शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

हो ली होली..........

फागुन का महिना आया । बसंती वातावरण के आगाज़ के बाद । टेसू की चटखदार रंगत से पहाड़ी की आभा बदलने लगी। ताड़ के ऊँचे खड़े पेड़ों पर ताड़ी निकालने के लिए मटकियाँ बाँधी जाने लगी। जंगल की अमराई बौरा गई है। आम की खट्टी खुशबु से शरीर में मादकता का एहसास होने लगा है । आम के पेड़ के नीचे बुढा चुकी नर्मदा हाथ में लकड़ी का डंडा जिस पर नारियल की कटोरी बना कर ठोकी गई है ले कर खड़ी है। चमत्कृत प्रभाव पैदा कर रही वेशभूषा में आये आदिवासी युवाओं ने उससे दोनों हाथ आगे कर मिलाए और फिर कुछ बात हुई है। नर्मदा ने अपना बनाया हुआ चम्मच पास रखे मटके में डुबोया है, बाहर निकाला तो उसमे से "जल" टपकता दिकाई दे रहा है । युवकों ने हाथ मोड़कर अंजुली बनाई है और मुह से सटाकर उडेला जा रहा "जल"पान करने लगे हैं। एक एक चम्मच पिलाने के बाद कुछ सौदा हुआ मालूम दे रहा है क्योंकि हाथो में कुछ रुपये निकाले गए नजर आ रहे हैं। मैं बेसब्र होकर यहाँ जा पहुंचा हूँ । यहाँ जो सौदा हो रहा है वह ताड़ी के लिए है और इसके गुणगान कर मुझे सौम्य सुमधुर और स्वादिष्ट पेय के रूप में मुझसे भी चख कर देखने को कहा गया है। मैंने उनसे शराब नहीं पीने की बात कही है तो मुझे समझाया गया की यह तो पेड़ का निकला रस भर है और इसे पीने से सुर्ख गुलाबी रंगत आती है। इतने में हाथों में डिब्बे थामे दो नव युवतियां और छोटे बच्चे भी यहाँ आ गए हैं। ओक में ताड़ी लेकर इन युवतियों और बच्चो ने रसास्वादन किया और अब खरीदी के लिए मूल्य तय हो रहा है। इन दिनों मेहमान आने पर उसके स्वागत में ताड़ी पिलाए जाने की प्रथा है। मटके से निकल कर आ रही मटमैल सी मादक गंध ने मुझे बेचैन कर दिया । होली का त्यौहार आने को है और यहाँ आदिवासी परम्परा के भगोरिया हाट जाने की तैयारी होने लगी है। चटख नीले रंग पर सफ़ेद गुलाबी धागों कसीदा किया जैकेट को हलके पीले रंग के कुरते पर पहना गया है । गुलाबी रंग के साफे पर चिड़िया के पंख का तुर्रा और गोफण बाँधी गई है । हाथों में बांसुरी लिए इस युवक से जिसकी कमर पर काला डोरा गले में चांदी की हंसुली हाथो में कडा और जूतियाँ पहन रखी है से कुछ युवक कहीं से आ कर मिले हैं और लगभग उसी के समान पहनी वेश भूषा वाले इन युवकों के पास भी विभिन्न वाध्य यंत्र है जिनमे ढोल , मांदल, झांझ , थालियाँ आदि मै देख रहा हूँ । एक दुसरे से हाथ मिलाकर के सभी एक घाटी की और उतर गए हैं अचानक शांत इस वातावरण में लयबद्ध संगीत सुनाई देने लगा है जो गूंजता सा महसूस हो रहा है । पास आते इस संगीत को मै महसूस कर देखता हूँ की वही युवक जो आपस में मिले थे अब संगीत बजाते कहीं जाने को फिर से सड़क की और लौटे हैं । इनके पीछे कुछ युवतियां भी चल पड़ी हैं । इस जगह से कोई ७ किलोमीटर दूर बड़े गाँव की और जहां आज हाट मेला भरने वाला है ये सब पैदल चल पड़े हैं । सुन्दर परिधान और गहने पहने ये युवतियां देखी जा सकती हैं । इनका अनोखा पहरावा फिर दूर कहीं किसी अन्य पहाड़ी के पीछे से आ रहा संगीत वातावरण को मद मस्त बना रहा है । अब इनके पीछे मै भी भगौरिया हाट मेले में जा पहुंचा हूँ । मेला मैदान गाँव के समीप बड़े मैदान में लगा है यहाँ सड़क किनारे से दुकाने शुरू हो गई हैं । बांस तथा हथियारों की दुकाने जिनमे तीर कमान, धारिये बांसुरियां रंगीन किये छोटे डंडे , तार बुने लट्ठ आदि चीजों का सौदा हो रहा है ठेले, झूले, तम्बुनुमा मटकियों की दुकाने। तेल में तली जा रही जलेबियों और नमकीन को देखा और निकल रही गंध को महसूस किया जा सकता है। एक जगह पर गुड और महुए का ढेर लगा है जिन पर मधु मक्खियाँ और ततैये भिनभीना रहे हैं और एक डर का एहसास भी करा रहे हैं। पान की दुकानों पर ख़ास तौर पर भीड़ है। धुल के उड़ते गुबारों के बीच मै इस बाजार में जा घुसा हूँ। संगीत से एक बार फिर आकृष्ट हुआ हूँ । एक नृत्य करते चली आ रही टोली के पास जा कर देख रहा हूँ। ढनटनन टन टनटन की धुन अब परिचित सी लगने लगी है। मांदल, ढोल, थालियाँ बज रही हैं और आदिवासी गीत के संग हुल्लारा लगाया जा रहा है। मस्ताए युवक युवतियां घेरा बना कर नाच रहे हैं दो कदम पीछे चार कदम आगे फिर उलटे घूमकर दो कदमो की झटकेदार चाल के साथ हाथों में तार पिरोए घूँघरूओं की छनछनाहट का यह भावविभोर नृत्य है। पास खड़े युवक इसमे शामिल हो गए तो घेरा बड़ा हो गया है। नृत्य संगीत का जोर बढ़ गया है। सारे वातावरण को देख और इस प्रणय पर्व के बारे में समझ कर और जानकारियाँ लेकर आगे की और निकल चुका हूँ ।

अगले पड़ाव पर गलदेव का मेला भरने की खबर मिली है। यहाँ पहुँच कर देखता हूँ की यहाँ भी चहल पहल बनी हुई है मगर लोग बाग़ बड़े शांत नजर आ रहे हैं। एक बड़े से ओटले के समीप एक लगभग ३० फुट ऊँचे खम्भे पर कमर से कपड़ा बाँध कर जमीन की तरफ मुह किए किसी को लटकाकर तथा दुसरे सीरे पर रस्सी बाँध कर जमीन पर दौड़ते हुए घुमाया जा रहा है। एक डरावना सा दृश्य देख कर मैं हैरान हूँ। पुजारी से जानकारी मिली है की यहाँ जो व्यक्ति घुमाया जारहा है उसने ख़ुद कोई मन्नत ली थी जिसकी पूर्ती हो जाने पर वह यह काम कर रहा है। मन्नत के अनुसार एक तीन या पांच चक्कर घुमाकर उतार लिया जाता है । उतारे गए व्यक्ति से पूछा कि तुम्हारी क्या मन्नत थी तो उसने बताया कि लड़का होने कि मन्नत मैंने ली थी और इसी के लिए आज गल देवता के ओटले पर आकर मन्नत पूरी हो जाने से तीन चक्कर लगवाए है । चक्कर लगवाने के लिए उसके साथ उसका भाई, पिता, बुआ, साला और पत्नी आये है। जिन्होंने नीचे रसा पकड़ कर दौड़ लगाईं थी । मैंने उससे इस हैरत अंगेज मन्नत के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके पिता ने भी यहाँ मन्नत ली थी और वह हुआ था। मैंने उसके पिता से चर्चा कि तो उसने अपना कुरता उतार कर पीठ दिखलाई तो वहां मैंने पुराने सूखे घाव के निशान देखे। उसीने बतलाया कि आज आपने देखा है कि कपडे से मेरा बेटा कमर पर पट्टा बाँध कर झुला है मगर बीते दिनों में हम लोग सीधे चमड़े के भीतर हुक घुसवाते थे और फिर लटक कर झुलाते थे पीढ पर बने ये निशाँ उसी हुक कि वजह से बने हैं। मैं अन्दर तक बेहद हिल सा गया यह बात सुनकर । फिर वाह बताता गया कि कैसे वह घाव सुखा और काम पर जा नहीं सका था । मैंने पूछा "क्या आज भी कोई अपनी मन्नत इस तरीके से सीधे चमड़ी में हुक घुसवाकर लटकाया जाकर मन्नत पूरी करता है?" मुझे ज्यादा देर इन्तजार नहीं करना पडा और एक अधेड़ से आदिवासी ने सीधे पीठ में हुक घुसवा कर पांच चक्कर लगाए थे । बगैर चीखे उसने यह मन्नत तो पूरी कर ली मगर जब उसे उतारा गया तो वह लुहूलुहान था और पसीने से तर बतर भी लगभग बेहोश सी हालत में । एक सादे कपडे से उसके घाव पोंछ कर वहां कुछ पीले हरे रंग का लेप लगाया गया। मैं एक अजीब सी मन्नत परम्परा से वाकिफ हुआ था इस बसंती दौर में.....।

शाम को वापसी में सड़क पर लडखडाते युवक जो बड़ी मात्रा में शराब पिए थे देखने को मिले । और यही इस इलाके के खतरे का संकेत समझा जा सकता है क्योंकि नशे में वे कुछ भी कर सकते हैं ।

मुझे बचपन के दिन याद आये कि ढपली का बड़ा स्वरुप "चंग" कैसे बजता और कैसे मोहल्ले के राजस्थानी लोग सिर्फ थाप कि आवाज मात्र सुनकर निश्चित स्थान पर अपने सारे जरुरी काम छोड़कर आ पहुंचाते। होली के दिन आते ही हुकुमसिंह जी कैसे अपना चंग तैयार करते और कैसे उसकी ढीली पड़ गई रस्सियों को कसकर उसे बजाया करते। घर के कोने में यह चंग बाकी दिनों कैसे दीवार पर टंगा मिलता था आदि। यह चंग बजाने के लिए वे अपने अँगुलियों पर कैसे लकड़ी को बांधा करते ।

उनका प्रिय गीत था "राजा बलि के दरबार मची रे होली राजा बलि के"। पूरा गीत मुझे याद नहीं मगर बीच में वे जो कथा सुनाते थे उसके मतलब में कितना बड़ा महल है और उसमे कितनी रानिया है जो आज होली खेल रही है। कितना रंग टेसू से बनाया गया है पानी कितनी दूर से हाथी और बैल गाड़ियों से लाया गया है। कितना गुलाल उड़ा है कि पूरा राज प्रासाद रंगीन हो गया है। ढोल तुरही आदि संगीत के वाध्य यंत्र कितने लोग बजाने पहुचे है कहाँ कहाँ से संगीतज्ञ बुलवाए गए है। कितना ईनाम बटेगा। क्या क्या पकवान खाए खिलाए जाएंगे आदि का वर्णन था।

हुकुम सिंह जी का रुतबा था कि उनके सभी सहयोगी बगैर किसी बहाने के सारे काम छोड़कर आधा किलोमीटर कि दूरी से भी सिर्फ चंग कि आवाज़ भर सुन दौड़े चले आते थे और यहाँ का रंग भी होली के दिनों का बना देते थे ठेठ राजस्थानी। होली जलाने के लिए जिस दिन डांडा गाडा जाता उसी दिन से होली कि चहल पहल प्रारंभ हो जाती। किसी पेड़ कि टहनी को काटने गए युवकों के पीछे कितने दूर तक चोकीदार दौड़ा और कैसे उसे चकमा देकर भागना पडा। कभी मुह अँधेरे किसी के बाड़े में रखी घांस को कब और कैसे कोई चुरा ले गया आदि किस्से इन दिनों की चर्चा का विषय होते थे। एक दिन तो हद ही हो गई जब घर के बाहर खटिया पर सोए एक व्यक्ति को कुछ लोगों ने उठाकर नीचे ओटले पर रखा और उसकी खटिया कि होली जला डाली थी। सारे मोहल्ले में इस बात से हंसी और घबराहट का वातावरण बन गया था। हालांकि होली में योगदान न करने वाले किसी व्यक्ति के ही साथ इस प्रकार का व्यवहार होता है प्रचारित किया जाता था ताकि लोग अपनी हिस्सेदारी से मुह न मोड़ें।

रंग उड़ाते पिचकारी चलाते बड़ा ही आनद आता था। पिताजी इन दिनों के लिए खासकर चांदी से बनी पिचकारी निकाला करते और केसर का रंग घर आने वाले पर डालते थे। हमें भी यह रंग डालने का कभी कभार अवसर मिलता था। होली खेलकर कपडे सुखाते व्यक्ति को फिर फिर गिला किया जाता। रंग खेलते लोगों के बीच नाश्ते की परोसगारी होती और रंग से सने हाथों से मिठाइयां खाई खिलाई जाती। रंग प्राकृतिक ही इस्तेमाल होते थे तो जहरीला होने का ख़तरा नहीं था। कई लोग तो गुलाल भी घर ही पर बनाते थे जैसे हल्दी में चुना लगाकर लाल रंग का गुलाल। अरारोट के आटे में खाने का रंग मिला करता। कईयों के परिवार गरीब भी थे मगर शक्करपारे और दूसरी मिठाईयां जरूर बनती थी। कुछ तो किसी के यहाँ से तेल, घी, शक्कर आदि मांग कर ले जाने की बातें भी सुनते थे। पर त्यौहार था और मजाल थी की नहीं मने। गाय के पानी पीने के हौद भी इस दिन साफ़ हो जाया करते थे। होली जो खेलनी होती थी। त्यौहार थे मनाए जाने के लिए तो मनाए भी जाते थे और आज क्या हश्र है उनका हम सभी जानते हैं। प्रकृति आज भी है उसका आनद जो होली के दिनों का है वह भी वैसा ही है। टेसू फूलता है। ताड़ी निकलती है, अमराई बौरा कर खट्टी गंध बिखेर मादकता घोलती है। गेहूं पकते हैं चना भर आया करता है। पीली सरसों और लाल राजगीरा आकृष्ट करता है। अफीम के फूलो की रंगत बदल जाती है। सब का सब वैसा ही है जैसा होता आया है पर बदल गया है तो आज का इंसान। अब न वह चंग बजता है, न लकड़ी की लूट ही होती है। न कोई प्रेम से मिलता है। न कोई रंग प्रेम से लगवाता ही है। लेकिन एक बात है जो अक्सर होती ही है की अंग्रेजी केलेण्डर के बावजूद फागुन आता है, होली का त्यौहार भी आता है। आदिवासी अंचल है जो आज भी भगौरिया और गल मन्नत की परम्परा निबाहता है।

* चंग : ढपली की तरह का एक वाध्ययंत्र है जो रस्सी से चमड़े को कसकर बनाया जाता है । दूसरी और देखने में गोलाकार होकरहाथों की अँगुलियों में लकड़ी की खपच्चियाँ बाँधकर बजाया जाता है। इसे फ्रेम ड्रम भी कहा जा सकता है।

*गल : यह लकड़ियों के खभे जोड़कर तैयार किया जाने वाला एक औजार नुमा यंत्र है। इसके एक खभे को जमीन में उर्ध्व गाड़ दिया जाता है जबकि दुसरे खम्भे को उंचाई पर दुसरे छोर से जमीन के समानांतर इसी गाड़े गए खम्भे पर जोड़ा जाता है जो वहां एक बड़े छेद में फंसा रह कर गोलाई में घूम सकता है। समानांतर लगाए इस खम्भे के एक सिरे पर रस्सी और दुसरे सिरे पर आदमी को लटकाए जाने के लिए हूक जुडा होता है। भैरव देव की तरह सिंदूरी रंग से चोला चढ़ाकर देवता बनाए जाते हैं जो की यहाँ पूरे साल होते हैं। मगर गल सिर्फ त्यौहार के दिनों में ही बाँधी जाती है।

यात्रा संस्मरण

1 टिप्पणी:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जी धन्यवाद