सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

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आधुनिक शिष्य

गुरु के दरबार में बैठे घमंडी आधुनिक शिष्य से चर्चा चल रही थी। शिष्य अपनी उपलब्धियों और कमाई का घमंड लिए बैठा था। उसने गुरु से कहा की " गुरुदेव आज मैं कई घरों तक रोटियाँ पहुंचे इसलिए रोज़गार उपलब्ध करा रहा हूँ।
गुरु ने शिष्य से पूछा की बताओ तुम्हारी साईट आज कल कहाँ चल रही है। शिष्य ने जवाब दिया "पास ही के गाँव में सड़क बना रहा हूँ।"
गुरु ने उससे कहा " वहां दक्षिण में एक पत्थर मिलेगा, जाओ जाकर उसे तुडवाना। आकर बताना, क्या हुआ? ठीक है.......?
शिष्य ने सोचा क्या बड़ी बात होगी। वह साईट पर पहुंचा तो बताई दिशा में पत्थर मिल गया। उसने मजदूर बुलवाए और पत्थर तुड़वाया।
पत्थर तोड़ने पर उसमे एक गड्ढा मिला जिसमे मछलियाँ तैर रही थी। मछलियों को उसने मुक्त किया और पास के तालाब में छुडवाया।
गुरु के पास आकर बोला " गुरुदेव आज मैं आपके आशीर्वाद से मुक्तिदाता/जीवनदाता बन गया हूँ।
गुरु ने पूछा वह कैसे? तो उसने बताया की पत्थर में मछलियाँ तैर रही थी उन्हें मुक्त किया फिर तालाब में छुडवा दिया है तो मैं जीवनदाता मुक्तिदाता ही तो हुआ ना।
गुरु ने सोचा कहाँ तो मैं इस घमंडी का घमंड दूर करना चाह रहा था और कहाँ ये है कि नया घमंड पाले चला आया।
गुरु तो सोच रहा था कि शिवाजी और उनके गुरु के किस्से वे कई बार सुना चुके हैं शायद यह सम्हल जाए। मगर यहाँ तो बिलकुल ही उलटा था।
गुरु तब से कोई चमत्कार नहीं करते क्योंकि आधुनिक शिष्य अपने ज्ञान और घमंड से बाज जो नहीं आते...........

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

नीम का पेड़

सुबह उठते ही नीम के गिरे पत्तों से भरा प्रांगन देखकर उसने अपने दादाजी से कहा " कितना कचरा हो रहा है रोज़ के रोज़। आप ये नीम का पेड़ कटवा क्यों नहीं देते। दिन भर ये पत्ते झड़ते रहते हैं। लान खराब कर देते हैं। चाहे कितनी सफाई करो ये पत्ते गिरते ही जाते हैं। अब रोज़ की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये नया बिना मतलब का काम.............वह आगे कुछ और कहता उसके पहले ७२ वर्षीय दादाजी ने उसे देखा, हौले से मुस्कुराकर पास रखी कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया। चाय की केतली से चाय पास रखे कप में भरी और पूछा "तुम पियोगे"।
राजेश ने हामी भरी तो दादाजी ने दुसरे कप में भी चाय उड़ेली फिर शक्कर और दूध मिलाकर हिलाते हुए आगे बढ़ा दी। राजेश ने ट्रे में रखे बिस्किट उठाकर चाय में डुबोए और खाने लगा।
दादाजी ने घर के बाहर बड़ा ही सुन्दर बागीचा लगा रखा है, मकान से तीन गुना बड़ा। गलियारा और आगे के हिस्सा सुंदर रंग बिरंगे फूलों वाले पौधों, गमलों, बेलों से सजा है। रोज़ सवेरे दादाजी चाय पीकर बगीचे में टहलते हुए निरिक्षण करते हैं , साफ़ सफाई करते कराते हैं। पौधों को पानी लगाने में उन्हें बड़ा ही आनंद मिलता है। अभी बसंत ऋतू के दौर में पिछले दस दिनों से पत्ते झड रहे हैं । पतझड़ का आगाज़ हुआ है और बड़ी तेजी से नीम के पत्ते झड़ने लगे हैं । राजेश आज जल्दी उठ गया है । बगीचे में लान को पत्तों से ढंका देख दादाजी से यह बात कह रहा है।
चाय की चुस्की लेकर दादाजी ने अपने नए डेन्चर में बिस्किट फंसा कर चबाया और कहा " राजेश , देखो नीम का यह पेड़ तब से है जब मकान बनाते वक्त तुम्हारी दादी ने इसे लगाया था। सुन्दरता के लिए तो आज भी कई पौधे है मगर गाँव की चौपाल पर लगा नीम का पेड़ जिसके नीचे सारे गाँव के लोग इकट्ठे होते थे। अपने सुख दुःख की बातें किया करते थे। पंचायत के सार्वजनिक फैसले भी उसके नीचे हुआ करते थे। बचपन में झूले बांधकर हम झुला करते। दातुन से लगाकर कई दवाओं में हम उसका इस्तेमाल किया करते। वह पेड़ इस नीम में मुझे नज़र आता है। तुम्हारी दादी के माइके के आँगन में लगा पेड़ इसी पेड़ में उनकी यादों में बसा था। नीम के गुणों को ध्यान में रखकर हमने अपने हाथों इसे सींचा। कालोनी के एक मंत्र हेंडपंप से पानी लाकर हमने इसकी परवरिश की ।
तुम्हारी दादी और मोहल्ले की औरते इसके नीचे बैठ सब्जियां साफ़ करते बतियाती बैठती थी। तुम्हारे पिताजी की शादी के बाद कई रिश्तेदारों ने, हाँ तुम्हारे मामा ने भी गर्मी की छुट्टियों में इसीके नीचे दोपहर बिताई हैं। नीम का शरबत भी बनाकर अपने स्वास्थ्य के लिए पिया है । नीम के पत्तों को जलाकर रात में हम मच्छर भगाते थे इसके पत्तों की खाद में कीटनाशक मिलाने की जरूरत नहीं होती थी। अब आज घर में ट्यूबवेल है मोस्कीटो रिपिलेन्ट बिजली के इस्तेमाल से चलता है। घर वातानुकूलित हो गया है। वाटर प्यूरीफायर आगये हैं तो आधुनिक जीवन शैली में तुम्हे यह अनुपयोगी जान पड़ता है।
अभी पतझड़ की वजह से इसके पत्ते झड रहे हैं जो और दस दिन झडेंगे उसके बाद यह फिर लाल पत्तों से भर जाएगा फिर छांह देने को ये पत्ते हरे भरे ही जायेंगे । फिर फूल खिलेंगे और महक बिखेरेंगे जो गर्मी का अहसास घटाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे। निम्बोली लगेगी और जब पककर गिरने लगेगी तो वर्षा का दौर प्रारम्भ होगा यानी नीम हमें मौसम का अंदाजा लगाने में मदद करेगा। मैं तुम्हारे तर्क से की पत्ते गिर रहे तो इसे काट डाला जाय से सहमत नहीं हूँ। इस पेड़ के साथ मेरी कई यादे जुडी हैं। किसी को घर के बारे में बताते वक्त नीम के पेड़ वाला घर कह देना काफी होता है। तुम्हारी दादी ने कैसे इसे टूट जाने से बचाने के लिए भरी बरसात में भीगते हुए बांस का सपोर्ट लगाया । अब वो हमारे बीच नहीं है मगर वो इस नीम में याद बनी हुई है। गर्मी के दौर में छत पर इसकी छांह ठंडक बनाए रखती है। इसकी मंद गंध भरी शुद्ध वायु शारीरिक स्वस्थता के लिए उपयोगी है। धरती लो ठंडा रखने में जल संचय में इसका अपना महत्त्व है। आज लोग दूषित वायुपान कर बीमार हो रहे हैं तब हमारे आँगन में लगा पेड़ हमें तो स्वास्थ्य के लिए भरपूर ऊर्जा भी दे रहा है न?
कहते हैं जब कोई चीज़ हमारे पास नहीं होती तब उसका मोल समझ में आता है। आज यह पेड़ हमारे आँगन में है तो तुम्हारे लिए बिना मोल का है । मगर जब हमने इसे लगाया था तब दूर दूर तक खुले तपते मैदान हुआ करते थे। इस पेड़ ने हमें राहतों की कई सौगाते दी। जो कुछ इस पेड़ ने हमें अब तक दिया है उसका काफी बड़ा अंश हम वापस लौटा भी नहीं पायेंगे कभी।
चाय पीकर दादाजी बगीचे में जाने लगे तो उन्होंने राजेश का हाथ थामा और साथ चलने की कवायद की । राजेश को उन्होंने पेड़ की कोटर दिखाई जिसमे तोते घोंसला बनाने के लिए आते जाते दिख रहे थे। गिलहरियों की गतिविधि दिखलाई । पेड़ पर बैठे पक्षियों से परिचित कराते हुए जीवदया का पाठ पढ़ाया। गिरे पत्तों पर चलने की खडखडाहट का संगीत समझाया। तुम्हारे दादाजी इस पेड़ के नीचे अपने पचास बरस बिता चुके है। यह पेड़ तो घना हो गया मगर दादाजी रिटायर होकर अनुपयोगी से है। जेब में पैसा है इसलिए कोई एतराज़ नहीं है। वरना मैं ख़ुद भी तो पेड़ से झडे इन पत्तों की तरह का ही तो हूँ.......किसी काम का नहीं , हाथ पैर चल रहे तो बागवानी में समय काट लेता हूँ सुबह इसकी छांह में बगीचे को पानी पिलाना शान्ति देता है।
राजेश की शादी हो गई और उसके बेटे ने स्कुल जाना प्रारंभ कर दिया है। पिताजी आज किसी इंजिनियर के साथ डिस्कस कर रहे हैं । दादाजी को गुजरे आज कोई दो बरस हो गए हैं । इंजिनियर की सलाह है पेड़ हटा देने की । राजेश ने जब सुना तो वह बोला की आप नक्शा बदल डालिए पेड़ नहीं कटेगा । इंजिनियर उसे जगह की कीमत समझाने लगा मगर राजेश अड़ा रहा। वह टस से मस नहीं हो रहा था आखिर नक्शा बदल कर निर्माण किया जाना तय हुआ।
रात को पिताजी ने पूछा तुम तो कभी इस पेड़ हटवाने के लिए कई बार दादाजी से बातें करते थे आज तुम्हे क्या हो गया? यह विरोधी रुख क्यों भला ?
राजेश ने कहा: पिताजी नीम का यह पेड़ पहले मेरे लिए सिर्फ पेड़ था मगर अब यह याद बन गया है दादाजी की जिनकी मेहनत और लगन से यह बड़ा हुआ । उन्होंने मुझे इसका मोल समझाया था । तो पिताजी अनमोल बन चुके इस पेड़ को भला मैं भी कैसे कट जाने देता ?
पेड़ पर बैठी चिड़ियों ने चहकना शुरू किया और नया सवेरा हुआ तो लोगों ने देखा की राजेश नीम को बाहों में भर कर खडा है। नीम को थामकर राजेश को लग रहा था जैसे दादाजी नीम का पेड़ बन गए हैं और उसे आशीर्वाद दे रहे हैं ।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

एक बार फिर मिला.....

नन्हा पपी "राजा" ऊँचे टीले पर जा चढ़ा और बड़ी आश्चर्य मिश्रित नज़रों से दूर कहीं देखने लगा। छोटे छोटे पठारों और उबड़ खाबड़ धरती के बीच बसे गाँव का नज़ारा इन दिनों बड़ा ही लुभावना है। बसंत ऋतू प्रारंभ हुई है। नवपल्लव आने के पूर्व पतझड़ का दौर है। पलाश के पत्तों की रंगत बदल गई हैं, कुछ में कलियाँ निकल आई हैं तो कहीं कहीं फूल भी झाकने लगे हैं। नहरमें दौड़ते पानी ने फसलों का स्वास्थ्य सुदृढ़ कर दिया है । गेहूं की फसल बहार पर है बालियाँ पकने लगी है। बेसरम पर फूलों की बहार है। राधू ने कल्ली के इस पिल्लै को पाल रखा है जो लाल रंग की आभा लिए बड़े बड़े बालों वाला गबरू है। राधू ने इसका नाम प्यार से राजा रखा है । दो झोंपड़ों की बस्ती है जो खेत से सटाकर बनी है। टहनियों से बनी टाटीयों से जोड़कर बनाए कमरे गोबर और पीली मिटटी से लीपकर तैयार किए गए हैं जिन पर कवेलू डाले गए थे जो अब सोलर पेनल से ढक गए हैं । कल्ली अपने पिल्लों के साथ घुमाते घामते यहाँ से जा रही थी तभी राधू ने पहली बार राजा को देखा था और उसे दौड़कर उठा लाया था । कल्ली अब इधर दिखाई नहीं दे रही मगर "राजा " अब राधू की देखरेख में है । राधू तीसरी कक्षा का छत्र है और रोज़ सवेरे अपनी स्कुल जाता है जो घर से कोई आधा किलोमीटर दूरी पर है। आसमानी नीले रंग की कमीज़ लाल निक्कर सर्दी के दिनों के लिए लाल स्वेटर और पढाई का बस्ता स्कुल से ही मिला है। सुबह जब वह स्कुल जाता है तब "राजा" भी उसके साथ साथ स्कुल तक जाता है। दोनों किनारों पर लेंटाना की झाड़ियों से गुजरता यह रास्ता उसके घर के सामने से निकलता है जो अब पक्की सड़क है। राधू के घर के पास काफी हरियाली है। गाय, बैल, बकरे,बकरीऔर मुर्गे मुर्गियां इन्होने पाल रखी है । राधू के पिता हकरू जो नगजी का दूसरा बेटा है ने दसवीं तक पढाई कर रखी जबकि राधू की माँ दूसरी कक्षा तक स्कुल गई थी। आज से बीस बरस पहले राधू के दादाजी यानी नगजी ने घर के समीप स्थित खेती की इस जमीन को बड़ी कठिनाई से जोतने के लायक बनाया था। पैसे तो उनके पास थे नहीं तब वे मजदूरी करने शहर को जाया करते थे। बरसात के दिनों में मकई की फसल बारिश के भरोसे उगाकर वे दाडकी पर जाते थे। ६० रु रोज़ कमाकर अपनी जैसे तैसे आजीविका चलाया करते। हकरू ने पढ़ने में दिल लगाया तो उसकी किसी तरह ना टूटे इसका ध्यान भी उन्होंने रखा था। जब वह छठीं का छात्र था उस समयशहर में कहीं से सस्ती सायकल लाकर उन्होंने हकरू को ला दी थी। सुदूर आदिवासी अंचल में उस वक्त कोई साधन नहीं थे और झोंपड़े से शहर जाने के लिए करीब तीन किलोमीटर पैदल चलना होता था। हकरू को जब सायकल मिली तो उसका उत्साह बढ़ गया था । कच्ची गड़ारों पर वह पिता को बस जाने के लिए छोड़ आता। उसका बड़ा भी उससे पांच साल बड़ा था मकान छोटा जानकार उसने एक घर पास ही में बना लिया था और पास की जमीन पर अतिक्रमण कर खेती करने लगा था । हालांकि पिता की ही तरह उसे भी काम से घर लौटने पर जो समय मिलता उसी में बड़ी मेहनत कर उसने घर बनाया था । बेसरम की सुखी लकड़ियों की दिवार खड़ी कर उसने भी पिता ही की तरह गोबर से लीप कर यह मकान बनाया फिर एक दिन बैलगाड़ी में कवेलू लाकर उसने छत बनाई थी। बस ये दो ही मकान है जो पंचायत में "नगजी का रुंडा " के नाम से दर्ज है। झोंपड़ों के पास बना टीला खेत से बीनकर निकाले छोटे बड़े पत्थरों को इकट्ठा किए जाने से बना है। टीले पर खड़े होने से सारा उबड़ खाबड़ खेत एक साथ दिखाई देता है। मुरुम के इस पठारी इलाके में खेती कितनी कठनाई भरी होगी इसका सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। चिड़िया भगाने के लिए भी इसी टीले का इस्तेमाल होता है। यानी इस टीले की उम्र आज बीस बरस की हो चुकी है। आज अनास नदी पर बनाए गए बाँध से लिफ्ट इरिगेशन के जरिये निकाली नहर से खेती हो रही है। और इसने आर्थिक प्रगति के सोपान रचे हैं। हकरू अब पढ़ लिखकर वन रक्षक की सरकारी नौकरी में है । उसे नौकरी वहीँ मिली है जहां का वह रहने वाला है । धुल उडाती पहाड़ियों के बीच बसा यह गाँव आसपास के जंगल कट जाने के बाद अब कहीं जाकर प्रधानमन्त्री सड़क योजना की सड़क से जोड़ा गया है। सोलर लाईट की व्यवस्था दो बरस पहले हुई थी। हकरू आज आदिवासी मजदूर नहीं शासकीय सेवारत होकर वनवासी भूमि का हकदार कृषक भी है। टीले पर चढ़े "राजा" ने उतरकर घर के सामने की सड़क को क्रोस किया और झाड़ियों के बीच बने रास्ते पर दौड़ पडा फिर तुरंत ही वहां से लौटा तो वह घबराया जान पडा। राधू को याद आया की राजा टीले पर चढ़ा था फिर भागकर कहीं गया था तो उसने भी टीले पर चढ़कर देखा। टीले से उसे लगा कि कोई अजीब सा जानवर अपने शिकार को घसीटकर नीचे नाले की और जा रहा है। देखते ही देखते शिकार और शिकारी जानवर ओझल हो गए। राधू पास जाकर देखना चाहता था मन में बड़ी खलबली जो थी। मगर माँ की आवाज़ सुन वह भोजन को जा बैठा। भोजन कर उसे स्कूल जाना था। भोजन करते उसने माँ को बताया की एक जानवर किसी गाय जितने बड़े जानवर को घसीट कर नाले की दिशा में ले गया है उस पर काली सफ़ेद पट्टियां थी और पीठ पर बड़े बड़े बाल नज़र आते थे। माँ को शेर होने का अहसास हो गया उसने अपने ससुर नगजी को यह बात बताई तो उसने सामान्य बात की तरह नजरअंदाज कर दिया। हकरू आज रेंज ऑफिस पर तलब किया गया था सो वह वहां गया था। शाम को लौटने पर उसने यह समाचार सुना तो उसने दुसरे दिन वहां जाकर पता लगाने की बात कही। वायरलेस सेट पर उसने संपर्क करना चाहा जो कभी कभी चल पड़ता था मगर आज यह संभव न हो पाया था। सुबह एक बार पुनः कोशिश करने की सोच वह सो गया । सवेरे जब वह उठा तो घना अंधियारा था लगभग चार बजे के आस पास जो गाय दुहने और पशुओं को चारा खिलाने का वक्त आंका जाता है। घर से वह रात में भिगोए भूसे की तगारियां लेकर बैल और गाय के पास जा पहुंचा फिर पास के पेड़ से घांस उतारने लगा । उसका भाई ताड़ के पेड़ पर मटकियाँ लटकाने के लिए ऊपर चढ़ा था और अब कल बाँधी गई मटकियों को लेकर नीचे उतर रहा था । घर में जाकर हकरू ने पानी की बाल्टी में पानी लिया और गाय दुहने के पहले उसने बछड़े को गाय के पास छोड़ा बछड़े का मुह छुडाकर उसने थान धोए और अब दूध निकालने लगा। अंधियारा धीरे धीरे छंटने लगा था सूरज रजाई में दुबका सा बाहर निकला था। गुलाबी काली रंगत का रंग जैसे जैसे बदलता गया आसमान भी नीले रंग का नजर आने लगा । सूरज की आभा गुलाबी लाल नारगी होकर पीली हुई फिर सुनहरा अग्नि रंग चमकने लगा । पास दूर के पठार कोहरे के आगोश से निकलने लगे लाल मुरुम के ये पहाड़ जो कभी पलाश, सागौन, खैर, आंवला, नीम, जंगलजलेबी , अनार , करोंदे , बैर आदि से पटे पड़े थे अब वृक्ष विहीन खड़े थे। सुबह का उजियारा फैलता जा रहा था सुबह आठ बजे तापमान चौदह डिग्री था और सूरज जमीन पर झोंपड़ी की परछाई के साथ ३० अंश का कोण बना रहा था और अपनी मुंदी हुई आँखों को हौले हौले खोलने लगा था। हकरू ने हाथों में डंडा उठाया और बताई हुई नाले की दिशा में चलना प्रारंभ किया तो राजा भी उसके साथ हो लिया। कभी आगे कभी पीछे चलते हुए उसने हकरू का साथ देना प्रारंभ कर दिया। अभी कोई डेढ़ सौ मीटर दूरी तय करने पर उसने बड़े से पंजों के निशान जमीन पर देखे। कुत्ते के पंजों जैसे निशान वहां थे उसने ठिठक कर भुरभुरी मिटटी पर बने निशानों को झाड़ियों से सुरक्षित किया वह अनुमान लगा रहा था वरघड़े या भेडिये का । सुदूर पहाड़ी अंचल में अब थोड़े ही जानवर शेष बचे हैं घोडारोज़ यानी नीलगाय अब वापस कभी कभार दिखाई देती है। बटेर, तीतर, कड़कनाथ जैसे पक्षी सियार लोमड़ी बिच्छु सांप सेहीगोह गोयरा और खरगोश यहाँ संसूचित थे। वरघड़ा के बारे में सुना तो था मगर वह दिखता कैसा है, कितना बड़ा होता है आदि नहीं जानता था आगे बढ़ने पर उसे जानवर घसीटे जाने के निशान दिखे जो लगभग गाय जितने बड़े होने का अनुमान दे रहे थे। वरघड़ा के बारे में उसने सुना था की भेड़ बकरियां और बंधे जानवर को वह खा जाता है। मरे जानवर भी उसे कईयों ने खाते देखा है। सहमे क़दमों से वह आगे बढ़ा तो उसने देखा की एक अध् खाई जानवर की लाश पड़ी है सिर पानी में डूबा है जबकि पीछे का हिस्सा और सीने की हड्डियां साफ़ हो चुकी हैं। नाले के किनारे ऊँची झाड़ियों से उसे डर लगने लगा तो डंडे को जमीन पर ठोक झाड़ियों पर डंडे के प्रहार किए और आगे बढ़ा। नीलगाय की लाश उसने महसूस की पोखर का पानी रक्तरंजित था। एक पैर नदारद था , अंतड़ियां बाहर पड़ी थी। गर्दन टूटी थी जिसमे से खून का रिसाव हुआ था । जो हिस्सा ऊपर की और था वह ही खाया जा चुका था। कीचड में उसे पग मार्क मिलाने की उम्मीद हुई। पगमार्क यहाँ पाकर वह बड़ा ही खुश हुआ। घर लौटकर उसने एक बार फिर वायरलेस खटखटाया मगर असफल रहा किसी से बात न हुई। रेंज कार्यालय तक वह अपनी मोटर सायकल से पहुंचा उन्हें सारी बात बताई फिर वहां से मंडल कार्यालय को सूचित कर वे प्लास्टर ऑफ़ पेरिस , एनीमल रेफरेंस बुक , कांच की स्लाईड , स्केच पेन , बटर पेपर , पानी की बोतल , मग आदि सामान लेकर नाले की ओर जाने को निकले । हकरू के घर गाड़ियां खड़ी कर कच्चे रास्ते पर फिर आगे बढे । निशानों पर हौले से कांच जमाकर पगमार्क ट्रेस किए । फिर मग में प्लास्टर ऑफ़ पेरिस घोलकर मिटटी पर उडेला ओर निशानों को प्लास्टर पर लेने की कोशिश की मगर ठीक से निशान नहीं आने से वे निराश हो गए । लाश की और आगे बढे तो वहां कुत्ते आ गए थे जो लाश के साथ खींचतान कर आपस में लड़ झगड़ रहे थे । कीचड पर निशान उन्हें सुरक्षित मिला इसमे प्लास्टर का घोल डालना और सुखाना मुश्किल था सो सूखे पावडर छिड़क कर उन्होंने पगमार्क का प्रिंट तैयार किया मगर प्लास्टर को सूखने में देर लगी । अब घर के बाहर जानवरों को खतरा था सो जंगल की कंटीली झाड़ियों से बाड़ बनाई गई इसमें भी बची खुची झाड़ियों का उपयोग हुआ । पालतू जानवर जो बचाने थे। वरघड़ा की जरक, लकड़बग्घे यानी इन्डियन स्ट्राइप्ड हाईना के रूप में पहचान राधू ने एनिमल्स रेफरेंस बुक की मदद से की। राजा ही था जो आज वनविभाग की सूचि में एक नए वन्य पशु को जुड़वा सका वह भी ऐसे क्षेत्र और समय में जबकि काले हिरण,चौसिंगे,तेंदुए और बार्किंग डीयर के लिए पचास बरस पहले कभी समृद्ध रहे क्षेत्र में प्रगति की अंधी आंधी के चलते बरसों से नहीं दिखा था।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

अस्पताल का सांप?

सरकारी अस्पताल का परिसर जीर्ण शीर्ण भवनों का स्थान था। तीस बरस से पहले बने इस अस्पताल के भवन का भी बुरा हाल था। पतरे की छत पर बिछे खपरैल टूट गए थे और अब आधे अधूरे ही बचे थे। पतरे भी सड़ गए थे। सपोर्ट के लिए लगा लकड़ी का बीम तड़क गया था। दरवाजों की हालत भी टूटी फूटी हो चली थी। पलस्तर भी उखड गया था।
अस्पताल में चिकित्सकों के दो कमरे थे। एक कमरा दवाई वितरण के लिए कंपाउडर के सुपुर्द था। मरहम पट्टी कक्ष और शस्त्रक्रिया कक्ष की व्यवस्था दी गई थी। जैसे जैसे समय बीता प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सुविधाए बढ़ी। बिस्तर, एम्बुलेंस ,प्रयोगशाला के अलावा प्रसूतिगृह का निर्माण भी हुआ।
अमूमन अस्पतालों के नजदीक नई आबादी विस्तारित हुई और सड़क के आसपास आम इमली के पेड़ भरपूर थे। अस्पताल की पिछली दीवार के समीप एक भयावह ईमली का पेड़ था। भयावह इसलिए कि उसमे अजीब सी खोह और आकृतियाँ निर्मित हो आई थी। एक कोटर में उल्लुओं ने बसेरा कर लिया था। दिन के समय में भी आसपास खडी मेहंदी की बागड़ झाड़ियों से भरा उंचा सा टीला और वहां का डरावना एहसास सहसा किसी व्यक्ति को वहां जाने से रोक दिया करता था सो यह स्थान निर्जन बना रहा।
अस्पताल में प्रसूतिगृह क्या बना यहाँ सभी तरह के काम होने लगे। कुछ घरों में इसने जहां घरों के चिराग रोशन किए तो कई अवांछित अवैध संताने गिराने का धंधा भी फलाफूला। खासतौर पर कन्याभ्रूण हटाए जाने का। अस्पताल में महिला चिकित्सक की नियुक्ति तो हुई मगर सिस्टर मेरिंडा की यहाँ रौबदारी रही। होती भी क्यों न? सभी गाँव वालों के अच्छे बुरे की मदद इसी से मिलती जो थी।
ईमली का यह पेड़ और इसके नजदीक का यह वीराना अनचाहे गर्भ की कब्रगाह बन गया बरसों तक इस पेड़ के नीचे कई भ्रूण दफ़न होते रहे। दिन में कौवे और रात में चमगादड़ यहाँ डेरा डाले रहते।
अस्पताल की इस बिल्डिंग को पूरी तरह तोड़कर नया भवन बनाए जाने के लिए शासन ने पैसे मुहैय्या करवाए। ठेकेदारों से इसे तोड़े और बनाए जाने के टेंडरों की विज्ञप्ति प्रसारित हुई।
अस्पताल को जब तक नया भवन नहीं बन जाता पंचायत भवन में स्थानांतरित किए जाने की व्यवस्था दी गई। अब अस्पताल को खाली कराया जाना था। सबसे पहले स्टोर में जमा सामान हटाने का काम किया जाने की शुरुआत हुई। कंपाउडर, टेक्नीशियन अपने काम में संलग्न थे और पीछे का कमरा जो कई सालों से बंद पडा था खोला जाकर उसमे रखे सामान की लिस्ट बनानी थी फिर उसे कहीं अन्यत्र रखवाया जाना था। दरवाज़ा खोलने के सारे प्रयास असफल हो गए तो प्रभारी चिकित्सक को बताया गया , उन्होंने कहा की जब भवन ही तोड़ देना है तो दरवाज़े का क्या?..... तोड़ डालो दरवाज़े को। अस्पताल में कभी एक्स रे के लिए बनाया मगर कभी उपयोग में न लाया गया कमरा बड़ा ही अंधियारा था। यहाँ लाईट की व्यवस्था भी नहीं दी गई थी। इसकी पिछली दीवार पर एक्जास्ट के लिए गोल खिड़कीनुमा निर्माण भी था जो इमली की बढ़ आई डाली से सट आया था। कमरा अनुपयोगी रहा था और बिजली प्रकाश की व्यवस्था न होने से दिन में भी इस्तेमाल नहीं हो सकता था।
दरवाजे को तोड़े जाने का निर्णय सुनकर सभी कमरे के सामने इकट्ठे हो गए । दरवाज़े को खींचा धकेला गया । किसी ने लकड़ी फंसा कर तोड़ डालने की बात कही।
रूटीन के काम करने वाले शासकीय कर्मचारी अपने काम से काम रखते हैं सो दरवाज़ा तोड़ने के लिए बाहर से मजदूर बुलाया जाना तय हुआ। हरिया ने दरवाज़ा तोड़ने के लिए सौ रुपये मांगे तो भावताव हुआ पैसे कहाँ से आयेंगे इस पर चर्चा हुई। जैसे तैसे वह अस्सी रुपये में काम करने को तैयार हुआ। गुस्से में हरिया ने एक पत्थर उठाया और दरवाज़े पर दे मारा । पत्थर से दरवाज़ा टुटा तो नहीं मगर उसमे एक छेद जैसा पड़ गया ।
पत्थर उठाने में हरिया को लगा कि कमरे में से सांप जैसा बाहर आया है तो वह भागा । उसे देख दुसरे भी भागे। कुछ समझ में नहीं आया की हुआ क्या है ? हांफते हुए हरिया ने वहां सांप होने की बात कही और वो वहां जाने को अब तैयार भी नहीं था। कह रहा था पैसे गए भाड़ में दूसरी जगह दाडकी कर कमा लूंगा अब वहां अँधेरे में तो बिलकुल ही नहीं जाऊँगा। एक तो अस्पताल डरावना ऊपर से भूतहा कमरा। न बाबा ना मुझे नहीं करना काम।
अब सांप के होने की बात से भयभीत वहां जाने को तैयार नहीं था । किसी ने सुझाया की दीपक लगाओ, पूजा करो अगरबत्ती लगाओ तो शायद नाग देवता चले जाए ऐसे कहाँ कहाँ और कब कब हुआ की बाते भी हुई । अब अगरबत्ती दीपक ले नाग देवता से वहां से चले जाने की गुहार भी हुई । मगर वह मोटासा सांप तस से मास ना हुआ अब सब अपनी खैरियत के नाम पर पैसा खर्चने को तैयार हो गए । कन्हैया जो हरिजन से ड्रेसर बन गया था ने सबसे पैसे ऐंठे और सायकल उठाकर किसी सांप पकड़ने वाले को लेने चला गया । बाहर मरीज़ थे और भीतर सांप । मरीजों का जैसे तैसे इलाज की व्यवस्था देने के लिए नीम के नीचे टेबल लगाकर व्यवस्था की गई। सांप बाहर निकलते वक्त कहीं भी गुस जो सकता था। यह चर्चा भी थी की सांप आया कहाँ से होगा । इतना मोटा सांप कभी किसी ने पहले देखा भी जो ना था। सांप कैसा भी हो जहरीला हो न हो डरावना तो होता ही है।
कन्हैया अपनाने पीछे सपेरे को बैठा लाया था और पैसे की बात किसी और से न करने की हिदायत भी दे कर ही लाया। सपेरे ने भीतर जाकर देखा फिर कन्हैया से मोल भाव करने लगा जैसे तैसे सौदा चार सौ रुपये में तय हुआ । नाग देवता ने बचे पैसे उसे बक्सिश में दे दी थे तो वह खुश हो गया।

सपेरे ने झोले में से चिमटा निकाला और लकड़ी लेकर वह जा घुसा भीतर। उसके भीतर घुसते ही सब के सब पीछे हो लिए की वह सांप कैसे पकड़ता है। सपेरे ने सांप को देखा तो वो वहीँ था। लकड़ी से हिलाया तो वह फुदका। सपेरा डर गया और पीछे आ गया। कहने लगा साब बड़ा खतनाक जनावर है उछलता भी है। चिमटे से ही पकड़ के काबू करना पडेगा। वह फिर अँधेरे में घुसा और चिमटा लेकर झपट पडा मगर सांप चिमटे से छुट गया जानकर वह वहीँ धडाम से जा गिरा। और सांप जो सांप था ही नहीं वरन मोटी मोटी आँखों वाला मोटा सा एक कबरबिज्जू था जो तेजी से निकल कर खड़े लोगों के बीच से निकला। लोग इस अप्रत्याशित घटना से बिदके घबरा से गए और उनमे से कुछ गिर पड़े। डाक्टर साहब को टेबल आ लगी। कन्हैया सकते में था जैसे जैसे बात समझ में आने लगी और सपेरे के गिर जाने की बात पता चली तो सारे अस्पताल में हंसी की फुहारे चल पड़ी। आज भी सारा गाँव सपेरे को चिमटा दिखा चिढाता है और जब कभी सांप की खबर सुनाई पड़ती है कबर बिज्जू याद आता है जो अस्पताल में अवैध और कन्या भ्रूण खाने को रहने लगा था।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

क्या कहना सेवा और स्मरण का .....

पडोसी "दादाजी " के निधन पर उनके मिलने जुलने तथा रिश्तेदारों का जमघट लग गया। अर्थी उठाने से लगाकर तेरहवे तक गम का माहौल मोहल्ले में आवाजाही से महसूस किया जा सकता था । हालांकि घर के सदस्यों ने उठावना परम्परा का निर्वहन कर रोजमर्रा के काम प्रारंभ कर दिए थे। पंडित जी को बुलाकर अब गरुड़ पुराण का आयोजन रखा गया था जो प्रतिदिन शाम ७ बजे से आरम्भ होता और शोक व्यक्त करने आये लोगों को वातावरण देता था। शोक संवेदना व्यक्त करने आने वाले लोग परिवार की धार्मिकता का गुणगान किया करते और दादाजी की संस्कारित परवरिश की भरपूर सराहना करते।
दादाजी पिछले चार दिनों से बीमार थे। पहले दिन उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया था तो वहां चिकित्सकों की बेहूदा बातें और अभद्र व्यवहार की बात से रुष्ट होकर दादाजी को वे घर ही ले आये थे। चिकित्सकों ने उन्हें बाहर के बड़े अस्पताल ले जाने की बात कही थी जो वे छुपाते रहे। मगर अपने अंतिम क्षणों में दादाजी ने कैसे और कितने शांत भाव से पानी पीया और प्राण त्यागे का वृत्तान्त अवश्य सुनाया जाता रहा ।

दादाजी का एक पोता अपनी पत्नी और बेटे के साथ घूमने गया था और उसके वहां से लौटने की संभावना यह थी कि यदि वह कैसे भी निकले तो वापस आने में उठावना हो जाना था यानी निर्धारित कार्यक्रम को स्थगित कर वापस लौटने का कोई लाभ नहीं था। जब वह लौटा तो दादाजी को गए यह पांचवा दिन था। २५००० रूपए प्रति व्यक्ति पॅकेज पर वह गया था। जब उसे खबर मिली तो वह खाने कि टेबल पर था जहां ७५० रूपए प्रति व्यक्ति कि दर से खाना परोसा जाने वाला था। उसे यह खबर इतना विचलित कर गई कि वह निवाला तक न ले सका। पांचवे दिन वह निर्धारित टूर पॅकेज से पहुंचा था और अगले ही दिन उसके बेटे का पहला जन्मदिन था। जनम दिन मनाने कि सूचना सभी को थी और इसलिए होटल में जा कर यह दिवस मनाया जाना था जिसे निरस्त कर घर ही घर में मानना पड़ा। उसकी ससुराल के लोग भी यह जन्मदिन मनाने पहुंचे थे और इस बहाने से दादाजी के निमित्त बैठ लिए। वे अपने जवाई आने के बाद ही तो वहां बैठने जा सकते थे सो उन्होंने रिवाज भी निभाया। वाकई लग रहा था कि दादाजी कि मृत्यु से परिवार बेतरह प्रभावित है।

रस्मोंरिवाजों कि खातिर दादाजी का कार्यक्रम बड़े खर्च से हुआ लगभग आठ से दस लाख रुपये भोजन करने और शोकसंवेदना व्यक्त करने आये लोगों को बर्तन बांटने में खर्च कर दिए गए। हालांकि भोजन के सुस्वादु और दादाजी को सुहाने वाली तमाम मिठाईयों के बनाए जाने बावजूद कोई उत्साह या चटखारा लिया जाना उचित नहीं था सो बेमन से भोजन के बड़े से कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। लगभग तीन हजार लोगों ने यह भोजन ग्रहण किया होना प्रतिष्ठा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। अभी पिछले बरस दादीजी नहीं रही थी तब दादाजी ने अपनी गाँठ से ९ लाख रुपये खर्च किए थे और समाज को कमरा निर्माण के लिए २ लाख अभी महीने भर पहले ही तो दिए थे।

आज दादाजी को गए एक महिना पूरा होने को है और घर के सामने रखी पुरानी गाडी बेचकर नई दो गाड़ियां १५ - १५ लाख खर्च कर खरीदी गई है और इन पर ग्रुप ऑफ़ दादाजी लिखा गया है। यह बातें बताती है कि रईस घर में कितना पैसा है। तीसरे महीने की शुरुआत ही में एक नई कालोनी दादाजी के नाम कटाने के विज्ञापन लगे हैं। शहरसीमा से जुडी इस प्रस्तावित कालोनी की जमीन पर आज एक ऑफिस का उदघाटन है जिसका आशीर्वाद देने धर्मगुरु एक फूलों सजी गाडी से पहुंचे है। उनके आते ही पांडाल में पैर छूने कि होड़ मच गई है और मंच संचालक विनती कर रहा है कि गुरु महाराज कार्यक्रम के उपरान्त भी उपलब्ध रहेंगे सो कार्यक्रम समय पर किया जाने में विलम्ब न होने दें। जिस कालोनी का शुभारम्भ किया जाना है उसके हवन की समाप्ति हो चुकी है और अब कार्यक्रम पूरा हुआ है।

पांडाल में बांटे गए अखबार को जिसमे कालोनी का विज्ञापन है पढ़ रहा हूँ। एक खबर के शीर्षक ने चौंका दिया है। इसमें जंगलों के सर्वनाश और चिड़िया की किसी प्रजाति के लोप होने की बात लिखी है। लिखा गया है इंसानी अभीप्सा का शाप इन बेजुबान प्राणियों को लगा है। बदलते परिवेश ने कैसे पर्यावरण को दूषित कर दिया है आदि।

मै सोच रहा था ........... उस इंसान को जो अपने पूर्वजों के नाम को कमाई के दांव पर लगा रहा था। जिसकी संवेदनाए पैसे में निहित थी, करोडो के मालिक दादाजी के इलाज के लिए बाहर जाना, इलाज कराना और सेवा करने का कष्ट बड़ी मुसीबत था क्योंकि वे उम्रदराज भी तो थे।जीवदया और करुणा का अहिंसक पाठ सिखाकर गए दादाजी के जाने से आज वाकई एहसास हो रहा था की संवेदनशीलता और मानवता का अंत हो चुका ।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

हो ली होली..........

फागुन का महिना आया । बसंती वातावरण के आगाज़ के बाद । टेसू की चटखदार रंगत से पहाड़ी की आभा बदलने लगी। ताड़ के ऊँचे खड़े पेड़ों पर ताड़ी निकालने के लिए मटकियाँ बाँधी जाने लगी। जंगल की अमराई बौरा गई है। आम की खट्टी खुशबु से शरीर में मादकता का एहसास होने लगा है । आम के पेड़ के नीचे बुढा चुकी नर्मदा हाथ में लकड़ी का डंडा जिस पर नारियल की कटोरी बना कर ठोकी गई है ले कर खड़ी है। चमत्कृत प्रभाव पैदा कर रही वेशभूषा में आये आदिवासी युवाओं ने उससे दोनों हाथ आगे कर मिलाए और फिर कुछ बात हुई है। नर्मदा ने अपना बनाया हुआ चम्मच पास रखे मटके में डुबोया है, बाहर निकाला तो उसमे से "जल" टपकता दिकाई दे रहा है । युवकों ने हाथ मोड़कर अंजुली बनाई है और मुह से सटाकर उडेला जा रहा "जल"पान करने लगे हैं। एक एक चम्मच पिलाने के बाद कुछ सौदा हुआ मालूम दे रहा है क्योंकि हाथो में कुछ रुपये निकाले गए नजर आ रहे हैं। मैं बेसब्र होकर यहाँ जा पहुंचा हूँ । यहाँ जो सौदा हो रहा है वह ताड़ी के लिए है और इसके गुणगान कर मुझे सौम्य सुमधुर और स्वादिष्ट पेय के रूप में मुझसे भी चख कर देखने को कहा गया है। मैंने उनसे शराब नहीं पीने की बात कही है तो मुझे समझाया गया की यह तो पेड़ का निकला रस भर है और इसे पीने से सुर्ख गुलाबी रंगत आती है। इतने में हाथों में डिब्बे थामे दो नव युवतियां और छोटे बच्चे भी यहाँ आ गए हैं। ओक में ताड़ी लेकर इन युवतियों और बच्चो ने रसास्वादन किया और अब खरीदी के लिए मूल्य तय हो रहा है। इन दिनों मेहमान आने पर उसके स्वागत में ताड़ी पिलाए जाने की प्रथा है। मटके से निकल कर आ रही मटमैल सी मादक गंध ने मुझे बेचैन कर दिया । होली का त्यौहार आने को है और यहाँ आदिवासी परम्परा के भगोरिया हाट जाने की तैयारी होने लगी है। चटख नीले रंग पर सफ़ेद गुलाबी धागों कसीदा किया जैकेट को हलके पीले रंग के कुरते पर पहना गया है । गुलाबी रंग के साफे पर चिड़िया के पंख का तुर्रा और गोफण बाँधी गई है । हाथों में बांसुरी लिए इस युवक से जिसकी कमर पर काला डोरा गले में चांदी की हंसुली हाथो में कडा और जूतियाँ पहन रखी है से कुछ युवक कहीं से आ कर मिले हैं और लगभग उसी के समान पहनी वेश भूषा वाले इन युवकों के पास भी विभिन्न वाध्य यंत्र है जिनमे ढोल , मांदल, झांझ , थालियाँ आदि मै देख रहा हूँ । एक दुसरे से हाथ मिलाकर के सभी एक घाटी की और उतर गए हैं अचानक शांत इस वातावरण में लयबद्ध संगीत सुनाई देने लगा है जो गूंजता सा महसूस हो रहा है । पास आते इस संगीत को मै महसूस कर देखता हूँ की वही युवक जो आपस में मिले थे अब संगीत बजाते कहीं जाने को फिर से सड़क की और लौटे हैं । इनके पीछे कुछ युवतियां भी चल पड़ी हैं । इस जगह से कोई ७ किलोमीटर दूर बड़े गाँव की और जहां आज हाट मेला भरने वाला है ये सब पैदल चल पड़े हैं । सुन्दर परिधान और गहने पहने ये युवतियां देखी जा सकती हैं । इनका अनोखा पहरावा फिर दूर कहीं किसी अन्य पहाड़ी के पीछे से आ रहा संगीत वातावरण को मद मस्त बना रहा है । अब इनके पीछे मै भी भगौरिया हाट मेले में जा पहुंचा हूँ । मेला मैदान गाँव के समीप बड़े मैदान में लगा है यहाँ सड़क किनारे से दुकाने शुरू हो गई हैं । बांस तथा हथियारों की दुकाने जिनमे तीर कमान, धारिये बांसुरियां रंगीन किये छोटे डंडे , तार बुने लट्ठ आदि चीजों का सौदा हो रहा है ठेले, झूले, तम्बुनुमा मटकियों की दुकाने। तेल में तली जा रही जलेबियों और नमकीन को देखा और निकल रही गंध को महसूस किया जा सकता है। एक जगह पर गुड और महुए का ढेर लगा है जिन पर मधु मक्खियाँ और ततैये भिनभीना रहे हैं और एक डर का एहसास भी करा रहे हैं। पान की दुकानों पर ख़ास तौर पर भीड़ है। धुल के उड़ते गुबारों के बीच मै इस बाजार में जा घुसा हूँ। संगीत से एक बार फिर आकृष्ट हुआ हूँ । एक नृत्य करते चली आ रही टोली के पास जा कर देख रहा हूँ। ढनटनन टन टनटन की धुन अब परिचित सी लगने लगी है। मांदल, ढोल, थालियाँ बज रही हैं और आदिवासी गीत के संग हुल्लारा लगाया जा रहा है। मस्ताए युवक युवतियां घेरा बना कर नाच रहे हैं दो कदम पीछे चार कदम आगे फिर उलटे घूमकर दो कदमो की झटकेदार चाल के साथ हाथों में तार पिरोए घूँघरूओं की छनछनाहट का यह भावविभोर नृत्य है। पास खड़े युवक इसमे शामिल हो गए तो घेरा बड़ा हो गया है। नृत्य संगीत का जोर बढ़ गया है। सारे वातावरण को देख और इस प्रणय पर्व के बारे में समझ कर और जानकारियाँ लेकर आगे की और निकल चुका हूँ ।

अगले पड़ाव पर गलदेव का मेला भरने की खबर मिली है। यहाँ पहुँच कर देखता हूँ की यहाँ भी चहल पहल बनी हुई है मगर लोग बाग़ बड़े शांत नजर आ रहे हैं। एक बड़े से ओटले के समीप एक लगभग ३० फुट ऊँचे खम्भे पर कमर से कपड़ा बाँध कर जमीन की तरफ मुह किए किसी को लटकाकर तथा दुसरे सीरे पर रस्सी बाँध कर जमीन पर दौड़ते हुए घुमाया जा रहा है। एक डरावना सा दृश्य देख कर मैं हैरान हूँ। पुजारी से जानकारी मिली है की यहाँ जो व्यक्ति घुमाया जारहा है उसने ख़ुद कोई मन्नत ली थी जिसकी पूर्ती हो जाने पर वह यह काम कर रहा है। मन्नत के अनुसार एक तीन या पांच चक्कर घुमाकर उतार लिया जाता है । उतारे गए व्यक्ति से पूछा कि तुम्हारी क्या मन्नत थी तो उसने बताया कि लड़का होने कि मन्नत मैंने ली थी और इसी के लिए आज गल देवता के ओटले पर आकर मन्नत पूरी हो जाने से तीन चक्कर लगवाए है । चक्कर लगवाने के लिए उसके साथ उसका भाई, पिता, बुआ, साला और पत्नी आये है। जिन्होंने नीचे रसा पकड़ कर दौड़ लगाईं थी । मैंने उससे इस हैरत अंगेज मन्नत के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके पिता ने भी यहाँ मन्नत ली थी और वह हुआ था। मैंने उसके पिता से चर्चा कि तो उसने अपना कुरता उतार कर पीठ दिखलाई तो वहां मैंने पुराने सूखे घाव के निशान देखे। उसीने बतलाया कि आज आपने देखा है कि कपडे से मेरा बेटा कमर पर पट्टा बाँध कर झुला है मगर बीते दिनों में हम लोग सीधे चमड़े के भीतर हुक घुसवाते थे और फिर लटक कर झुलाते थे पीढ पर बने ये निशाँ उसी हुक कि वजह से बने हैं। मैं अन्दर तक बेहद हिल सा गया यह बात सुनकर । फिर वाह बताता गया कि कैसे वह घाव सुखा और काम पर जा नहीं सका था । मैंने पूछा "क्या आज भी कोई अपनी मन्नत इस तरीके से सीधे चमड़ी में हुक घुसवाकर लटकाया जाकर मन्नत पूरी करता है?" मुझे ज्यादा देर इन्तजार नहीं करना पडा और एक अधेड़ से आदिवासी ने सीधे पीठ में हुक घुसवा कर पांच चक्कर लगाए थे । बगैर चीखे उसने यह मन्नत तो पूरी कर ली मगर जब उसे उतारा गया तो वह लुहूलुहान था और पसीने से तर बतर भी लगभग बेहोश सी हालत में । एक सादे कपडे से उसके घाव पोंछ कर वहां कुछ पीले हरे रंग का लेप लगाया गया। मैं एक अजीब सी मन्नत परम्परा से वाकिफ हुआ था इस बसंती दौर में.....।

शाम को वापसी में सड़क पर लडखडाते युवक जो बड़ी मात्रा में शराब पिए थे देखने को मिले । और यही इस इलाके के खतरे का संकेत समझा जा सकता है क्योंकि नशे में वे कुछ भी कर सकते हैं ।

मुझे बचपन के दिन याद आये कि ढपली का बड़ा स्वरुप "चंग" कैसे बजता और कैसे मोहल्ले के राजस्थानी लोग सिर्फ थाप कि आवाज मात्र सुनकर निश्चित स्थान पर अपने सारे जरुरी काम छोड़कर आ पहुंचाते। होली के दिन आते ही हुकुमसिंह जी कैसे अपना चंग तैयार करते और कैसे उसकी ढीली पड़ गई रस्सियों को कसकर उसे बजाया करते। घर के कोने में यह चंग बाकी दिनों कैसे दीवार पर टंगा मिलता था आदि। यह चंग बजाने के लिए वे अपने अँगुलियों पर कैसे लकड़ी को बांधा करते ।

उनका प्रिय गीत था "राजा बलि के दरबार मची रे होली राजा बलि के"। पूरा गीत मुझे याद नहीं मगर बीच में वे जो कथा सुनाते थे उसके मतलब में कितना बड़ा महल है और उसमे कितनी रानिया है जो आज होली खेल रही है। कितना रंग टेसू से बनाया गया है पानी कितनी दूर से हाथी और बैल गाड़ियों से लाया गया है। कितना गुलाल उड़ा है कि पूरा राज प्रासाद रंगीन हो गया है। ढोल तुरही आदि संगीत के वाध्य यंत्र कितने लोग बजाने पहुचे है कहाँ कहाँ से संगीतज्ञ बुलवाए गए है। कितना ईनाम बटेगा। क्या क्या पकवान खाए खिलाए जाएंगे आदि का वर्णन था।

हुकुम सिंह जी का रुतबा था कि उनके सभी सहयोगी बगैर किसी बहाने के सारे काम छोड़कर आधा किलोमीटर कि दूरी से भी सिर्फ चंग कि आवाज़ भर सुन दौड़े चले आते थे और यहाँ का रंग भी होली के दिनों का बना देते थे ठेठ राजस्थानी। होली जलाने के लिए जिस दिन डांडा गाडा जाता उसी दिन से होली कि चहल पहल प्रारंभ हो जाती। किसी पेड़ कि टहनी को काटने गए युवकों के पीछे कितने दूर तक चोकीदार दौड़ा और कैसे उसे चकमा देकर भागना पडा। कभी मुह अँधेरे किसी के बाड़े में रखी घांस को कब और कैसे कोई चुरा ले गया आदि किस्से इन दिनों की चर्चा का विषय होते थे। एक दिन तो हद ही हो गई जब घर के बाहर खटिया पर सोए एक व्यक्ति को कुछ लोगों ने उठाकर नीचे ओटले पर रखा और उसकी खटिया कि होली जला डाली थी। सारे मोहल्ले में इस बात से हंसी और घबराहट का वातावरण बन गया था। हालांकि होली में योगदान न करने वाले किसी व्यक्ति के ही साथ इस प्रकार का व्यवहार होता है प्रचारित किया जाता था ताकि लोग अपनी हिस्सेदारी से मुह न मोड़ें।

रंग उड़ाते पिचकारी चलाते बड़ा ही आनद आता था। पिताजी इन दिनों के लिए खासकर चांदी से बनी पिचकारी निकाला करते और केसर का रंग घर आने वाले पर डालते थे। हमें भी यह रंग डालने का कभी कभार अवसर मिलता था। होली खेलकर कपडे सुखाते व्यक्ति को फिर फिर गिला किया जाता। रंग खेलते लोगों के बीच नाश्ते की परोसगारी होती और रंग से सने हाथों से मिठाइयां खाई खिलाई जाती। रंग प्राकृतिक ही इस्तेमाल होते थे तो जहरीला होने का ख़तरा नहीं था। कई लोग तो गुलाल भी घर ही पर बनाते थे जैसे हल्दी में चुना लगाकर लाल रंग का गुलाल। अरारोट के आटे में खाने का रंग मिला करता। कईयों के परिवार गरीब भी थे मगर शक्करपारे और दूसरी मिठाईयां जरूर बनती थी। कुछ तो किसी के यहाँ से तेल, घी, शक्कर आदि मांग कर ले जाने की बातें भी सुनते थे। पर त्यौहार था और मजाल थी की नहीं मने। गाय के पानी पीने के हौद भी इस दिन साफ़ हो जाया करते थे। होली जो खेलनी होती थी। त्यौहार थे मनाए जाने के लिए तो मनाए भी जाते थे और आज क्या हश्र है उनका हम सभी जानते हैं। प्रकृति आज भी है उसका आनद जो होली के दिनों का है वह भी वैसा ही है। टेसू फूलता है। ताड़ी निकलती है, अमराई बौरा कर खट्टी गंध बिखेर मादकता घोलती है। गेहूं पकते हैं चना भर आया करता है। पीली सरसों और लाल राजगीरा आकृष्ट करता है। अफीम के फूलो की रंगत बदल जाती है। सब का सब वैसा ही है जैसा होता आया है पर बदल गया है तो आज का इंसान। अब न वह चंग बजता है, न लकड़ी की लूट ही होती है। न कोई प्रेम से मिलता है। न कोई रंग प्रेम से लगवाता ही है। लेकिन एक बात है जो अक्सर होती ही है की अंग्रेजी केलेण्डर के बावजूद फागुन आता है, होली का त्यौहार भी आता है। आदिवासी अंचल है जो आज भी भगौरिया और गल मन्नत की परम्परा निबाहता है।

* चंग : ढपली की तरह का एक वाध्ययंत्र है जो रस्सी से चमड़े को कसकर बनाया जाता है । दूसरी और देखने में गोलाकार होकरहाथों की अँगुलियों में लकड़ी की खपच्चियाँ बाँधकर बजाया जाता है। इसे फ्रेम ड्रम भी कहा जा सकता है।

*गल : यह लकड़ियों के खभे जोड़कर तैयार किया जाने वाला एक औजार नुमा यंत्र है। इसके एक खभे को जमीन में उर्ध्व गाड़ दिया जाता है जबकि दुसरे खम्भे को उंचाई पर दुसरे छोर से जमीन के समानांतर इसी गाड़े गए खम्भे पर जोड़ा जाता है जो वहां एक बड़े छेद में फंसा रह कर गोलाई में घूम सकता है। समानांतर लगाए इस खम्भे के एक सिरे पर रस्सी और दुसरे सिरे पर आदमी को लटकाए जाने के लिए हूक जुडा होता है। भैरव देव की तरह सिंदूरी रंग से चोला चढ़ाकर देवता बनाए जाते हैं जो की यहाँ पूरे साल होते हैं। मगर गल सिर्फ त्यौहार के दिनों में ही बाँधी जाती है।

यात्रा संस्मरण

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

रोटरी क्लब रतलाम लगातार तीसरी बार जीता


mahendra patva aur ramesh pipada won the final second time.

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

बर्ड्स वाचिंग / नेचर ट्रेकिंग दिवस

बड़े सवेरे उठकर प्रातः भ्रमण करने को मेडिकल साईंस भी प्रोत्साहित करता है। शुद्ध वायु का शरीर में संग्रहण और तीव्र रक्त संचार के लिए "मोर्निंग वाक" का महत्त्व है । गर्मी के दिनों में प्रायः लोग इस कार्य हेयु समय निकाल लेते हैं और सवेरे दो पांच की.मी का भ्रमण करना प्रारंभ कर दिया करते हैं। बरसात और सर्दियों की प्रकृति बाधा बन जाया करती है फिर भी कई लोग इसे जारी रखते हैं। हाँ अब घरों में मशीने लगाकर लोग पैदल चलने की कसरत कर लिया करते हैं। ऐसे में एक दिन शहर के नजदीकी तालाब के किनारे पूरा का पूरा परिवार लिए बड़ी संख्या में परिवार सहित कई लोग आने लगे तो तालाब पर नियुक्त कर्मचारी आश्चर्य में थे । यहाँ गाहेबगाहे ही कोई जाता है वह भी कोई पर्यावरण प्रेमी हो तभी। अचानक इतने लोग देख वे आश्चर्यचकित थे। उनके लिए इतनी बड़ी संख्या में परिवार सहित पहुँचना असामान्य बात थी, फिर यह तो सवेरा ही था।
छोटे बच्चे, किशोरवय, युवा, बुजुर्ग और दंपत्ति सभी तो थे। बर्ड्स वाचिंग और नेचर ट्रेकिंग को समर्पित इस दिन के लिए मैं विशेष तौर पर आमंत्रित था। बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के संस्थापक के रूप में मेरी उपस्थिति यहाँ चाही गई थी। मैं अपने भांजे सिद्धार्थ के साथ यहाँ पहुचा था। सिद्धार्थ कक्षा ७ वी का विद्यार्थी है और उसका वाईल्ड लाइफ सेन्स बेहद ही सराहनीय है।
प्रोफेशनल हाईड्रोलोजिस्ट श्री सुधीन्द्रमोहन शर्मा जी की यह परिकल्पना थी जो प्रकल्प के स्वरुप में उजागर होने जा रही थी। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए नए क्लब के समस्त सदस्य पूरे जोश से अपनी भागीदारी के लिए उपस्थित थे जिसकी वजह से यह समाँ बन आया था।
बर्ड्स वाचिंग और नेचर ट्रेकिंग दोनों शब्द उत्सुकता और जिज्ञासा का कारण जान पड़े इसी वजह से बड़े सवेरे मुंह-अँधेरे जबकि सूर्योदय में आधा घंटा शेष बचा था, बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
धीरे धीरे भोर का अहसास जागा। जैविक घडी पर जीने वाले परिंदों में हलचल महसूस की जाने लगी। पेड़ों पर पत्तियों की खडखडाहट और इक्का दुक्का चहचहाहट के स्वर प्रस्फुटित होने लगे। प्रारम्भिक हिदायतों के अनुरूप प्राकृतिक रंगों से मेल खाते, धूसर रंग के कपडे पहने, सर पर पी केप लगाए, स्पोर्ट शू पहने लोग अब अपनी अपनी डायरियों में स्वर के जरिये पक्षी को पहचान कर लिखने का प्रयास करने लगे। सुबह की बेला वैसे ही सुहावनी होती है परन्तु यदि स्थान प्राकृतिक समृद्धता से भरे हो तो मन को बड़ा ही आनंददायक और हिलोरे देने वाला महसूस होता है. चिडियों की चहचहाहट और फिर उनकी अठखेलियाँ देखना बुजुर्गों को बीती यादों में तो बच्चों को नए अनुभव के रूप में दर्ज होने लगा। आधुनिकता की भाग दौड़ भरी जिंदगी अलग शांत सुरम्य प्रकृति के प्रांगण के आनंददायी क्षणों का अहसास सुकून भरा स्वस्थ वातावरण प्रस्फुटित होने लगा। आसमान की रंगत बदलने लगी। अब खडखडाहट करने वाले पक्षी दिखलाई पड़ने लगे मगर पर्याप्त उजाले के न होने से उनके चटखदार रंग नज़र नहीं आ पा रहे थे फिर भी उन्हें आकार के आधार पर पहचाने जाने के प्रयास हुए। सभी ने इसमें अपना उत्साह दिखाया। हालांकि खामोशी व्याप्त थी मगर उनका उत्साह महसूस हो रहा था।
आसमान अब गुलाबी फिर केशरिया होने लगा परिंदों का फुदकना और उड़ निकलना चालू हो गया। तालाब के पानी पर केसरिया प्रतिबिम्ब बनने लगा। मेघ केसर फुटकी, शकरखोरा, अंजन, कौए, मैना, तोते, पहचाने जाने लगे। पानी पर पक्षियों के उतरते झुण्ड ने बच्चों को चकित कर डाला। बड़े भी इस दृष्य से प्रभावित तो थे ही। सूरज की चमक और तालाब के बीच सड़कनुमा भ्रमण क्षेत्र यहाँ की सुन्दरता को चार चाँद लगा रहा था तालाब से उभर कर आ रही प्राकृतिक और आर्द्र गंध, पेड़ों पर लदे फूलों के बीच प्रकृति का आनंद लेते हुए जैसे जैसे आगे गए तालाब के किनारे, पेड़ों के ऊपर कई तरह के प्राकृतिक नज़ारे और विभिन्न पक्षी देख मन रोमांचित हो उठा।
वनस्पति और पक्षियों को पहचानने के साथ अब साथ लाए केमेरा इन क्षणों को संजोने के प्रयास में निकालने लगे। कौन कौन से पक्षी देखे गए उन्हें पहचान कर लिखा जाने लगा। आज सुबह किन किन पक्षियों को देखा? कौन से ऐसे पक्षी थे जिन्हें पहली बार देखा है? आदि बातें गौरतलब रही। फ़िज़न्ट टेल्ड जकाना को जूम लेंस से फोटो खींच कर देखा तभी पहचाना जा सका। हुदहुद, कोयल, पनडुब्बी, चिबरा के अलावा खंजन, धोबन, सिकतार, लमगोड़ा, बत्तख, चील, धनेश आदि पक्षी; डायरियों और केमेरा में दर्ज हो गए। बगुले की विभिन्न प्रजातियाँ नाईट हेरोन, पोंड हेरोन, केटेल इग्रेट, ब्लू हेरोन, आदि से जब रु ब रु कराया तो कई लोग इस बात से अचंभित थे। मछरंगे के चटख सुर्ख रंगों से आकृष्ट होने के बाद स्माल और व्हाईट क्रेस्टेड किंग फिशर के भेद जानने को मिले. सिद्धार्थ ने एक ही जगह पर स्थिर उड़ रहे पक्षी की और इशारा किया जो बाद में झाड़ियों के बीच कहीं लपकता सा गोता लगाता नज़र आया उसे बाज की प्रजाति के रूप में बताते हुए बताया कि फाल्कन की हमारे यहाँ कई प्रजातियाँ हैं और अक्सर खेतों के बीच इसी तरह की उड़ान आप सब गाहेबगाहे देख सकते हैं। बाज की विभिन्न प्रजातियों के बारे में सुनकर भी सभी स्तब्ध थे।
आंकड़े के फूल पर पराग पीते चटखदार नीलाभ रंग लिए पक्षी को किसी बच्चे ने हमिंग बर्ड के रूप में पहचाना तो बताना पडा कि यह शकरखोरा कहलाता है जिसे इंडियन सनबर्ड कहते हैं। इसकी मादा इतनी सुर्ख रंग की नहीं होती। हमारे यहाँ सारस, स्टोर्क जैसे पक्षियों के अलावा ग्रीन बी ईटर, केनेरी फ्लाय केचर आदि अनेक पक्षी मौसम बदलने के साथ आते हैं और मौसम बदलते ही चले भी जाते हैं । इन्हें हम "मायग्रेटरी बर्ड्स" कहते हैं।
सुबह तालाब के किनारे टहलते हुए कब चार (4) किलोमीटर चल लिए पता ही नहीं चला। अब बच्चों को भूख लग आई थी और वे साथ लाए बिस्किट और पानी का आनंद लेने लगे। चिड़ियों के चित्ताकर्षक रंग देख वे खुशियों से सराबोर थे। हम वापस लौटने लगे और अब जितनी जानकारी उन्हें मिली थी उनके आधार पर वे चिड़िया पहचानते चल रहे थे। आपस में बतियाते सुबह जहां से सफ़र शुरू किया था वहां पहुंचे तो नाश्ते का आयोजन था। नाश्ता कर चाय पी फिर पौधारोपण किया। यहाँ बने एक कमरे में नेचर कलब के सदस्यों ने फोटो प्रदर्शनी लगाई थी जिनमे इसी तालाब पर आने वाले पक्षियों के फोटो लगाए गए थे। इसे देखते वक्त भी चिड़िया पहचानने का जतन हुआ। फिलहाल यह कार्यक्रम इतना ही रखकर समाप्त किया गया। दोपहर और शाम के बदलते समय के परिदृष्य और आचार व्यवहार बताने के लिए सभा समाप्ति का कार्यक्रम हुआ जिसमे कई बाते उजागर हुई। बच्चो में प्रकृति के प्रति स्वाभाविक रुझान का अनुभव कंप्यूटर युग में देखा जाना ख़ुशी भर गया और मैं लौट आया अपने शहर ......

विरासत की सीखें - हमारा भविष्य क्या?

बचपन के दिनों जब गर्मियों की छुट्टी मनाने नानी के यहीं जाना होता था। कभी शादियों के लिए कभी वैसे ही। किसी पहाड़ी या ठण्डे ईलाको की सैर पर। कभी महानगर तो कभी एतिहासिक विरासत के स्थानों पर। ट्रेने और बसें भीडभाड भरी होती थी। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन आने का लंबा इन्तजार करना होता था। रिज़र्वेशन क्या होता यह उम्र के साथ साथ मालूम होने लगा था। पहला दर्जा, थ्री टीयर या सेकण्ड क्लास स्लीपर जैसे शब्द भी धीरे धीरे समझ में आने लगे थे।
जब ट्रेन में जगह रोक कर बैठ जाते तो बड़ा सुकून मिलता था। गंतव्य तक पहुँचते करते ट्रेन सभी स्टेशनों पर ठहरा थी। क्रोसिंग के लिए ईन्तजार करना। चेन पुलिंग आदि बातें। बीच में नदी कब आएगी? कितना बड़ा पुल आयेगा? टनल्स यानी बोगदे कितने आयेंगे, कब आयेंगे? छुकछुक करती ट्रेने भाप उड़ाते, जलते कोयले उड़ाते चला करती। पहाड़ी के घुमावदार मोड़ पर अतिरिक्त ईंजन लगता। जंगलों के बीच से जब गाडी निकलती तब कई किस्से सुनने को मिला करते जैसे परसों हाथी पटरी के बीच में खडा हो गया था तो ट्रेन रोकी गई थी आदि।
ट्रेनों का सफ़र धीरे धीरे बदल गया और यात्री सुविधाएं बढ़ गई। नेरोगेज, मीटरगेज,ब्रोडगेज के बाद अब इलेक्ट्रिफिकेशन। स्टीम लोकोमोटिव के बाद डीज़ल लोकोमोटिव के अनेक मोडल वाले इंजन आए। फिर डीज़ल के डब्ल्यू डी एम् इंजनो की बाते भी बीती हो गई डब्ल्यू ऐपी जैसे विधुत ईंजनो ने जगह बना ली। अब डेमू और मेमू के बाद दुरंतो तेज रफ़्तार गाड़ियां चर्चा में है। तेज रफ़्तार का दौर और जिन जगहों पर पहुँचाने में जहां सारा दिन बीत जाता था अब महज कुछ ही घंटो में सफ़र तय होने लगा। दादी नानी तो कभी माँ पिताजी के साथ सफ़र किया करते। जो मजा बचपन में आता था वे यादें आज भी रोमांच भर देती है। गर्मी में पानी की छागल खिड़की पर बंधी जाती या रस्सी बुनी सुराही ले जाते वक्त उनके खाली होने पर उसे अगले स्टेशन पर फिर से भरवाने का जतन करना और पानी भर जाने पर सुकून मनाना। ट्रेन चल पड़ने तक पानी भरने गए व्यक्ति का न लौटना फिर अगले स्टेशन पर वापसी और पानी के लिए जतन के कईयों किस्से। ट्रेन जब कभी नदी पर से होकर गुजरती तो दादी/नानी के बटुए में से १०, २० या २५ पैसे के सिक्के निकला करते जिसे हमें कृतज्ञतापूर्वक नदी माँ को समर्पित करना सिखाया जाता। दादी/नानी तो हाथ जोड़कर कृतज्ञभाव से इन नदियों को प्रणाम किया करती। गर्मी के दिनों में भी पानी से भरी रहनेवाली नदियों के ऊपर से झटक पटक झटक पटक का संगीत कर पुल पर से होकर गुजरते तो शरीर का कोई अंग बगैर बाहर निकाले सिक्के निछावर करने की हिदायतें मिला करती। पुल से पानी तक लहराकर जाते सिक्के देख ख़ुशी मिला करती थी। नदियों के प्रति यह भावना लम्बे समय तक बनी रही। आज भी जिन नदियों के पुलों पर से बचपन में गुजरे उन पर से गुजरते वक्त बचपन की वे यादे ताजा हो जाती हैं। अब एक टीस उठा करती है की गर्मियों के दिनों तक जिन नदियों में पानी भरा रहता था अब वही नदियाँ कहीं पत्थर तो कही रेत की तलहटी का नजारा देती दिखाती हैं।
पानी के लिए मटके लिए बच्चे स्टेशनों पर १० पैसे गिलास की दर से पानी बेचा करते या कभीकभार जल सेवा वैसे ही कर दिया करते। एक रूपए में वे सुराही या छागल ही भर देते और सारे परिवार को पानी पिला देते। ट्रेन से उतारकर प्याऊ तक जाना बड़ा ही कठीन कार्य होता था। छोटे छोटे प्लेटफार्म पर टोटियां देख कर आश्चर्य होता था। टंकियों से पानी की यह व्यवस्था अंग्रेज शासन की देन होने की बातें हमने बुजुर्गों से सुनी थी। इन व्यवस्थाओं के प्रति धीरे धीरे नकारात्मक रवैया बनने लगा । लोग नलों को तोड़ डालते पानी की जगह कुल्ला कर गन्दाकर देते पान तमाखू से निकास अवरुद्ध कर देते जो वे अब भी करते हैं हर कहीं गन्दा थूक कर। फिर गर्मी के दिनों में सामाजिक संस्थाओं द्वारा पानी की निशुल्क व्यवस्था दी जाने लगी। लम्बी दूरी की ट्रेनों में पानी की निशुल्क व्यवस्था रेल प्रशासन ने की। फिर चला बोतल बंद पानी का और पॉउच संस्कृति का दौर जो अब आज का है। फ्रिज में ठंडा किया पानी हर कहीं उपलब्ध है। पानी के पाउच लगातार चलती ट्रेनों में भी मिल जाते हैं।
यह बात अपनी झोंक में कह दी तो कंप्यूटर युग के नौनिहाल पूछ बैठे कि आपके बीते अनुभवों से हमें क्या मिलेगा? हमें तो उन दिनों में जाना नहीं है ना? अचानक उठे इन प्रश्नों के लिए मै तैयार नहीं था मगर जो बात उन्होंने पूछी उसी में एक समाधान नज़र आया। मैंने कहा माना मेरे बीते अनुभव तुम्हारे किसी काम के नहीं पर आने वाले समय के लिए पिछले उदाहरणों कि जरूरत है। अब उनके चहरे पर उतार चढ़ाव अवश्य ही अनुभव किया जा सकता था। मैंने कहा कि मै तुम्हे बीता समय कितना सुन्दर था वह याद दिला रहा था। मैं बता रहा था नदिया "सदानीरा" होती थी यानी नदी बहते रहते पानी का यह भी एक नाम था । जंगल हुआ करते थे । जंगलों में भरपूर जानवर थे। प्रकृति समृद्ध थी। व्यवस्थाएं भी सुन्दर थी। व्यावसायिक नहीं सेवाकारी थी।
हाँ थी तो? उन्होंने पूछा ।
मैं होले से हंसा और फिर कहने लगा। व्यवस्थाएं सुन्दर थी का मतलब है कि ये लगातार चल भी सकती थी न?
उन्होंने कहा - हाँ। मै फिर बोला लेकिन ये बिगड़ गई, पता है क्यों? वे निरुत्तर मिले। जवाब भी अब मुझे ही देना था। "वजह है हम इंसानों का अभद्र बर्ताव। जिस तरह बीते दिनों कि व्यवस्थाएं बिगड़ी हैं क्या आने वाले समय कि व्यवस्था ठीकठाक चल पाएंगी? तुम ठीक कहते हो........हमारे बीते दिनों से तुम्हे क्या? परन्तु आज जो हो रहा है उससे तो है न? मै फिर मुस्कुराया। अब वे चाहते थे कि मैं कुछ बोलूं पर मैं चुप ही रहा। वे सोच रहे थे मनन कर रहे थे। हाँ आज जो व्यवस्था है यदि इसे बिगाड़ दिया जाए तो हकीकत में कहाँ जाएंगे?
मिटाते चले आ रहे हम अपनी विरासत को तो अंजाम भविष्य का क्या?
बीते अनुभवों से सीख नहीं तो अगले कदम की गुंजाईश का अहसास क्या ?

राजेश घोटीकर
६/१६ एल आई जी बी जवाहर नगर
रतलाम (म.प्र।)
०९८२७३ ४०८३५

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

रोटरी को जोड़ें यूनाईटेड नेशन के एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम से

मेरे समस्त रोटेरियन साथियों
यूनाईटेड नेशंस एन्वायरोंमेंट प्रोग्राम द्वारा आपके द्वारा किये गए पौधारोपण एवं उनकी देखभाल के सम्बन्ध में जानकारी ली जाती है और इसे वे अपनी सहभागिता के रूप में दर्ज करते हैं।
बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के लिए मै सहभागिता प्रमाण पत्र पा चुका हूँ । अब चाहता हूँ की रोटरी मंडल के सभी क्लबो के शामिल प्रयास अपना रेकोग्निशन पा सकें । इस लिए आप सब से अनुरोध है की जुलाई से प्रारभ किए पौधारोपण फिर उसकी देखभाल के पश्चात आज जीवित पौधों की एक समीक्षा रिपोर्ट बनाकर मुझे पोस्ट कर दें।
धन्यवाद
राजेश घोटीकर
डिस्ट्रिक्ट चेयरमेन
प्रीज़र्व प्लेनेट अर्थ
६/१६ एल आई जी "बी"
जवाहर नगर
रतलाम (म.प्र।)
मोबाईल : ९८२७३ ४०८३५