शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

संस्कार और हम

संस्कार है किस चीज़ का नाम ? यह प्रश्न इसलिए पूछा ताकि आप खोजें अपने आपको ।

पर्सोनालिटी डेवलपमेंट का आज बड़ा जोर है , इस विशेष शब्द से भी हम सभी बड़े प्रभावित हैं । हमारी जोरदार भीडनुमा संख्या शहर के शानदार शोभादार सभागृहों में आए अथवा बुलवाए गए "व्यक्तित्व" को सुनने के लिए जा जुटती है ।

यह व्यक्तित्व हमारे स्वभावों की विशेषता का विश्लेषण करता है, ख़ुद पर हंसता हंसाता है, बोध कराता है और आपके विचारों की नकारात्मक ऊर्जा का त्याग करने की बात कहता है। यह बताता है की वह इस मुकाम तक कैसे पहुंचा। उसकी अपनी सफलता का राज़ क्या है या देश का कोई बड़ा उद्योगपति शीर्ष तक पहुँचने में कैसे कामयाब हो गया । कोई व्यक्ति क्यों सफल है आदि। इन बातों की तह में क्या क्या राज़ छुपे हैं , उनका पर्दाफ़ाश करने का श्रम भी वो करता है । सामाजिक चरित्र की ये सारी बातें हम जाकर सुनते हैं फिर घर पर बैठकर चुपचाप मनन करते हैं और अपने रोज़ के चलताऊ ढर्रे पर अपनी ढपली अपना राग बजाते जाते हैं।

विशेष व्यक्ति क्यों तरक्की कर गया ? उसके बारे में सारे बताए राज़ हमारे ज़ेहन में रोजाना उमड़ते घुमड़ते हैं। हमारी चर्चाओं में भी वे शामिल हो जाते हैं। फिर कभी कोई मिला तो उसे भी यही पुडिया थमा दिया करते हैं। इन बातों से एक बात जरूर जाहिर होती है की नकारात्मकता का त्याग हम देख पाते हैं। यह भी देख पाते हैं की जो व्यक्ति जिस प्रवृत्ति का है उस बिंदु पर वह और भी कठोर हो जाता है , उसकी कठोरता में ढीठपन की आवृत्ति होती है। अपने बच्चों को भी हम दुसरे की बातों से ही प्रभावित करने लग जाते हैं। अब बच्चे तो ठहरे कच्ची मिटटी जैसे , जैसा चाहे गढ़ दो। समझ आते करते वे पूरी तरह दुसरे से प्रेरित अनुसरण करने लगते हैं। उनका यही अनुसरण हमारी जेबों पर भारी होने लगता है फिर उनका बेकाबू चरित्र और अपने भविष्य की चिंता दोनों हमें खाने लगती है। हम पाते है की स्वतन्त्रता के मायने उन्होंने समझे नहीं और वे स्वच्छंद हो गए हैं। उस वक्त हम सोचते हैं की वाकई हमारे संस्कार हैं क्या ? अपने जीवन में पढ़ी सूक्तियां , माँ पिता की रोकटोक , महापुरुषों की वाणी , हमारी धर्म संस्कृति,सभ्यता सब की सब हमारे आगे आकर खडी होने लगती है और हम सोचते हैं और पाते हैं की हमारा रास्ता बेबसी का है जहां हम सोचते कुछ और करते कुछ हैं । हम जो करते हैं उसके बारे में सोचने का श्रम हम करते नहीं हैं। हम यहाँ तक सोच चुके है की हम महान नहीं है और कभी बनेंगे भी नहीं और जो महान बन चुके हैं सिर्फ उन्ही के बस में थी संस्कार नाम की यह चिड़िया।

सोचें की क्या अगर महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन में प्रताड़ित किया जाना बर्दाश्त हो गया होता तो क्या वे स्वतन्त्रता आन्दोलन में हिस्सा लेते? उन्होंने अंग्रेजों के बनाए कानूनों का विरोध किया , लाठियां खाई क्या वो इसलिए की वे महान थे ? उन्होंने देश की स्वतन्त्रता में भागीदारी की काम किया और देश स्वतंत्र हुआ यह सबक हम सीखते तक नहीं है। हम अंग्रेजी शब्दजाल में उलझे बैठें हैं । मोहनदास जी ने समय परिस्थिति और अन्तःकरण की बात पर जोर दिया, अपने व्यक्तित्व का विकास किया , वे स्वयं प्रेरणा के केंद्र बने तभी महात्मा कहलाने लायक हुए । यह सीखना हमें किसी ने बताया नहीं । बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चन्द्र बोस , आजाद, भगत सिंह, जैसे अनेकों योद्धा बने और आज भी याद किए जाते हैं तो इसलिए की वे प्रेरणा प्रदाता बनने में कामयाब रहे। व्यक्तित्व के ये धनी हमारी आस्था के केंद्र बन हमारे मानस पटल पर अंकित ना हो जाए इसका षड्यंत्र जारी है । कसाब प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, सोचें .........

आज हमारे देश के हर एक व्यक्ति पर ३८००० से अधिक रुपयों का राष्ट्रीय क़र्ज़ है । ऐसे में हमारी देश के प्रति भावना "राष्ट्रीय भावना" में परिवर्तित न होकर आर्थिक रूप में अभिव्यक्त होना प्रारंभ हुई है । देश के औधोगिक घराने आज देश में सफल हैं फिर उसके बाद नवोदित औद्योगिक इकाईयां भी सफलता के चरम पर स्थापित हुई हैं , हर छोटे बड़े शहर में अनेक शिक्षण संस्थान सफल है तो कई व्यापारी भी उंचाईयां स्थापित करने में कामयाब हुए हैं मगर हमारी निगाह में ये थोड़े बहुत लोग ही तो सफल हुए प्रतीत होते हैं बाकी अनेकों जो हमारे आसपास विफल हुए हैं वे ही तो हमारी सद्भावना का केंद्र और हमारी प्रेरणा है ।

हमने देखा है रुपया जब जब मजबूत होने की दशा में होता है तब तब हमें अंतर राष्ट्रीय पहलुओं पर गिरते पड़ते देखना पड़ता है । हमारे स्विस बैंक अकाऊंट , विदेशों में बढती पूँजी , विदेशों में जाते हमारे लोग हमारी राष्ट्रीय भावना के केंद्र में है ।

देश के भीतर का सामाजिक चरित्र भ्रष्टता की पराकाष्ठा उजागर करता है फिर हम अपने तक वापस आ जाते हैं और हमारे सपने संस्कारों की गर्त में हमें कहीं ढूँढने , तलाशने , पहचानने , जताने , हैरानी आदि जंजालों में उतराने , पलटाने , हिचकोले खाने जैसे करतबों की धुरी पर बाँध देता है मगर हम इस सबके बाद जो पाते हैं वह हमारी परेड में दी जाने वाले निर्देशों में का एक शब्द है " जैसे थे "।

राजेश घोटीकर

६/१जवाहर नगर

रतलाम (म प्र

मोबाइल : 9827340835

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