रविवार, 6 फ़रवरी 2011

क्या कहना सेवा और स्मरण का .....

पडोसी "दादाजी " के निधन पर उनके मिलने जुलने तथा रिश्तेदारों का जमघट लग गया। अर्थी उठाने से लगाकर तेरहवे तक गम का माहौल मोहल्ले में आवाजाही से महसूस किया जा सकता था । हालांकि घर के सदस्यों ने उठावना परम्परा का निर्वहन कर रोजमर्रा के काम प्रारंभ कर दिए थे। पंडित जी को बुलाकर अब गरुड़ पुराण का आयोजन रखा गया था जो प्रतिदिन शाम ७ बजे से आरम्भ होता और शोक व्यक्त करने आये लोगों को वातावरण देता था। शोक संवेदना व्यक्त करने आने वाले लोग परिवार की धार्मिकता का गुणगान किया करते और दादाजी की संस्कारित परवरिश की भरपूर सराहना करते।
दादाजी पिछले चार दिनों से बीमार थे। पहले दिन उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया था तो वहां चिकित्सकों की बेहूदा बातें और अभद्र व्यवहार की बात से रुष्ट होकर दादाजी को वे घर ही ले आये थे। चिकित्सकों ने उन्हें बाहर के बड़े अस्पताल ले जाने की बात कही थी जो वे छुपाते रहे। मगर अपने अंतिम क्षणों में दादाजी ने कैसे और कितने शांत भाव से पानी पीया और प्राण त्यागे का वृत्तान्त अवश्य सुनाया जाता रहा ।

दादाजी का एक पोता अपनी पत्नी और बेटे के साथ घूमने गया था और उसके वहां से लौटने की संभावना यह थी कि यदि वह कैसे भी निकले तो वापस आने में उठावना हो जाना था यानी निर्धारित कार्यक्रम को स्थगित कर वापस लौटने का कोई लाभ नहीं था। जब वह लौटा तो दादाजी को गए यह पांचवा दिन था। २५००० रूपए प्रति व्यक्ति पॅकेज पर वह गया था। जब उसे खबर मिली तो वह खाने कि टेबल पर था जहां ७५० रूपए प्रति व्यक्ति कि दर से खाना परोसा जाने वाला था। उसे यह खबर इतना विचलित कर गई कि वह निवाला तक न ले सका। पांचवे दिन वह निर्धारित टूर पॅकेज से पहुंचा था और अगले ही दिन उसके बेटे का पहला जन्मदिन था। जनम दिन मनाने कि सूचना सभी को थी और इसलिए होटल में जा कर यह दिवस मनाया जाना था जिसे निरस्त कर घर ही घर में मानना पड़ा। उसकी ससुराल के लोग भी यह जन्मदिन मनाने पहुंचे थे और इस बहाने से दादाजी के निमित्त बैठ लिए। वे अपने जवाई आने के बाद ही तो वहां बैठने जा सकते थे सो उन्होंने रिवाज भी निभाया। वाकई लग रहा था कि दादाजी कि मृत्यु से परिवार बेतरह प्रभावित है।

रस्मोंरिवाजों कि खातिर दादाजी का कार्यक्रम बड़े खर्च से हुआ लगभग आठ से दस लाख रुपये भोजन करने और शोकसंवेदना व्यक्त करने आये लोगों को बर्तन बांटने में खर्च कर दिए गए। हालांकि भोजन के सुस्वादु और दादाजी को सुहाने वाली तमाम मिठाईयों के बनाए जाने बावजूद कोई उत्साह या चटखारा लिया जाना उचित नहीं था सो बेमन से भोजन के बड़े से कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। लगभग तीन हजार लोगों ने यह भोजन ग्रहण किया होना प्रतिष्ठा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। अभी पिछले बरस दादीजी नहीं रही थी तब दादाजी ने अपनी गाँठ से ९ लाख रुपये खर्च किए थे और समाज को कमरा निर्माण के लिए २ लाख अभी महीने भर पहले ही तो दिए थे।

आज दादाजी को गए एक महिना पूरा होने को है और घर के सामने रखी पुरानी गाडी बेचकर नई दो गाड़ियां १५ - १५ लाख खर्च कर खरीदी गई है और इन पर ग्रुप ऑफ़ दादाजी लिखा गया है। यह बातें बताती है कि रईस घर में कितना पैसा है। तीसरे महीने की शुरुआत ही में एक नई कालोनी दादाजी के नाम कटाने के विज्ञापन लगे हैं। शहरसीमा से जुडी इस प्रस्तावित कालोनी की जमीन पर आज एक ऑफिस का उदघाटन है जिसका आशीर्वाद देने धर्मगुरु एक फूलों सजी गाडी से पहुंचे है। उनके आते ही पांडाल में पैर छूने कि होड़ मच गई है और मंच संचालक विनती कर रहा है कि गुरु महाराज कार्यक्रम के उपरान्त भी उपलब्ध रहेंगे सो कार्यक्रम समय पर किया जाने में विलम्ब न होने दें। जिस कालोनी का शुभारम्भ किया जाना है उसके हवन की समाप्ति हो चुकी है और अब कार्यक्रम पूरा हुआ है।

पांडाल में बांटे गए अखबार को जिसमे कालोनी का विज्ञापन है पढ़ रहा हूँ। एक खबर के शीर्षक ने चौंका दिया है। इसमें जंगलों के सर्वनाश और चिड़िया की किसी प्रजाति के लोप होने की बात लिखी है। लिखा गया है इंसानी अभीप्सा का शाप इन बेजुबान प्राणियों को लगा है। बदलते परिवेश ने कैसे पर्यावरण को दूषित कर दिया है आदि।

मै सोच रहा था ........... उस इंसान को जो अपने पूर्वजों के नाम को कमाई के दांव पर लगा रहा था। जिसकी संवेदनाए पैसे में निहित थी, करोडो के मालिक दादाजी के इलाज के लिए बाहर जाना, इलाज कराना और सेवा करने का कष्ट बड़ी मुसीबत था क्योंकि वे उम्रदराज भी तो थे।जीवदया और करुणा का अहिंसक पाठ सिखाकर गए दादाजी के जाने से आज वाकई एहसास हो रहा था की संवेदनशीलता और मानवता का अंत हो चुका ।

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