गुरुवार, 25 नवंबर 2010

लाचार हो जाती हैं परिस्थितियाँ जिनके आगे

दीपावली का त्यौहार बीता। शहर की परम्परा के अनुसार अगले दिन यानी पडवा/ प्रतिपदा के दिन अपने प्रियजनों से मुलाक़ात और बुजुर्गो का आशीर्वाद लेने के लिए उन तक जाने की परम्परा है। सुबह से लेकर शाम तक का यह दिन सुकून से बीता। दिन भर की मेल मुलाक़ात के बाद मैं घर जाकर भोजन करना चाह रहा था सो अपने मित्र से बिदा लेनी चाही, तो उसने कहा कि "सुबह खेत से सब्जी लाया हूँ वो बनी होगी, तो फिर तुम घर क्यों जाते हो, भाभी के हाथ कि बनी भरमा बैंगन की सब्जी और रोटी यहीं खा लो फिर पान खाने चौराहे पर चलते हैं, वहां भी कुछ लोगों से मुलाक़ात हो जायेगी।" यह प्रस्ताव मैं टाल न सका और हम दोनों मित्रों ने भोजन साथ किया। रात ९:०० बजे हमने सब्जी, सेव, अचार और गर्मागर्म रोटी खाई और ठंडा पानी पीकर तृप्त होकर पान खाने और दोस्तों से मिलने, मित्र की पुरानी राजदूत गाडी लेकर चल पड़े। सन २००६ की यह बात है । दिन भर एक साथ बिताते हुए कोई चर्चाए भी शेष नहीं रही थी सो आनंदपूर्वक आराम से खाली पड़े रास्ते पर चल पड़े। घर से ओवर ब्रिज और महाराणा प्रताप चौक पर लगी प्रतिमा से होकर गायत्री सिनेमा पहुँचने वाले थे, सामने से एक मोटरसायकल की बत्ती तेजी से पास आती दिखाई दी। सोच यही थी कि खाली पड़ी सड़क पर सब कुछ आसानी से गुजर रहा है, मगर यह क्या ? वो तो पास से गुजरने के बजाय आ टकराया और एक्सीडेंट हो गया ......
जब होश आया तो सिरहाने की तरफ कोई गुजरता नजर आया। उठने की कोशिश असफल रही। पास जो खडा दिखा उससे सहायता मांगी। उठकर खडा हुआ तो सर चकरा रहा था। कहीं जाकर बैठता इसके पहले अहसास हुआ की दाहिने हाथ में जबरदस्त दर्द है। फिर थोड़े होश में आने के बाद पाया कि मित्र जो पिछली सीट पर थे, अभी भी जमीन पर ही पड़े हुए हैं। अचेत पड़े मित्र को हिला डुलाकर उठाया। फिर गाडी देखी, जिससे गाडी की दुर्घटना हुई उसे तलाश किया। गाडी बुरी तरह क्षतिग्रस्त पड़ी थी। दाहिने तरफ गाडी के लेग गार्ड पर करारी चोट थी और अगले पहिये से जुड़े शोक एब्सोर्बेर पीछे मुड गए थे। मेरी चाल धीमी होने से अधिकतम झटका मेरे ही हेंडल पर आया था । राजस्थान, कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल आदि का मोटरसाईकल से दौरा करने के बावजूद कहीं कोई परेशानी नहीं आई मगर शहर में भीडभाड से मुक्त सड़क पर हादसा होना मुझे आज भी इंद्रजाल सा एहसास देता है। गाडी उठा नहीं सकते थे। सामने वाले वहां से रवाना हुए या नहीं पता नहीं मगर एक भागने वाले की गाडी का नंबर इस उहापोह में मोबाईल पर डायल कर लिया। पुलिस के एक दोस्त को खबर देना चाही तो उसका मोबाईल नो रिप्लाय हुआ। उस वक्त के एस पी वरुण कपूर मेरे अच्छे मित्रों में होने के बावजूद रात के लगभग १०:२० बजे उन्हें बताना उचित नहीं लगा और नगर सुरक्षा समिति के सुनील शर्मा को बात कह डाली और उन्हें स्पोट पर बुला लिया। मैंने पाया कि अमित और कैलास हादसे के चश्मदीद थे। सुनील शर्मा मेरे पारिवारिक मित्र भी हैं सो उन्होंने छोटे भाई को साथ में लेकर मुझे अस्पताल ले जाने का जिम्मा ले लिया। अस्पताल में अन्य मित्र तुषार, भारत, कमलेश आदि भी आ धमके। अस्पताल जब पहुंचे तो वहां का नजारा बड़ा ही ह्रदय विदारक था। दो दलों कि आपसी लड़ाई हुई थी और हाथ पैर सर कटे-फटे होकर वे लुहुलुहान हालत में वहां लाए जा रहे थे। पत्रकारों कि भी भारी भीड़ यहाँ उपस्थित थी। फिर रोटरी सेन्ट्रल के अध्यक्ष के रूप में मेरी दुर्घटना की खबर अखबार में जा छपी। चिकित्सक कि हालत यह थी कि वे किस किस को देखे और इलाज सुलभ कराए ? मुझे देखने के बाद उन्होंने सलाह दी कि आप घर जाओ, अफेक्टेड हिस्सों कि बर्फ से सिकाई करो, फिर सुबह आकर एक्स रे करा लेना। यहाँ से निवृत्त होकर ऍफ़ आई आर दर्ज कराने के लिए थाने जाना पडा। वहां का स्टाफ गश्त पर होने से अस्पताल में बयान संभव नहीं थे। गाडी के नंबर की रिपोर्ट लिखाई और फिर भाई और सुनील से सही गाडी पता करने को कहा। वे गाडी देखने फिर से स्पोट पर जाकर आते तब तक मुझे जो लिखाना था वो मैं लिखा चूका था, गाडी का नंबर गलत था जिसे बाद में संशोधित कराना पड़ा।
इतनी बुरी बीत जाने के बावजूद घर पर खबर नहीं दी थी क्योंकि बेवजह दौड़ भाग रात को न करना पड़े। घर जब पहुंचा और माँ पिताजी को वाकये के बारे में बताया तो वे सुरक्षित देखकर भगवान् का शुक्रिया कर रहे थे। बिस्तर पर सोना चाहा तो दर्द के मारे सोने में तकलीफ आरही थी। फिर बिस्तर को तकियों से उंचा किया और सीने पर हाथ धरे तो पता नहीं कब नींद आ लगी। सवेरे भी जल्द ही नींद खुल गई। अब सुबह सरकारी अस्पताल में एम् एल सी कराना थी और फिर इलाज के लिए नर्सिंग होम जाना था।
नर्सिंग होम में फिर से एक्स रे कराया गया। एक्स रे की रिपोर्ट जब सुनी तो पता चला की दोनों हाथों में फ्रेक्चर है। मैंने एक्स रे मंगवा कर देखा और मैं जोर से हंस पडा। एक्स रे देखकर डॉ का ओपिनियन था कि ऑपरेशन करना ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि हड्डी के टुकड़े अधिक हैं और इन्हें एक जगह रखना जरूरी है। यह बात सभी को मालूम थी और मैं एक्स रे देखकर हंस रहा था तो जितने भी लोग वहां थे सभी आश्चर्य से मुझे देखने लगे। मेरी हंसी संवेदना भरे माहौल में अचरज से भरी तो होना ही थी। उन्होंने आखिर सब्र तोड़ते हुए उन्होंने मझसे पूछ ही लिया की हँसते क्यों हो? अब जब किसी के दोनों हाथ टूटे पड़े हो तब कोई हंसेगा भला क्यों? इस हंसी का उनके लिए कोई मतलब भी तो नहीं था। इसवक्त तो चेहरे पर पीड़ा और रुलाई होनी चाहिए थी और मैं हँसे जा रहा था। ठहाके लगा रहा था।
दरअसल मैं परिस्थिति पर हंस रहा था। सोच रहा था वाह रे प्रभु लीला तेरी। सुबह तक तो सोच रहा था कि एक हाथ ही टूटा है मगर अब तो दोनों ही हाथ टूटे हैं। अपनी बेबसी पर वाकई मुझे रोना चाहिए था मगर प्रातःकर्म के उपरान्त सफाई कैसे करूंगा यह प्रश्न मुझे हंसा गया। कल इस काम के लिए भी मुझे सेवाए लेना पड़ेगी क्या? आदि। खैर सुबह से बगैर कुछ खाए पिए था सो ओपरेशन के तयशुदा समय पर मुझे थियेटर में ले जाने की तैय्यारी हुई। मैं चलकर वहां पहुंचा। मुझे अस्पताल की ड्रेस पहना दी गई। फिर हाथो से रोम के बाल हटाने का काम एक दाई करने आई। उसके तरीके से मुझे डर लगा कि कहीं ये रेज़र से हाथ न काट दे। मैंने उससे कहा आप तो ये रेज़र मुझे दे दो मैं बाल हटा देता हूँ। वो हंसी और बोली भैय्या कैसे करोगे? दोनों ही हाथ तो टूटे पड़े हैं। हँसते हंसाते ये बाल साफ़ हो गए। फिर दवा का लेप लगाने की शुरुआत हो गई। उसने कहा भैया आज तक कितने ही मरीज देखे मगर आज पहली बार है कोई जो अपने ओपरेशन से पहले हंस रहा है।
मैं टेबल पर जा लेटा। बी पी लिया गया, सलाईन चढ़ाई जाने लगी, इधर दवा का लेप निरंतर जारी था। आसपास नजरे दौडाई तो महसूस किया कि बेहोश करने वाले और हड्डी विशेषज्ञ के मध्य मौन संवाद हो रहा है कमरे में मुझे कुछ नए प्रशिक्षुओं उपस्थिति भी जान पड़ी अचानक पैरों में जलन का अहसास होने लगा और मै अचानक से "गायब" हो गया।
जब बेहोशी टूटने लगी तो मुझे स्वर्णिम आभास हो रहा थामेरे चारों तरफ सुनहरी रौशनी थी। मैं उड़ सा रहा था। मेरा शरीर हल्का फुल्का रुई सा लगने लगा था। बचपन में यदाकदा दिखनेवाला सपना दिखाई देने लगा। फिर आसपास में आवाजे और हलचल सुनाई देने लगी। मुझे लगा मैं कुछ बुदबुदा रहा हूँ। मिडास इफेक्ट से मैं आज तक प्रभावित हूँ और वो क्या नजारा था सोच कर आज तक ख़ुशी होती है। आँखे अब धीरे धीरे खुलने लगी थी, आवाजो से अंदाजा हो रहा था कि कमरे में इसवक्त माँ उनकी सहेली और मेरे कुछ मित्र आ आ कर देख रहे हैं। मैंने माँ से पूछा था परिधि और पारुल के बारे में। वे स्कुल से घर जाकर खाना खाकर अस्पताल आ चुकी थी।
मैं अब होश में था और चिकित्सकों का आभार मान रहा था। मेरी उम्मीद से अच्छा अनुभव जो मुझे हो रहा था। डॉ विपिन माहेश्वरी ने कक्ष में प्रवेश किया मुझे देखकर वे हँसे और फिर हिदायत दी कि उठाने के बाद सबसे पहले पेशाब करना जरुरी है। थोड़ी ताकत का जब अहसास हुआ तो मैंने हिदायत का पालन करने कि बात कही। अब कमरे में तुषार और भारत थे सो मैंने उनसे डॉ की बात बताई और मुझे मूत्र विसर्जन के लिए मदद की बात कही। मैं पलंग से उठा और जब खडा होना चाहा तो अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। शायद यह एनेस्थीसिया का असर रहा होगा। पायजामे का नाड़ा तुषार ने खोला और मुझे थामे खडा रहा। कार्य संपादित किया तो मुझे एहसास हुआ कि जैसी मेरी कल्पना थी वैसा नहीं है अगले सवेरे मुझे किसी की मदद नहीं लेना पड़ेगी।
अरविन्द घर से थुली बनवा के लाया और पापड के साथ मैंने यह भोजन किया। मैंने खाना खाकर सोने की इच्छा जताई और थोड़ी देर सोया भी। फिर देर रात तक मुझसे मिलने आने वालों का तांता लगा रहा तो अस्पताल के कर्मचारी मेरी मित्रमंडली देखकर हैरत में थे। इतने ज्यादा लोग मिलने जो आ रहे थे । सुबह घर के लिए रवाना किया जा रहा था तो बताया गया की प्लास्टर 45 दिन तक लगा रहेगा।
दीपावली के त्यौहार के तुरंत बाद अपंगता का यह अहसास लिए और घर आने वाले लोगो में कुतूहल का पात्र होकर एक अजीब अहसास का केंद्र बिंदु भी बना। आज मैं बिलकुल ठीक हूँ।
अपनी बेबसी पर ठहाके लगाकर परिस्थितियों से जूझने वाले लोग प्रायः कम ही होते हैं इसका अहसास और अनुभव लिए मैं उन लोगो के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होंने मुझसे बड़ी विपदाए झेली हैं और आज तक जिन लोगो के सामने परिस्थितियाँ लाचार दिखाई देती है।

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