गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

वर्ष २०११ .....


गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

अतिक्रमण चौपालों पर चर्चा

अतिक्रमण हटाने की कई मुहिमे चली और टाँय टाँय फिस्स हो गई। बरसों में एकाध दिन मुहीम चलाकर सो जाने वाला प्रशासन बड़ा ही सक्रीय दिखा। जब-जब, जहां-जहां की सुध उसने ली उससे लगा कि यह मुहीम अब रोके न रुकेगी। यातायात के नाम पर पेड़ों कि बलि लेकर चुप रह जाने वाला प्रयास कईयों ने लगातार देखा है। सड़क किनारे सामान बिखेर कर अपनी दूकान चलाने वाले व्यवसाईयों से कई बार सामान भीतर रखवाते देखा है । दुकानदारों कि भाव भंगिमाओं और खिसियानी बाते फिर प्रशासन का सराहन भरा विरोध भी कोई नई बात नहीं रही। अबकी बार जो हुआ वह पहले कभी नहीं हुआ अभूतपूर्व रहा यह मंज़र। पहले दिन मात्र ढाई घण्टे चला अभियान सदा कि भाँती अखबारों कि सुर्खियाँ बना। चौपालों पर चर्चा रही कि सिर्फ गरीब पिसायेंगे , अमीर श्रेष्ठी वर्ग हमेशा कि भाँती अनछुआ रहेगा।
पुलिस कप्तान से साक्षात्कार हुआ तो वे पूरे वेग से अभियान को यातायात कि दृष्टी से स्सर्थक बनाए जाने के पक्षधर नजर आये। फिर उन्हें अभियान का नेतृत्व कारी स्वरुप में महिमा मंडित किया गया। किसी ने सवाल किया कि अतिक्रमण नगर निगम कि जिम्मेदारी होती है तो आयुक्त का जवाब था कि हमारा अमला लगा हुआ है, हमें दुसरे काम भी होते हैं इसलिए मेरी मौजूदगी को अनिवार्य न माने। महापौर भी बचाव कि मुद्रा में दिखे। खैर मुहीम ने गति पकड़ी तो विश्वास नहीं हुआ । अब ये खबरे कि आज फलां जगह का अतिक्रमण हटाया गया है ।
मैं एक मित्र से बात करने सड़क के किनारे पर रुका तो वहां चल रही चर्चा कानो में आन पड़ी एक ने बताय कि उसकी दूकान अब अपने ओरिजिनल शेप में आई है , वहां १६ फुट लबाई में अतिक्रमण हुआ करता था मै आश्चर्य में था । फिर ख़याल आया निर्माण आदेश देने वाला निगम का विभाग, जहां नक़्शे स्वीकृत किए जाते है। नक्शों के मानदंड के मुताबिक़ डिजाईन नहीं होने पर निर्माण की परमिशन नहीं मिलती है। पूरे शहर में देखें तो सारे मकान निर्माण निर्देशों की अवहेलना करते दीखते हैं । मकान नक़्शे के मुताबिक़ इसीलिए नहीं हैं क्योंकि नगर निगम के इस विभाग के हर व्यक्ति के साथ रिवाजों की पूर्ती हो चुकी है। अबकी बार प्रशासन के कठोर रवैये के आगे यह विभाग जहां कहीं से रिवाज पा चूका है वहां भी लाचार ही रहा, राजनिति करने में भी वह लाचार रहा। इधर बगीचे में पेड़ों की छंटाई को लेकर विपक्ष जब मैदान में आ डटा है और इधर प्रशासन यातायात की सुविधा के नाम पर अतिक्रमण तोड़े जा रहा है । अब प्रश्न हैं कि : १ सड़के चौड़ी कि जा रही हैं या सिर्फ अतिक्रमण हटाया जा रहा है ? २ सड़के आवागम कि दृष्टी से मुक्त हो भी जाए तो क्या बगैर रोड टेस्ट लिए दिए लायसेंसधारी क्या सडकों पर ठीक प्रकार चलेंगे। आवाजाही कि होड़ में एक्सीलेटर तो तेज है मगर गाड़ियों में ब्रेक भी होते है इसका मसला सुलझ पायेगा ? ३ शहरी क्षत्र में , रहवासी क्षेत्रों में निर्माण इकाईयां स्थापित हैं , जिन्हें औद्योगिक क्षेत्रों में होना चाहिए था । क्या इन निर्माण इकाइयों को स्थानांतरित किया जा सकेगा? ४ वे जिनके मकान निर्माण मानदंडों को टाक में रख कर शत प्रतिशत कर लिए जाने के बाद तीन से पांच फुट तक अतिक्रमित हैं उन पर क्या कार्यवाही होगी ? वे जिम्मेदार जिन्होंने बेढब बन रहे मकान बनाने पर कोई कार्यवाही नहीं कि क्या उन पर कोई गाज गिरेगी ? ५ निर्माण नक्शों में सिर्फ कागज़ी रहे शौचालय और पार्किंग के स्थल के बारे में कुछ हो पायेगा ? ६ सड़क से लगे मंदिरनुमा ओटले ही ध्वस्त होंगे या सड़क किनारे बने सभी धर्मस्थलों के स्थान बदले जायेंगे ?
अतिक्रमण कि यह मुहीम पहली बार कठोरता से हो पाई है तब यह भी देखने में आया कि गरीब बस्ती में जो पट्टे दिए गए है उन्होंने भी अपनी निर्माण हदों को पार कर लिया है और आज वे भी अपने सीमांकन से सारोकार नहीं रखती । हर तरफ एक ही नजारा दिखाई दे रहा है । एक दुसरे का अतिक्रमण देख मन को समझाया जा रहा है कि हम तो कदापि अतिक्रामक कि श्रेणी में नहीं आ रहे । मगर असल बात तो यही है कि किसी का छज्जा बाहर है तो किसी कि गैलरी किसी कि सीढिया है तो किसी कि बाऊंड्री वाल तो कोई अपने वाहन पार्किंग कि वजह से अतिक्रामक बने हुए हैं या पार्किंग रैम्प या फिर कोई नालियां ढकने कि वजह से और तो और कई दुकाने ही नालों के ऊपर खड़ी हें। iनकी वजह मैं समझने पहुंचा तो पाया कि ६ बाय ७ फुट कि दूकान कि कीमत ७२ लाख है । इस लिहाज से एक फुट का अतिक्रमण किस कीमत का होगा आप सोचिए ।
अब आप आईये अवैध कालोनियों के निर्माण पर तो वैधानिकता आपको महंगाई का बड़ा कारण महसूस होगी। पटवारी इन कालोनियों को कृषि भूमि कहते हैं । भूखंड बेचने वाले कृषक कागज़ में तो दर्ज हैं मगर बतौर कलोनाईज़र वे लापता हैं।भूमि के इतने छोटे छोटे टुकड़े हैं कि यहाँ नापती को टाल देना पड़ता हैं। कालोनी तो होती है मगर यहाँ कोई कलोनाईज़र नहीं होता। अब मुश्किल यह है कि प्लाट को नापें कैसे । कई लोग अपना मकान बना चुके हैं। बची जमीनको नापें तो वाह चारों तरफ से कम पड़ती है। बनाई गई सड़क प्लाट को आगे से नाला पीछे से और अड़ोसी पडोसी आजू बाजू से जमीन को दबोच चुके होते हैं अगर आप मकान बनाने में लेट हुए तो आपके हाथ में सिर्फ कागज़ रहते हैं और सुनाने के लिए कोई नहीं , हाँ हंसनेवाले कई लोग होते हैं।
नदी के किनारे , तालाब, नाले , पहाड़, वनक्षेत्र, चरनोई कि भूमि कौन सी ऐसी जमीन है जहां स्वेच्छाचरण नहीं हुआ। स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छंदता बढ़ी है । एक जगह मैंने सुना कि जो जमीन आपको दीखती है वो सारी शासन की है मगर सभी जगह किसी न किसी के दादा परदादा की भी है क्योंकि पोते पडपोते का कहना है कि हमारे पुरखों ने यहाँ का जंगल काटा है। यहाँ के सारे पेड़ हमारे थे जिन्हें हमारे पुरखों ने काटा था । जमीं उपजाऊ नहीं थी और साधन भी पुराने थे इसलिए इसे फाड़ा नहीं है । आप इसे शासन कि कैसे बता रहे हैं हमें नहीं पता । हमें इसके पट्टे दो ।
हम जैसे बहुत थोड़े लोग हैं जो आज वन्य-जीवों , परिंदों, वनस्पति और वन की बात करते हैं। इनके लिए काम करते वक्त पैसा भी जेब का ही जाता है। अभी पिछले दिनों बर्ड्स वाचिंग ग्रुप को अफ्रीकी देश केन्या के नैरोबी शहर स्थित यूनाईटेड नेशंस एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम का सहभागिता प्रमाण पत्र मिला तो इस बात से ही खुश हो लिए किभले हमारा आकलन शहर, जिले, प्रदेश -देश में ठीक प्रकार से न हुआ हो पर कहीं तो हमारा काम गिना गया । शहर में राजनितिक पार्टियां पेड़ों कि कटाई पर युद्ध रत है और हमारी चुप्पी अब इन्ही लोगों को संदेहास्पद लग रही है जो हमें पहचानते तक नहीं है।
निगम कर्मचारी जो रिवाजों से लबरेज़ रहे है उनके द्वारा कि जा रही कार्यवाही पर आश्चर्य तो होना ही है । चौड़ाई बढ़ाकर यहाँ वाकई यातायात का सुधार ही होगा या अस्थाई तौर पर व्यवसाय करने वाले मसलन सब्जी के ठेले लगाने वालों से कर लेकर निगम अपनी कमाई के मूड में है?
जब तक पूरा वातावरण सुधर नहीं जाता तब तक किसी निश्चित बात को नहीं कहा जा सकेगा। सारे कुए में भाँग पड़ी होने का मुहावरा यहाँ दिखने लगता है। व्यवस्थाओं में सुधारों कि जरूरत है मगर कैसे और कौन करेगा यह प्रश्न बारम्बार खडा होता है। अब आप ही कुछ सोचीये कि क्या आप भी कहीं अतिक्रमण कि चप्रेट में तो नहीं .................

राजेश घोटीकर
6/16 जवाहर नगर
रतलाम (म प्र
मोबाइल : 9827340835

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

संस्कार और हम

संस्कार है किस चीज़ का नाम ? यह प्रश्न इसलिए पूछा ताकि आप खोजें अपने आपको ।

पर्सोनालिटी डेवलपमेंट का आज बड़ा जोर है , इस विशेष शब्द से भी हम सभी बड़े प्रभावित हैं । हमारी जोरदार भीडनुमा संख्या शहर के शानदार शोभादार सभागृहों में आए अथवा बुलवाए गए "व्यक्तित्व" को सुनने के लिए जा जुटती है ।

यह व्यक्तित्व हमारे स्वभावों की विशेषता का विश्लेषण करता है, ख़ुद पर हंसता हंसाता है, बोध कराता है और आपके विचारों की नकारात्मक ऊर्जा का त्याग करने की बात कहता है। यह बताता है की वह इस मुकाम तक कैसे पहुंचा। उसकी अपनी सफलता का राज़ क्या है या देश का कोई बड़ा उद्योगपति शीर्ष तक पहुँचने में कैसे कामयाब हो गया । कोई व्यक्ति क्यों सफल है आदि। इन बातों की तह में क्या क्या राज़ छुपे हैं , उनका पर्दाफ़ाश करने का श्रम भी वो करता है । सामाजिक चरित्र की ये सारी बातें हम जाकर सुनते हैं फिर घर पर बैठकर चुपचाप मनन करते हैं और अपने रोज़ के चलताऊ ढर्रे पर अपनी ढपली अपना राग बजाते जाते हैं।

विशेष व्यक्ति क्यों तरक्की कर गया ? उसके बारे में सारे बताए राज़ हमारे ज़ेहन में रोजाना उमड़ते घुमड़ते हैं। हमारी चर्चाओं में भी वे शामिल हो जाते हैं। फिर कभी कोई मिला तो उसे भी यही पुडिया थमा दिया करते हैं। इन बातों से एक बात जरूर जाहिर होती है की नकारात्मकता का त्याग हम देख पाते हैं। यह भी देख पाते हैं की जो व्यक्ति जिस प्रवृत्ति का है उस बिंदु पर वह और भी कठोर हो जाता है , उसकी कठोरता में ढीठपन की आवृत्ति होती है। अपने बच्चों को भी हम दुसरे की बातों से ही प्रभावित करने लग जाते हैं। अब बच्चे तो ठहरे कच्ची मिटटी जैसे , जैसा चाहे गढ़ दो। समझ आते करते वे पूरी तरह दुसरे से प्रेरित अनुसरण करने लगते हैं। उनका यही अनुसरण हमारी जेबों पर भारी होने लगता है फिर उनका बेकाबू चरित्र और अपने भविष्य की चिंता दोनों हमें खाने लगती है। हम पाते है की स्वतन्त्रता के मायने उन्होंने समझे नहीं और वे स्वच्छंद हो गए हैं। उस वक्त हम सोचते हैं की वाकई हमारे संस्कार हैं क्या ? अपने जीवन में पढ़ी सूक्तियां , माँ पिता की रोकटोक , महापुरुषों की वाणी , हमारी धर्म संस्कृति,सभ्यता सब की सब हमारे आगे आकर खडी होने लगती है और हम सोचते हैं और पाते हैं की हमारा रास्ता बेबसी का है जहां हम सोचते कुछ और करते कुछ हैं । हम जो करते हैं उसके बारे में सोचने का श्रम हम करते नहीं हैं। हम यहाँ तक सोच चुके है की हम महान नहीं है और कभी बनेंगे भी नहीं और जो महान बन चुके हैं सिर्फ उन्ही के बस में थी संस्कार नाम की यह चिड़िया।

सोचें की क्या अगर महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन में प्रताड़ित किया जाना बर्दाश्त हो गया होता तो क्या वे स्वतन्त्रता आन्दोलन में हिस्सा लेते? उन्होंने अंग्रेजों के बनाए कानूनों का विरोध किया , लाठियां खाई क्या वो इसलिए की वे महान थे ? उन्होंने देश की स्वतन्त्रता में भागीदारी की काम किया और देश स्वतंत्र हुआ यह सबक हम सीखते तक नहीं है। हम अंग्रेजी शब्दजाल में उलझे बैठें हैं । मोहनदास जी ने समय परिस्थिति और अन्तःकरण की बात पर जोर दिया, अपने व्यक्तित्व का विकास किया , वे स्वयं प्रेरणा के केंद्र बने तभी महात्मा कहलाने लायक हुए । यह सीखना हमें किसी ने बताया नहीं । बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चन्द्र बोस , आजाद, भगत सिंह, जैसे अनेकों योद्धा बने और आज भी याद किए जाते हैं तो इसलिए की वे प्रेरणा प्रदाता बनने में कामयाब रहे। व्यक्तित्व के ये धनी हमारी आस्था के केंद्र बन हमारे मानस पटल पर अंकित ना हो जाए इसका षड्यंत्र जारी है । कसाब प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, सोचें .........

आज हमारे देश के हर एक व्यक्ति पर ३८००० से अधिक रुपयों का राष्ट्रीय क़र्ज़ है । ऐसे में हमारी देश के प्रति भावना "राष्ट्रीय भावना" में परिवर्तित न होकर आर्थिक रूप में अभिव्यक्त होना प्रारंभ हुई है । देश के औधोगिक घराने आज देश में सफल हैं फिर उसके बाद नवोदित औद्योगिक इकाईयां भी सफलता के चरम पर स्थापित हुई हैं , हर छोटे बड़े शहर में अनेक शिक्षण संस्थान सफल है तो कई व्यापारी भी उंचाईयां स्थापित करने में कामयाब हुए हैं मगर हमारी निगाह में ये थोड़े बहुत लोग ही तो सफल हुए प्रतीत होते हैं बाकी अनेकों जो हमारे आसपास विफल हुए हैं वे ही तो हमारी सद्भावना का केंद्र और हमारी प्रेरणा है ।

हमने देखा है रुपया जब जब मजबूत होने की दशा में होता है तब तब हमें अंतर राष्ट्रीय पहलुओं पर गिरते पड़ते देखना पड़ता है । हमारे स्विस बैंक अकाऊंट , विदेशों में बढती पूँजी , विदेशों में जाते हमारे लोग हमारी राष्ट्रीय भावना के केंद्र में है ।

देश के भीतर का सामाजिक चरित्र भ्रष्टता की पराकाष्ठा उजागर करता है फिर हम अपने तक वापस आ जाते हैं और हमारे सपने संस्कारों की गर्त में हमें कहीं ढूँढने , तलाशने , पहचानने , जताने , हैरानी आदि जंजालों में उतराने , पलटाने , हिचकोले खाने जैसे करतबों की धुरी पर बाँध देता है मगर हम इस सबके बाद जो पाते हैं वह हमारी परेड में दी जाने वाले निर्देशों में का एक शब्द है " जैसे थे "।

राजेश घोटीकर

६/१जवाहर नगर

रतलाम (म प्र

मोबाइल : 9827340835

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

बर्ड्स वाचिंग ग्रुप को यूनाईटेड नेशंस एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम का सहभागिता प्रमाणपत्र


रतलाम ।
यूनाईटेड नेशंस एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम को बर्ड्स वाचिंग ग्रुप द्वारा अपना सहयोग दिए जाने हेतु सहभागिता प्रमाण पत्रप्रदान किया गया है । बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के संस्थापक श्री राजेश घोटीकर ने बताया कि अफ़्रीकी देश केन्या के नैरोबी स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय से जारी यह प्रमाण पत्र २० नवम्बर कि डाक से रवाना होकर रतलाम स्थित ग्रुप के कार्यालय को ७ दिसंबर को प्राप्त हुआ है ।
श्री घोटीकर ने बताया कि "मानवता के हित में धरती की सेवा " के परम उद्देश्य से प्रेरित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के "प्लांट फॉर द प्लेनेट : बिलियन ट्री केम्पेन" के अंतर्गत जिले के पौधारोपण की जानकारी, पौधों की मृत्यु दर एवं देखरेख के साथ ग्रुप के पर्यावरणीय कार्यों के माध्यम से उत्प्रेरणाएवं योगदान के मूल्यांकन के पश्चात यूनाईटेड नेशंस एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम मुख्यालय से यह सहभागिता प्रमाण पत्र जारी हुआ है ।
सन २००० से कार्यरत वन्य-जीव , पक्षीयों तथा वनस्पति उन्नयन को समर्पित संस्था बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के तुषार कोठारी , सुनील लाखोटिया, भूपेश खिलोसिया, संजय कटारिया, अजय गुप्ता, जाहिद मीर,भारत गुप्ता , मुकेश शर्मा सुरेश पुरोहित , नीरज शुक्ला, भगतसिंह सांखला आदि ने जिले मे रोपित किए गए पौधों के सर्वाइवल रेट को बढाने के प्रयासों का आव्हान किया है।