बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

नीम का पेड़

सुबह उठते ही नीम के गिरे पत्तों से भरा प्रांगन देखकर उसने अपने दादाजी से कहा " कितना कचरा हो रहा है रोज़ के रोज़। आप ये नीम का पेड़ कटवा क्यों नहीं देते। दिन भर ये पत्ते झड़ते रहते हैं। लान खराब कर देते हैं। चाहे कितनी सफाई करो ये पत्ते गिरते ही जाते हैं। अब रोज़ की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये नया बिना मतलब का काम.............वह आगे कुछ और कहता उसके पहले ७२ वर्षीय दादाजी ने उसे देखा, हौले से मुस्कुराकर पास रखी कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया। चाय की केतली से चाय पास रखे कप में भरी और पूछा "तुम पियोगे"।
राजेश ने हामी भरी तो दादाजी ने दुसरे कप में भी चाय उड़ेली फिर शक्कर और दूध मिलाकर हिलाते हुए आगे बढ़ा दी। राजेश ने ट्रे में रखे बिस्किट उठाकर चाय में डुबोए और खाने लगा।
दादाजी ने घर के बाहर बड़ा ही सुन्दर बागीचा लगा रखा है, मकान से तीन गुना बड़ा। गलियारा और आगे के हिस्सा सुंदर रंग बिरंगे फूलों वाले पौधों, गमलों, बेलों से सजा है। रोज़ सवेरे दादाजी चाय पीकर बगीचे में टहलते हुए निरिक्षण करते हैं , साफ़ सफाई करते कराते हैं। पौधों को पानी लगाने में उन्हें बड़ा ही आनंद मिलता है। अभी बसंत ऋतू के दौर में पिछले दस दिनों से पत्ते झड रहे हैं । पतझड़ का आगाज़ हुआ है और बड़ी तेजी से नीम के पत्ते झड़ने लगे हैं । राजेश आज जल्दी उठ गया है । बगीचे में लान को पत्तों से ढंका देख दादाजी से यह बात कह रहा है।
चाय की चुस्की लेकर दादाजी ने अपने नए डेन्चर में बिस्किट फंसा कर चबाया और कहा " राजेश , देखो नीम का यह पेड़ तब से है जब मकान बनाते वक्त तुम्हारी दादी ने इसे लगाया था। सुन्दरता के लिए तो आज भी कई पौधे है मगर गाँव की चौपाल पर लगा नीम का पेड़ जिसके नीचे सारे गाँव के लोग इकट्ठे होते थे। अपने सुख दुःख की बातें किया करते थे। पंचायत के सार्वजनिक फैसले भी उसके नीचे हुआ करते थे। बचपन में झूले बांधकर हम झुला करते। दातुन से लगाकर कई दवाओं में हम उसका इस्तेमाल किया करते। वह पेड़ इस नीम में मुझे नज़र आता है। तुम्हारी दादी के माइके के आँगन में लगा पेड़ इसी पेड़ में उनकी यादों में बसा था। नीम के गुणों को ध्यान में रखकर हमने अपने हाथों इसे सींचा। कालोनी के एक मंत्र हेंडपंप से पानी लाकर हमने इसकी परवरिश की ।
तुम्हारी दादी और मोहल्ले की औरते इसके नीचे बैठ सब्जियां साफ़ करते बतियाती बैठती थी। तुम्हारे पिताजी की शादी के बाद कई रिश्तेदारों ने, हाँ तुम्हारे मामा ने भी गर्मी की छुट्टियों में इसीके नीचे दोपहर बिताई हैं। नीम का शरबत भी बनाकर अपने स्वास्थ्य के लिए पिया है । नीम के पत्तों को जलाकर रात में हम मच्छर भगाते थे इसके पत्तों की खाद में कीटनाशक मिलाने की जरूरत नहीं होती थी। अब आज घर में ट्यूबवेल है मोस्कीटो रिपिलेन्ट बिजली के इस्तेमाल से चलता है। घर वातानुकूलित हो गया है। वाटर प्यूरीफायर आगये हैं तो आधुनिक जीवन शैली में तुम्हे यह अनुपयोगी जान पड़ता है।
अभी पतझड़ की वजह से इसके पत्ते झड रहे हैं जो और दस दिन झडेंगे उसके बाद यह फिर लाल पत्तों से भर जाएगा फिर छांह देने को ये पत्ते हरे भरे ही जायेंगे । फिर फूल खिलेंगे और महक बिखेरेंगे जो गर्मी का अहसास घटाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे। निम्बोली लगेगी और जब पककर गिरने लगेगी तो वर्षा का दौर प्रारम्भ होगा यानी नीम हमें मौसम का अंदाजा लगाने में मदद करेगा। मैं तुम्हारे तर्क से की पत्ते गिर रहे तो इसे काट डाला जाय से सहमत नहीं हूँ। इस पेड़ के साथ मेरी कई यादे जुडी हैं। किसी को घर के बारे में बताते वक्त नीम के पेड़ वाला घर कह देना काफी होता है। तुम्हारी दादी ने कैसे इसे टूट जाने से बचाने के लिए भरी बरसात में भीगते हुए बांस का सपोर्ट लगाया । अब वो हमारे बीच नहीं है मगर वो इस नीम में याद बनी हुई है। गर्मी के दौर में छत पर इसकी छांह ठंडक बनाए रखती है। इसकी मंद गंध भरी शुद्ध वायु शारीरिक स्वस्थता के लिए उपयोगी है। धरती लो ठंडा रखने में जल संचय में इसका अपना महत्त्व है। आज लोग दूषित वायुपान कर बीमार हो रहे हैं तब हमारे आँगन में लगा पेड़ हमें तो स्वास्थ्य के लिए भरपूर ऊर्जा भी दे रहा है न?
कहते हैं जब कोई चीज़ हमारे पास नहीं होती तब उसका मोल समझ में आता है। आज यह पेड़ हमारे आँगन में है तो तुम्हारे लिए बिना मोल का है । मगर जब हमने इसे लगाया था तब दूर दूर तक खुले तपते मैदान हुआ करते थे। इस पेड़ ने हमें राहतों की कई सौगाते दी। जो कुछ इस पेड़ ने हमें अब तक दिया है उसका काफी बड़ा अंश हम वापस लौटा भी नहीं पायेंगे कभी।
चाय पीकर दादाजी बगीचे में जाने लगे तो उन्होंने राजेश का हाथ थामा और साथ चलने की कवायद की । राजेश को उन्होंने पेड़ की कोटर दिखाई जिसमे तोते घोंसला बनाने के लिए आते जाते दिख रहे थे। गिलहरियों की गतिविधि दिखलाई । पेड़ पर बैठे पक्षियों से परिचित कराते हुए जीवदया का पाठ पढ़ाया। गिरे पत्तों पर चलने की खडखडाहट का संगीत समझाया। तुम्हारे दादाजी इस पेड़ के नीचे अपने पचास बरस बिता चुके है। यह पेड़ तो घना हो गया मगर दादाजी रिटायर होकर अनुपयोगी से है। जेब में पैसा है इसलिए कोई एतराज़ नहीं है। वरना मैं ख़ुद भी तो पेड़ से झडे इन पत्तों की तरह का ही तो हूँ.......किसी काम का नहीं , हाथ पैर चल रहे तो बागवानी में समय काट लेता हूँ सुबह इसकी छांह में बगीचे को पानी पिलाना शान्ति देता है।
राजेश की शादी हो गई और उसके बेटे ने स्कुल जाना प्रारंभ कर दिया है। पिताजी आज किसी इंजिनियर के साथ डिस्कस कर रहे हैं । दादाजी को गुजरे आज कोई दो बरस हो गए हैं । इंजिनियर की सलाह है पेड़ हटा देने की । राजेश ने जब सुना तो वह बोला की आप नक्शा बदल डालिए पेड़ नहीं कटेगा । इंजिनियर उसे जगह की कीमत समझाने लगा मगर राजेश अड़ा रहा। वह टस से मस नहीं हो रहा था आखिर नक्शा बदल कर निर्माण किया जाना तय हुआ।
रात को पिताजी ने पूछा तुम तो कभी इस पेड़ हटवाने के लिए कई बार दादाजी से बातें करते थे आज तुम्हे क्या हो गया? यह विरोधी रुख क्यों भला ?
राजेश ने कहा: पिताजी नीम का यह पेड़ पहले मेरे लिए सिर्फ पेड़ था मगर अब यह याद बन गया है दादाजी की जिनकी मेहनत और लगन से यह बड़ा हुआ । उन्होंने मुझे इसका मोल समझाया था । तो पिताजी अनमोल बन चुके इस पेड़ को भला मैं भी कैसे कट जाने देता ?
पेड़ पर बैठी चिड़ियों ने चहकना शुरू किया और नया सवेरा हुआ तो लोगों ने देखा की राजेश नीम को बाहों में भर कर खडा है। नीम को थामकर राजेश को लग रहा था जैसे दादाजी नीम का पेड़ बन गए हैं और उसे आशीर्वाद दे रहे हैं ।

1 टिप्पणी:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।