यों जाते हो, भाभी के हाथ कि बनी भरमा बैंगन की सब्जी और रोटी यहीं खा लो फिर पान खाने चौराहे पर चलते हैं, वहां भी कुछ लोगों से मुलाक़ात हो जायेगी।" यह प्रस्ताव मैं टाल न सका और हम दोनों मित्रों ने भोजन साथ किया। रात ९:०० बजे हमने सब्जी, सेव, अचार और गर्मागर्म रोटी खाई और ठंडा पानी पीकर तृप्त होकर पान खाने और दोस्तों से मिलने, मित्र की पुरानी राजदूत गाडी लेकर चल पड़े। सन २००६ की यह बात है । दिन भर एक साथ बिताते हुए कोई चर्चाए भी शेष नहीं रही थी सो आनंदपूर्वक आराम से खाली पड़े रास्ते पर चल पड़े। घर से ओवर ब्रिज और महाराणा प्रताप चौक पर लगी प्रतिमा से होकर गायत्री सिनेमा पहुँचने वाले थे, सामने से एक मोटरसायकल की बत्ती तेजी से पास आती दिखाई दी। सोच यही थी कि खाली पड़ी सड़क पर सब कुछ आसानी से गुजर रहा है, मगर यह क्या ? वो तो पास से गुजरने के बजाय आ टकराया और एक्सीडेंट हो गया ......
जब होश आया तो सिरहाने की तरफ कोई गुजरता नजर आया। उठने की कोशिश असफल रही। पास जो खडा दिखा उससे सहायता मांगी। उठकर खडा हुआ तो सर चकरा रहा था। कहीं जाकर बैठता इसके पहले अहसास हुआ की दाहिने हाथ में जबरदस्त दर्द है। फिर थोड़े होश में आने के बाद पाया कि मित्र जो पिछली सीट पर थे, अभी भी जमीन पर ही पड़े हुए हैं। अचेत पड़े मित्र को हिला डुलाकर उठाया। फिर गाडी देखी, जिससे गाडी की दुर्घटना हुई उसे तलाश किया। गाडी बुरी तरह क्षतिग्रस्त पड़ी थी। दाहिने तरफ गाडी के लेग गार्ड पर करारी चोट थी और अगले पहिये से जुड़े शोक एब्सोर्बेर पीछे मुड गए थे। मेरी चाल धीमी होने से अधिकतम झटका मेरे ही हेंडल पर आया था । राजस्थान, कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल आदि का मोटरसाईकल से दौरा करने के बावजूद कहीं कोई परेशानी नहीं आई मगर शहर में भीडभाड से मुक्त सड़क पर हादसा होना मुझे आज भी इंद्रजाल सा एहसास देता है। गाडी उठा नहीं सकते थे। सामने वाले वहां से रवाना हुए या नहीं पता नहीं मगर एक भागने वाले की गाडी का नंबर इस उहापोह में मोबाईल पर डायल कर लिया। पुलिस के एक दोस्त को खबर देना चाही तो उसका मोबाईल नो रिप्लाय हुआ। उस वक्त के एस पी वरुण कपूर मेरे अच्छे मित्रों में होने के बावजूद रात के लगभग १०:२० बजे उन्हें बताना उचित नहीं लगा और नगर सुरक्षा समिति के सुनील शर्मा को बात कह डाली और उन्हें स्पोट पर बुला लिया। मैंने पाया कि अमित और कैलास हादसे के चश्मदीद थे। सुनील शर्मा मेरे पारिवारिक मित्र भी हैं सो उन्होंने छोटे भाई को साथ में लेकर मुझे अस्पताल ले जाने का जिम्मा ले लिया। अस्पताल में अन्य मित्र तुषार, भारत, कमलेश आदि भी आ धमके। अस्पताल जब पहुंचे तो वहां का नजारा बड़ा ही ह्रदय विदारक था। दो दलों कि आपसी लड़ाई हुई थी और हाथ पैर सर कटे-फटे होकर वे लुहुलुहान हालत में वहां लाए जा रहे थे। पत्रकारों कि भी भारी भीड़ यहाँ उपस्थित थी। फिर रोटरी सेन्ट्रल के अध्यक्ष के रूप में मेरी दुर्घटना की खबर अखबार में जा छपी। चिकित्सक कि हालत यह थी कि वे किस किस को देखे और इलाज सुलभ कराए ? मुझे देखने के बाद उन्होंने सलाह दी कि आप घर जाओ, अफेक्टेड हिस्सों कि बर्फ से सिकाई करो, फिर सुबह आकर एक्स रे करा लेना। यहाँ से निवृत्त होकर ऍफ़ आई आर दर्ज कराने के लिए थाने जाना पडा। वहां का स्टाफ गश्त पर होने से अस्पताल में बयान संभव नहीं थे। गाडी के नंबर की रिपोर्ट लिखाई और फिर भाई और सुनील से सही गाडी पता करने को कहा। वे गाडी देखने फिर से स्पोट पर जाकर आते तब तक मुझे जो लिखाना था वो मैं लिखा चूका था, गाडी का नंबर गलत था जिसे बाद में संशोधित कराना पड़ा।
इतनी बुरी बीत जाने के बावजूद घर पर खबर नहीं दी थी क्योंकि बेवजह दौड़ भाग रात को न करना पड़े। घर जब पहुंचा और माँ पिताजी को वाकये के बारे में बताया तो वे सुरक्षित देखकर भगवान् का शुक्रिया कर रहे थे। बिस्तर पर सोना चाहा तो दर्द के मारे सोने में तकलीफ आरही थी। फिर बिस्तर को तकियों से उंचा किया और सीने पर हाथ धरे तो पता नहीं कब नींद आ लगी। सवेरे भी जल्द ही नींद खुल गई। अब सुबह सरकारी अस्पताल में एम् एल सी कराना थी और फिर इलाज के लिए नर्सिंग होम जाना था।
नर्सिंग होम में फिर से एक्स रे कराया गया। एक्स रे की रिपोर्ट जब सुनी तो पता चला की दोनों हाथों में फ्रेक्चर है। मैंने एक्स रे मंगवा कर देखा और मैं जोर से हंस पडा। एक्स रे देखकर डॉ का ओपिनियन था कि ऑपरेशन करना ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि हड्डी के टुकड़े अधिक हैं और इन्हें एक जगह रखना जरूरी है। यह बात सभी को मालूम थी और मैं एक्स रे देखकर हंस रहा था तो जितने भी लोग वहां थे सभी आश्चर्य से मुझे देखने लगे। मेरी हंसी संवेदना भरे माहौल में अचरज से भरी तो होना ही थी। उन्होंने आखिर सब्र तोड़ते हुए उन्होंने मझसे पूछ ही लिया की हँसते क्यों हो? अब जब किसी के दोनों हाथ टूटे पड़े हो तब कोई हंसेगा भला क्यों? इस हंसी का उनके लिए कोई मतलब भी तो नहीं था। इसवक्त तो चेहरे पर पीड़ा और रुलाई होनी चाहिए थी और मैं हँसे जा रहा था। ठहाके लगा रहा था।
दरअसल मैं परिस्थिति पर हंस रहा था। सोच रहा था वाह रे प्रभु लीला तेरी। सुबह तक तो सोच रहा था कि एक हाथ ही टूटा है मगर अब तो दोनों ही हाथ टूटे हैं। अपनी बेबसी पर वाकई मुझे रोना चाहिए था मगर प्रातःकर्म के उपरान्त सफाई कैसे करूंगा यह प्रश्न मुझे हंसा गया। कल इस काम के लिए भी मुझे सेवाए लेना पड़ेगी क्या? आदि। खैर सुबह से बगैर कुछ खाए पिए था सो ओपरेशन के तयशुदा समय पर मुझे थियेटर में ले जाने की तैय्यारी हुई। मैं चलकर वहां पहुंचा। मुझे अस्पताल की ड्रेस पहना दी गई। फिर हाथो से रोम के बाल हटाने का काम एक दाई करने आई। उसके तरीके से मुझे डर लगा कि कहीं ये रेज़र से हाथ न काट दे। मैंने उससे कहा आप तो ये रेज़र मुझे दे दो मैं बाल हटा देता हूँ। वो हंसी और बोली भैय्या कैसे करोगे? दोनों ही हाथ तो टूटे पड़े हैं। हँसते हंसाते ये बाल साफ़ हो गए। फिर दवा का लेप लगाने की शुरुआत हो गई। उसने कहा भैया आज तक कितने ही मरीज देखे मगर आज पहली बार है कोई जो अपने ओपरेशन से पहले हंस रहा है।
मैं टेबल पर जा लेटा। बी पी लिया गया, सलाईन चढ़ाई जाने लगी, इधर दवा का लेप निरंतर जारी था। आसपास नजरे दौडाई तो महसूस किया कि बेहोश करने वाले और हड्डी विशेषज्ञ के मध्य मौन संवाद हो रहा है कमरे में मुझे कुछ नए प्रशिक्षुओं उपस्थिति भी जान पड़ी अचानक पैरों में जलन का अहसास होने लगा और मै अचानक से "गायब" हो गया।
जब बेहोशी टूटने लगी तो मुझे स्वर्णिम आभास हो रहा थामेरे चारों तरफ सुनहरी रौशनी थी। मैं उड़ सा रहा था। मेरा शरीर हल्का फुल्का रुई सा लगने लगा था। बचपन में यदाकदा दिखनेवाला सपना दिखाई देने लगा। फिर आसपास में आवाजे और हलचल सुनाई देने लगी। मुझे लगा मैं कुछ बुदबुदा रहा हूँ। मिडास इफेक्ट से मैं आज तक प्रभावित हूँ और वो क्या नजारा था सोच कर आज तक ख़ुशी होती है। आँखे अब धीरे धीरे खुलने लगी थी, आवाजो से अंदाजा हो रहा था कि कमरे में इसवक्त माँ उनकी सहेली और मेरे कुछ मित्र आ आ कर देख रहे हैं। मैंने माँ से पूछा था परिधि और पारुल के बारे में। वे स्कुल से घर जाकर खाना खाकर अस्पताल आ चुकी थी।
मैं अब होश में था और चिकित्सकों का आभार मान रहा था। मेरी उम्मीद से अच्छा अनुभव जो मुझे हो रहा था। डॉ विपिन माहेश्वरी ने कक्ष में प्रवेश किया मुझे देखकर वे हँसे और फिर हिदायत दी कि उठाने के बाद सबसे पहले पेशाब करना जरुरी है। थोड़ी ताकत का जब अहसास हुआ तो मैंने हिदायत का पालन करने कि बात कही। अब कमरे में तुषार और भारत थे सो मैंने उनसे डॉ की बात बताई और मुझे मूत्र विसर्जन के लिए मदद की बात कही। मैं पलंग से उठा और जब खडा होना चाहा तो अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। शायद यह एनेस्थीसिया का असर रहा होगा। पायजामे का नाड़ा तुषार ने खोला और मुझे थामे खडा रहा। कार्य संपादित किया तो मुझे एहसास हुआ कि जैसी मेरी कल्पना थी वैसा नहीं है अगले सवेरे मुझे किसी की मदद नहीं लेना पड़ेगी।
अरविन्द घर से थुली बनवा के लाया और पापड के साथ मैंने यह भोजन किया। मैंने खाना खाकर सोने की इच्छा जताई और थोड़ी देर सोया भी। फिर देर रात तक मुझसे मिलने आने वालों का तांता लगा रहा तो अस्पताल के कर्मचारी मेरी मित्रमंडली देखकर हैरत में थे। इतने ज्यादा लोग मिलने जो आ रहे थे । सुबह घर के लिए रवाना किया जा रहा था तो बताया गया की प्लास्टर 45 दिन तक लगा रहेगा।
दीपावली के त्यौहार के तुरंत बाद अपंगता का यह अहसास लिए और घर आने वाले लोगो में कुतूहल का पात्र होकर एक अजीब अहसास का केंद्र बिंदु भी बना। आज मैं बिलकुल ठीक हूँ।
अपनी बेबसी पर ठहाके लगाकर परिस्थितियों से जूझने वाले लोग प्रायः कम ही होते हैं इसका अहसास और अनुभव लिए मैं उन लोगो के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होंने मुझसे बड़ी विपदाए झेली हैं और आज तक जिन लोगो के सामने परिस्थितियाँ लाचार दिखाई देती है।

नवजात हिप्पो की मौत से जन्मे प्रश्न

जनम से कुछ ही मिनटों पश्चात लिया गया नंदा एवं नवजात का फोटोग्राफ

कल खबर पढ़ी की हिप्पो ने इन्दोर चिड़ियाघर में एक शावक को जन्म दिया है । सुनकर ख़ुशी हुई ही थी कि अगले ही दिन यह पढ़ा कि यह नवजात बच्चा माँ के पैरों तले रौंदा गया । समाचार में लिखा गया कि माँ घांस खाते वक्त बच्चे का ध्यान नहीं रख सकी । फिर जब चिड़ियाघर कि कार्य प्रणाली पर रूमनी घोष से चर्चा हुई तो मेरा स्टेंड था कि जनम के के बाद कुछ दिन तक माँ और शिशु को अईसोलेशन में रखा जाना चाहिए था । दरियाई घोड़े का प्राकृतिक वातावरण बेहद अलग किस्म का है । दक्षिण अफ्रीका के देशों में इसके प्राकृतिक आवास में इसे मगरमच्छ जैसे जीव के साथ साझा होकर अपना जीवन पानी और जमीन पर बिताना होता है । वहां जब यह बच्चे पैदा करते हैं तब बच्चे कि सुरक्षा के लिए यह बड़ी ही आक्रामक हो जाती है किसी भी जीव को वह अपने तथा बच्चे के समीप बर्दाश्त नहीं करती है । मगरमच्छ से मुकाबले कि अनेकों घटनाएं वीडियो में दर्ज हैं । इन्दोर चिड़ियाघर के अधिकारी चिड़ियाघर से कमाई की ताक में रहते हैं और उन्हें वहां रखे गए जीवों के बारे में पर्याप्त जानकारियाँ भी हैं एसा महसूस नहीं होता । एक हिप्पो की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त जगह नहीं होने के बावजूद चिड़ियाघर को फ्रेंडशिप एक्सचेंज में मिले प्राणी की देख रेख का जिम्मा सौपा जाना भी संदेह के घेरे में है । वन्य जीवों के लिए कार्य करने वाली संस्थाए इन्दोर में निश्चित होंगी मगर अब तक उनकी चुप्पी देखकर हैरानी होती है ।
जैसा की मुझे सूत्रों से पता चला उनके अनुसार दरियाई घोड़े को विशिष्ट आकर्षण का केंद्र बनाने का प्रयास भी हुआ है । हिप्पो द्वारा प्रजनन की ख़बरों को उछाला गया है। समाचार का केंद्र बनाने का प्रयास हुआ है । चिड़ियाघर प्रशासन इन बातों को नकारता है । उनके अनुसार हिप्पो को पर्याप्त जगह उपलब्ध है । शेल्टर रूम भी सामान्य है । प्रभारी अधिकारी का यह बयान उचित नहीं लगता है । जू अथोरिटी ऑफ़ इण्डिया द्वारा यहाँ का निरिक्षण ही इन सारी विसंगतियों से पर्दा हटा सकेगा ।
हिप्पो भारत के चिड़ियाघर में रखे जरूर गए हैं मगर उनके लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय नियमो का पालन हमारे लिए जरूरी था । इन नियमों का पालन नहीं हुआ है जो कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने हमें शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है ।
जू से सम्बंधित अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर इस बाबत कार्यवाही होनी चाहिए । इस बात की वकालत बर्ड्स वाचिंग ग्रुप भी करता है।

कहाँ हो जी आप ?


मंगलवार, 23 नवंबर 2010

कसाब और हमारे सिद्धांत .....

"कसाब को फांसी न दे "पढ़ा , तर्क था "वे उसे शहीद समझने लगेंगे"।
शहीद वो समझें या कुछ और मगर अभी भी तो वह उनकी निगाह में रण पुरुष है जो मुजाहीदीन होकर सब्र से गिरफ्तारी भुगत रहा है।
धर्म विमुख क्रूर शासन के विरुद्ध उसके प्रयास सराहनीय हैं । स्वतंत्रता और धर्म का यह रक्षक इसी बात से आहात होकर हथियार उठाने को बाध्य रहा । उसे बे वजह आतंकवादी करार किया जा रहा है ।
वाह जी वाह इसे ही तो कहते हैं चित भी मेरी , पट भी मेरी और सिक्का हमारे खानदान का ।
महात्मा गांधी जी ने कहा था " यदि कोई एक थप्पड़ रसीद कर दे तो दूसरा गाल भी आगे कर दें । अब हमें इस बात से प्रेरित होना चाहिए कसाब को अब एक बार फिर हथियार थमा कर उससे निवेदन करना चाहिए की हे महामना मृत्यु के देवता ने आपको संहार शक्ति प्रदान की आपको अपना दूत बना कर उद्धार करने की खातिर भारत भूमि पर भेजा हम आपकी राह के कांटे क्यों बने ? आप एक बार फिर हथियारों का उपयोग कर यमलोक भेजने का महान कार्य करें । आपकी बड़ी कृपा होगी .....
एक सूक्ति और भी है " घृणा अपराध से करो अपराधी से नहीं " आप हम जैसे तुच्छ प्राणी यमराज जी के भेजे दूत तुल्य व्यक्ति को अपराधी कहने की गलती ना करें।
अरे हाँ अतिथि देवो भव का अनुसरण तो हम कर ही रहे हैं । कसाब पर हो रहे खर्च इसकी सापेक्षता ही तो हैं न ।
धन्य है वह ब्रह्म राक्षस जिसने विचार उपजाया । नया आयाम विचारों को दिया । महापुरुषों की थाती लिए हमारा देश इससे यह याद कर पाया कि करता का कर्म ही श्रेष्ठ होता है । हमें नतमस्तक होकर उन रण बांकुरों का स्वागत करना चाहीये जो हमारी निरंतर बिना अंकुश के बढ़ रही जनसंख्या पर नियत्रण लगाने में सहायक सिद्ध हो ।

सोमवार, 22 नवंबर 2010

नाईट गोल्फ इन वड़ोदरा


जी हाँ ट्रेज़र बाल जो हित करने के बाद पांच मिनिट तक चमकती है । ऐसी गेंद लेकर यह रात्री टूर्नामेंट रचा गया है । सारी दुनिया में यह पहला प्रयोग वड़ोदरा शहर में हुआ है । बगैर फ्लडलाईट के यह मैच संभव हो सका ।
बधाई भाई अजय आपको और नफीस भाई को । वी एन एम् न्यूज़ देखकर फिर फेस बुक देख कर मजा आया । सुरिंदर अंकल को इस भागीदारी के लिए तथा संकल्पना के लिए बधाई ।

शनिवार, 13 नवंबर 2010

सिर चढ़े : एक कहानी

रोज़ सवेरे नियत समय पर उनकी टीम मोहल्ले की गली नालियों की सफाई के लिए बिना नागा किए पहुँच जाती । गाडी झाड़ू फावड़े लेकर वे लगभग मोहल्ले की गली का ७से ८ हजार मीटर का फर्श साफ़ कर दमका जाते ।

सवेरे उढ़कर घुमने जाना फिर लौटकर बगीचे में पानी और सूखे पत्तों को ईकट्ठा कर उनकी गाडी में डाल देना ये रोज़ का काम बन गया । उनके दल में सदस्य बदलते रहते मगर उनके कार्य के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण ने मुझ प्रभवित कर डाला।

आज सुबह भी जब लौटा तो सडकों पर सफाई का काम जारी था । सड़क और पास की जमीन चकाचक साफ़ हो चुकी थी । बगीचे में अपना शौक पूरा किया तब तक वे गाडी लेकर गलीयो में जाने लगे । आज छुट्टी का दिन था । दीपावली का समय भी था तो थोड़ा अधिक समय साफ़ सफाई और बगीचे में देना सोच रखा था । वे अभी गली साफ़ कर थोड़ा ही आगे बढे होंगे की तभी मेरी नजर हवा में लहरा कर आती एक थैली पर पड़ी जो किसी ने गली में उछाल कर फेंकी थी । इसी के साथ एक और महाशय गली में खुलने वाली खिड़की से मुह बाहर निकालकर कुल्ला करते दिखे उसके बाद तो वे लगातार ब्रश कर झाग थूकते रहे जो मैं देख सका। उनकी पत्नी प्याज के छिलके सुबह सवेरे उड़ा गई । अन्य लोग भी रात भर का इकट्ठा किया फेंकते रहे । बमुश्किल आध घंटा हुआ होगा और गली का नजारा वही था जो सफाई के पहले था ।

अगले दिन जब वे आए तो मैंने तय किया की उनसे बात करूंगा । मैं बोला जनाब अगर आप लोग थोड़ा विलम्ब से अपना काम करें ताकि सुबह लोग उठ जाने के बाद घर का कचरा फेंक सके । वो हंस दिए और उन्होंने कहा ठीक एसा ही होगा ।

दुसरे दिन शाम को जब घर लौटा तो गन्दगी से मुहला पता देख कर घर पर पूछा तो पता चला की आज दोपहर २ बजे वे सफाई कर गए है। और मोहल्ले के लोग सवेरे गन्दगी साफ़ न होने से चिंतित होने के बारे में भी पता चला । पूछताछ करने पर मालूम हुआ की गन्दगी में कचरा फेंकने जाना उन्हें रुचिकर नहीं लगा था । मैं आश्चर्य में पड़ गया था दिन भर गंदगी से पते पड़े रहने वाले मोहल्ले के लोग इतने सफाई पसंद है यह जानकार मैं हैरान जो रह गया था ।

सवेरे सफाई कर्मियों से मुलाक़ात की । उनसे पूछा कि इतने बद मिजाज नागरिकों के बावजूद आप लोग अपना काम चुपचाप कर जाते हो बगैर किसी शिकायत के । फिर जब सुबह खाली कचरागाडी ले कर आते हो तो वाह खाली होती है तो क्यों न मोहल्ले वालो से कहा जाए कि इसी में कचरा डाल दिया करें । कैसा रहेगा यह उपाय ?

वे बोले हम किस हक़ से यह बात कहेंगे ? किसी का दरवाजा बजाकर तो कचरा इकट्ठा किया नहीं जा सकता है न ? आप जैसे लोग कम है साहब जो सोचते हैं... आपने देखा ही है समय बदने का नतीजा भी ।

मै चुपचाप लौट आया

काफी देर मनन किया फिर एक बैठक के बारे सोच कर अगली छुट्टी के दिन मोहल्ले के लोगों को घर बुलवा कर नाश्ते का आयोजन रखा और "मोहल्ले कि सफाई" के एक मात्र एजेंडे पर चर्चा कि । बड़े अचरज भरे तर्क सुनाई दिए । एक ने कहा कि "सफाई होती ही कहाँ है ?" दुसरे का मत था "नगर निगम देखती ही क्या है ?"

तीसरे का मत था "सबको घर बैठे पैसा चाहिए , काम धाम का क्या है ?

मैंने सुझाव दिया की "सवेरे यदि गाडी लेकर सफाई कर्मचारी , दूधवाले की तरह घंटी बजा कर कचरा इकट्ठा कर ले तो? मै अपनी बात पूरी करता इसके पहले ही सभी एक साथ बोल पड़े " रहने दो भैया , कल को ये हमसे पैसा मांगने लगेंगे । इन्हें सर पे चढ़ाना ठीक नहीं । "

अब मै सोच रहा था की आखिर सर चढ़े कौन हैं? ये या वे ........

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

रूबेला टीकाकरण : ब कलम - राजेश घोटीकर



रोटरी अंतरराष्ट्रीय मंडल ३०४० ने रूबेला टीकाकरण अभियान अपने हाथों में लिया है । रूबेला आखिर है क्या ? यह क्यों किसे और क्यों करवाना चाहिए जैसे विचार अब आपके जेहन में उमड़ पड़े होंगे । आईये इन बातों से रु ब रु हो जाए ?

२००३ में रतलाम पुलिस के साथ पंचायत और समाज कल्याण विभाग के सहयोग से मुझे यह शिविर लगवाने में कामयाबी के बाद जब सुना की हमारी मंडलाध्यक्ष श्रीमती नलिनी लंगर जी ने इस वैक्सीनेशन पर विचार किया है तो मैं सचमुच भीतर से आनादित हो गया ।

जैसा मेरा अनुभव है उसके अनुसार यह वेक्सिनेशन के लिए व्यवस्थाओं का सिलसिला आपको ,आपके क्लब को करना पड़ेगा इसी विचार से आपको आपको सूचित कर रहा हूँ ।

रूबेला क्या है? : रूबेला एक वायरस है । यह हमारे आसपास मौजूद हवा में ही होता है । संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आ जाने से भी यह फैलता है ।

टीकाकरण क्यों ? : जब आप छोटे बच्चे थे लगभग १२ से १५ महीने की आयु के तब आपको एम् एम् आर यानी मम्स मीज़ल्स और रूबेला का वेक्सीन लगाया गया था । आपने बड़े होकर अपने बच्चो को भी इसे लगवाया ही है । यह आपकी संक्रमण से प्रतिरोध क्षमता बढाने के लिए लगाया गया था । सामान्य तौर पर इस वायरस पर कोई ध्यान नहीं देता मगर चुपके से संक्रमित कर यह माँ बनने जा रही गर्भवती माँ के लिए बेहद घातक है । गर्भ गिर जाने से लेकर जन्मजात विकृति लिए पैदा होने वाले बच्चो का महत्वपूर्ण कारण है। जनम लेने वाली संतान में इसका प्रभाव विभिन्न विकृतियों को दिखाता है । आईये जाने जन्मजात विकृतियों को और यह भी की इसका संक्रमण किस तरह का होता है ।

जन्मजात विकृतियाँ

बहरापन ६० से ७५ %

ह्रदय सम्बन्धी खराबियां ४० से ५० %

आँखों की खराबिया ५० से ९० %

मानसिक बाधा २५ से ४० %

उपरोक्त चार्ट देखने भर से आप समाज गए होंगे किरूबेला का संक्रमण एक गर्भवती माता को हो जाना कितना घातक होता है। और इस संक्रमण से प्रभावित होकर जन्मे शिशु परिवार के लिए कितने परेशानी भरे हो सकते हैं ।

भारत में इस वायरस के संक्रमण कि दर ४० से ५० % अनुमानित है ।

अभी पिछले दिनों ट्रेन में चढ़ा तो सामने वाली सीट पर एक परिवार बेहद चंचल बच्चे के साथ चढ़ा । बच्चे को कोक्लियरलगा देख कर बहरेपन कि निशानी जानी । मेरे परिवार से जुडी डॉ गोखले कि पोती के बाद रतलाम से यह दुसरा बच्चा है जिसे कोक्लियर लगाया गया है । इसे लगवाना यानी ७ लाख रुपये के साथ प्रशिक्षण खर्च और प्रतिदिन ३० रुपये बेटरी पर खर्च , मायने रखता है जी । बातचीत में पता चला कि यह बच्चा बहरेपन के अतिरिक्त ह्रदय विकार से भी ग्रस्त है जिसके लिए रूबेला का संक्रमण ही दोषी है ।

रूबेला के लक्षण : रूबेला गंभीर जन्मजात विकृतिया देने के बावजूद कोई विशिस्ट लक्षण संक्रमण के दौरान प्रकट नहीं करता । चुपचाप अपना असर छोड़कर चला जाने वाला वायरस है । इसके संक्रमण से मरीज को हल्का साधारण सा बुखार होता है कभी कभी हलके लाल चकत्ते या रेशे भी दिखाई देते हैं । लगातार चिकत्सक कि निगरानी के बावजूद इसका इन्फेक्शन मालूम नहीं पड़ता ।

मातृत्व के दौरान विभिन्न समय में यह कैसे प्रभावित करता है इसे जाने यह ३से ११ सप्ताह के भीतर १००% , १२ वे सप्ताह में ८०% , १३ से १४ सप्ताह के दौरान ५४% , १४ से १६ सप्ताह में ३५% , २३ से २६ वे सप्ताह में २५% तक अपने संक्रमण से प्रभावित करता है ।

रूबेला संक्रमित व्यक्ति का उपचार संभव नहीं है इसीलिए इसका टीका यानी वेक्सीन सुरक्षा प्रदान करता है । एक बार टीका लगाने भर से १५ वर्ष तक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है । तो ठीक ही किया न हमने कि टीकाकरण के बारे में सोच कर ।

वेक्सीन कब : जैसा पहले ही बताया कि १२ से १५ वे माह में एम् एम् आर से हमने अपने बच्चों कि प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि की। योवानारम्भ के साथ यह टीका खासतौर पर कन्याओं को लगाए जाने की अनुशंसा चिकित्सा जगत करता है । यह स्वेच्छिक वेक्सीन है मगर इसके बारे में व्यापक जन जाग्रति नहीं है । अगर मै आपको नहीं बताता तो शायद आपको भी इतने विस्तार से जानकारी नहीं होगी । तो अब आप रोटरी का धन्यवाद करें मंडलाध्यक्ष जी का भी धन्यवाद करे क्योंकि आप अब समाजसेवा के एक नए स्वरुप के साक्षी होकर कुछ नया करने जा रहे हैं ।

अब नई समस्या की यह कैसे होगा? यानी वेक्सीन लगाने के लिए किस प्रकार की तैयारियां करना है आदि । चलिए उन्ही बिन्दुओं पर चर्चा करें ।

सबसे पहले आप ९ वी से कोलेज स्तर की छात्राओं को टार्गेट बना ले । किसी स्कूल या कोलेज में ही जाकर प्रशीक्षीत मेडिकल स्टाफ की निगरानी में यह काम कर पायेंगे यह ध्यान रखें । वातावरण में थोड़ी ठंडक आने का इंतज़ार करें । विद्यालय परिवार से संपर्क कर उनसे चर्चा करे । परिक्षा के नजदीक का समय छोड़ दें । फिर एक शिविर के माध्यम से बताए कीआखिर यह वेक्सीन क्यों लगवाया जा रहा है । शिविर में किसी को अपना मुख्य अतिथि बनाए और साथ ही चिकिसक जो उन्हें समज़ाए की इस वेक्सीन का उनके आगामी जीवन से कितना गहरा नाता है ।

इस दौरान जिन्हें ये टीके लगाना है उनके माता ओर पिता की इस बाबत सहमती भी लगेगी इसके लिए उन्हें एक फॉर्म दे देवे जिसमे टीका लगवाने वाले का नाम /उसके माता व् पिता का नाम /पता/ संपर्क के साथ यह घोषणा की वेक्सीन के बारे में उन्होंने समझ लिया है और वे अनुमति देते की यह टीका उनकी पुत्री को लगाया जाए । इसी पर्चे में वेक्सीन लगाए जाते वक्त यह फॉर्म लेकर आने तथा वेक्सीन कब और कहाँ लगाया जा सकेगा इसकी सूचना प्रिंट करा लें ।

जिलाधीश , सी एम् ओ , सिविल सर्जन को पत्र लिख कर सहयोग लेवे । प्रशीक्षीत नर्स की व्यवस्था के बारे में विस्तार से समयबद्ध चर्चा भी कर लेवे । सिर्फ पत्र दे देने भर को ही दायित्व न मान ले ।

पोलियो अभियान के बाद जन्मजात विकृतियों से सामना करने का यह प्रयास रोटरी के जरिये आप का सम्मान बढ़ाएगा इसलिए रोटरी का आभार जरूर मानियेगा ।

बुधवार, 10 नवंबर 2010

उड़नेवाला तैराक


जी हाँ ये उड़न मछली ही है । मगर यह उड़ती पानी में है .......

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

सोमवार, 1 नवंबर 2010