गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

विरासत की सीखें - हमारा भविष्य क्या?

बचपन के दिनों जब गर्मियों की छुट्टी मनाने नानी के यहीं जाना होता था। कभी शादियों के लिए कभी वैसे ही। किसी पहाड़ी या ठण्डे ईलाको की सैर पर। कभी महानगर तो कभी एतिहासिक विरासत के स्थानों पर। ट्रेने और बसें भीडभाड भरी होती थी। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन आने का लंबा इन्तजार करना होता था। रिज़र्वेशन क्या होता यह उम्र के साथ साथ मालूम होने लगा था। पहला दर्जा, थ्री टीयर या सेकण्ड क्लास स्लीपर जैसे शब्द भी धीरे धीरे समझ में आने लगे थे।
जब ट्रेन में जगह रोक कर बैठ जाते तो बड़ा सुकून मिलता था। गंतव्य तक पहुँचते करते ट्रेन सभी स्टेशनों पर ठहरा थी। क्रोसिंग के लिए ईन्तजार करना। चेन पुलिंग आदि बातें। बीच में नदी कब आएगी? कितना बड़ा पुल आयेगा? टनल्स यानी बोगदे कितने आयेंगे, कब आयेंगे? छुकछुक करती ट्रेने भाप उड़ाते, जलते कोयले उड़ाते चला करती। पहाड़ी के घुमावदार मोड़ पर अतिरिक्त ईंजन लगता। जंगलों के बीच से जब गाडी निकलती तब कई किस्से सुनने को मिला करते जैसे परसों हाथी पटरी के बीच में खडा हो गया था तो ट्रेन रोकी गई थी आदि।
ट्रेनों का सफ़र धीरे धीरे बदल गया और यात्री सुविधाएं बढ़ गई। नेरोगेज, मीटरगेज,ब्रोडगेज के बाद अब इलेक्ट्रिफिकेशन। स्टीम लोकोमोटिव के बाद डीज़ल लोकोमोटिव के अनेक मोडल वाले इंजन आए। फिर डीज़ल के डब्ल्यू डी एम् इंजनो की बाते भी बीती हो गई डब्ल्यू ऐपी जैसे विधुत ईंजनो ने जगह बना ली। अब डेमू और मेमू के बाद दुरंतो तेज रफ़्तार गाड़ियां चर्चा में है। तेज रफ़्तार का दौर और जिन जगहों पर पहुँचाने में जहां सारा दिन बीत जाता था अब महज कुछ ही घंटो में सफ़र तय होने लगा। दादी नानी तो कभी माँ पिताजी के साथ सफ़र किया करते। जो मजा बचपन में आता था वे यादें आज भी रोमांच भर देती है। गर्मी में पानी की छागल खिड़की पर बंधी जाती या रस्सी बुनी सुराही ले जाते वक्त उनके खाली होने पर उसे अगले स्टेशन पर फिर से भरवाने का जतन करना और पानी भर जाने पर सुकून मनाना। ट्रेन चल पड़ने तक पानी भरने गए व्यक्ति का न लौटना फिर अगले स्टेशन पर वापसी और पानी के लिए जतन के कईयों किस्से। ट्रेन जब कभी नदी पर से होकर गुजरती तो दादी/नानी के बटुए में से १०, २० या २५ पैसे के सिक्के निकला करते जिसे हमें कृतज्ञतापूर्वक नदी माँ को समर्पित करना सिखाया जाता। दादी/नानी तो हाथ जोड़कर कृतज्ञभाव से इन नदियों को प्रणाम किया करती। गर्मी के दिनों में भी पानी से भरी रहनेवाली नदियों के ऊपर से झटक पटक झटक पटक का संगीत कर पुल पर से होकर गुजरते तो शरीर का कोई अंग बगैर बाहर निकाले सिक्के निछावर करने की हिदायतें मिला करती। पुल से पानी तक लहराकर जाते सिक्के देख ख़ुशी मिला करती थी। नदियों के प्रति यह भावना लम्बे समय तक बनी रही। आज भी जिन नदियों के पुलों पर से बचपन में गुजरे उन पर से गुजरते वक्त बचपन की वे यादे ताजा हो जाती हैं। अब एक टीस उठा करती है की गर्मियों के दिनों तक जिन नदियों में पानी भरा रहता था अब वही नदियाँ कहीं पत्थर तो कही रेत की तलहटी का नजारा देती दिखाती हैं।
पानी के लिए मटके लिए बच्चे स्टेशनों पर १० पैसे गिलास की दर से पानी बेचा करते या कभीकभार जल सेवा वैसे ही कर दिया करते। एक रूपए में वे सुराही या छागल ही भर देते और सारे परिवार को पानी पिला देते। ट्रेन से उतारकर प्याऊ तक जाना बड़ा ही कठीन कार्य होता था। छोटे छोटे प्लेटफार्म पर टोटियां देख कर आश्चर्य होता था। टंकियों से पानी की यह व्यवस्था अंग्रेज शासन की देन होने की बातें हमने बुजुर्गों से सुनी थी। इन व्यवस्थाओं के प्रति धीरे धीरे नकारात्मक रवैया बनने लगा । लोग नलों को तोड़ डालते पानी की जगह कुल्ला कर गन्दाकर देते पान तमाखू से निकास अवरुद्ध कर देते जो वे अब भी करते हैं हर कहीं गन्दा थूक कर। फिर गर्मी के दिनों में सामाजिक संस्थाओं द्वारा पानी की निशुल्क व्यवस्था दी जाने लगी। लम्बी दूरी की ट्रेनों में पानी की निशुल्क व्यवस्था रेल प्रशासन ने की। फिर चला बोतल बंद पानी का और पॉउच संस्कृति का दौर जो अब आज का है। फ्रिज में ठंडा किया पानी हर कहीं उपलब्ध है। पानी के पाउच लगातार चलती ट्रेनों में भी मिल जाते हैं।
यह बात अपनी झोंक में कह दी तो कंप्यूटर युग के नौनिहाल पूछ बैठे कि आपके बीते अनुभवों से हमें क्या मिलेगा? हमें तो उन दिनों में जाना नहीं है ना? अचानक उठे इन प्रश्नों के लिए मै तैयार नहीं था मगर जो बात उन्होंने पूछी उसी में एक समाधान नज़र आया। मैंने कहा माना मेरे बीते अनुभव तुम्हारे किसी काम के नहीं पर आने वाले समय के लिए पिछले उदाहरणों कि जरूरत है। अब उनके चहरे पर उतार चढ़ाव अवश्य ही अनुभव किया जा सकता था। मैंने कहा कि मै तुम्हे बीता समय कितना सुन्दर था वह याद दिला रहा था। मैं बता रहा था नदिया "सदानीरा" होती थी यानी नदी बहते रहते पानी का यह भी एक नाम था । जंगल हुआ करते थे । जंगलों में भरपूर जानवर थे। प्रकृति समृद्ध थी। व्यवस्थाएं भी सुन्दर थी। व्यावसायिक नहीं सेवाकारी थी।
हाँ थी तो? उन्होंने पूछा ।
मैं होले से हंसा और फिर कहने लगा। व्यवस्थाएं सुन्दर थी का मतलब है कि ये लगातार चल भी सकती थी न?
उन्होंने कहा - हाँ। मै फिर बोला लेकिन ये बिगड़ गई, पता है क्यों? वे निरुत्तर मिले। जवाब भी अब मुझे ही देना था। "वजह है हम इंसानों का अभद्र बर्ताव। जिस तरह बीते दिनों कि व्यवस्थाएं बिगड़ी हैं क्या आने वाले समय कि व्यवस्था ठीकठाक चल पाएंगी? तुम ठीक कहते हो........हमारे बीते दिनों से तुम्हे क्या? परन्तु आज जो हो रहा है उससे तो है न? मै फिर मुस्कुराया। अब वे चाहते थे कि मैं कुछ बोलूं पर मैं चुप ही रहा। वे सोच रहे थे मनन कर रहे थे। हाँ आज जो व्यवस्था है यदि इसे बिगाड़ दिया जाए तो हकीकत में कहाँ जाएंगे?
मिटाते चले आ रहे हम अपनी विरासत को तो अंजाम भविष्य का क्या?
बीते अनुभवों से सीख नहीं तो अगले कदम की गुंजाईश का अहसास क्या ?

राजेश घोटीकर
६/१६ एल आई जी बी जवाहर नगर
रतलाम (म.प्र।)
०९८२७३ ४०८३५

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