गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

बर्ड्स वाचिंग / नेचर ट्रेकिंग दिवस

बड़े सवेरे उठकर प्रातः भ्रमण करने को मेडिकल साईंस भी प्रोत्साहित करता है। शुद्ध वायु का शरीर में संग्रहण और तीव्र रक्त संचार के लिए "मोर्निंग वाक" का महत्त्व है । गर्मी के दिनों में प्रायः लोग इस कार्य हेयु समय निकाल लेते हैं और सवेरे दो पांच की.मी का भ्रमण करना प्रारंभ कर दिया करते हैं। बरसात और सर्दियों की प्रकृति बाधा बन जाया करती है फिर भी कई लोग इसे जारी रखते हैं। हाँ अब घरों में मशीने लगाकर लोग पैदल चलने की कसरत कर लिया करते हैं। ऐसे में एक दिन शहर के नजदीकी तालाब के किनारे पूरा का पूरा परिवार लिए बड़ी संख्या में परिवार सहित कई लोग आने लगे तो तालाब पर नियुक्त कर्मचारी आश्चर्य में थे । यहाँ गाहेबगाहे ही कोई जाता है वह भी कोई पर्यावरण प्रेमी हो तभी। अचानक इतने लोग देख वे आश्चर्यचकित थे। उनके लिए इतनी बड़ी संख्या में परिवार सहित पहुँचना असामान्य बात थी, फिर यह तो सवेरा ही था।
छोटे बच्चे, किशोरवय, युवा, बुजुर्ग और दंपत्ति सभी तो थे। बर्ड्स वाचिंग और नेचर ट्रेकिंग को समर्पित इस दिन के लिए मैं विशेष तौर पर आमंत्रित था। बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के संस्थापक के रूप में मेरी उपस्थिति यहाँ चाही गई थी। मैं अपने भांजे सिद्धार्थ के साथ यहाँ पहुचा था। सिद्धार्थ कक्षा ७ वी का विद्यार्थी है और उसका वाईल्ड लाइफ सेन्स बेहद ही सराहनीय है।
प्रोफेशनल हाईड्रोलोजिस्ट श्री सुधीन्द्रमोहन शर्मा जी की यह परिकल्पना थी जो प्रकल्प के स्वरुप में उजागर होने जा रही थी। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए नए क्लब के समस्त सदस्य पूरे जोश से अपनी भागीदारी के लिए उपस्थित थे जिसकी वजह से यह समाँ बन आया था।
बर्ड्स वाचिंग और नेचर ट्रेकिंग दोनों शब्द उत्सुकता और जिज्ञासा का कारण जान पड़े इसी वजह से बड़े सवेरे मुंह-अँधेरे जबकि सूर्योदय में आधा घंटा शेष बचा था, बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
धीरे धीरे भोर का अहसास जागा। जैविक घडी पर जीने वाले परिंदों में हलचल महसूस की जाने लगी। पेड़ों पर पत्तियों की खडखडाहट और इक्का दुक्का चहचहाहट के स्वर प्रस्फुटित होने लगे। प्रारम्भिक हिदायतों के अनुरूप प्राकृतिक रंगों से मेल खाते, धूसर रंग के कपडे पहने, सर पर पी केप लगाए, स्पोर्ट शू पहने लोग अब अपनी अपनी डायरियों में स्वर के जरिये पक्षी को पहचान कर लिखने का प्रयास करने लगे। सुबह की बेला वैसे ही सुहावनी होती है परन्तु यदि स्थान प्राकृतिक समृद्धता से भरे हो तो मन को बड़ा ही आनंददायक और हिलोरे देने वाला महसूस होता है. चिडियों की चहचहाहट और फिर उनकी अठखेलियाँ देखना बुजुर्गों को बीती यादों में तो बच्चों को नए अनुभव के रूप में दर्ज होने लगा। आधुनिकता की भाग दौड़ भरी जिंदगी अलग शांत सुरम्य प्रकृति के प्रांगण के आनंददायी क्षणों का अहसास सुकून भरा स्वस्थ वातावरण प्रस्फुटित होने लगा। आसमान की रंगत बदलने लगी। अब खडखडाहट करने वाले पक्षी दिखलाई पड़ने लगे मगर पर्याप्त उजाले के न होने से उनके चटखदार रंग नज़र नहीं आ पा रहे थे फिर भी उन्हें आकार के आधार पर पहचाने जाने के प्रयास हुए। सभी ने इसमें अपना उत्साह दिखाया। हालांकि खामोशी व्याप्त थी मगर उनका उत्साह महसूस हो रहा था।
आसमान अब गुलाबी फिर केशरिया होने लगा परिंदों का फुदकना और उड़ निकलना चालू हो गया। तालाब के पानी पर केसरिया प्रतिबिम्ब बनने लगा। मेघ केसर फुटकी, शकरखोरा, अंजन, कौए, मैना, तोते, पहचाने जाने लगे। पानी पर पक्षियों के उतरते झुण्ड ने बच्चों को चकित कर डाला। बड़े भी इस दृष्य से प्रभावित तो थे ही। सूरज की चमक और तालाब के बीच सड़कनुमा भ्रमण क्षेत्र यहाँ की सुन्दरता को चार चाँद लगा रहा था तालाब से उभर कर आ रही प्राकृतिक और आर्द्र गंध, पेड़ों पर लदे फूलों के बीच प्रकृति का आनंद लेते हुए जैसे जैसे आगे गए तालाब के किनारे, पेड़ों के ऊपर कई तरह के प्राकृतिक नज़ारे और विभिन्न पक्षी देख मन रोमांचित हो उठा।
वनस्पति और पक्षियों को पहचानने के साथ अब साथ लाए केमेरा इन क्षणों को संजोने के प्रयास में निकालने लगे। कौन कौन से पक्षी देखे गए उन्हें पहचान कर लिखा जाने लगा। आज सुबह किन किन पक्षियों को देखा? कौन से ऐसे पक्षी थे जिन्हें पहली बार देखा है? आदि बातें गौरतलब रही। फ़िज़न्ट टेल्ड जकाना को जूम लेंस से फोटो खींच कर देखा तभी पहचाना जा सका। हुदहुद, कोयल, पनडुब्बी, चिबरा के अलावा खंजन, धोबन, सिकतार, लमगोड़ा, बत्तख, चील, धनेश आदि पक्षी; डायरियों और केमेरा में दर्ज हो गए। बगुले की विभिन्न प्रजातियाँ नाईट हेरोन, पोंड हेरोन, केटेल इग्रेट, ब्लू हेरोन, आदि से जब रु ब रु कराया तो कई लोग इस बात से अचंभित थे। मछरंगे के चटख सुर्ख रंगों से आकृष्ट होने के बाद स्माल और व्हाईट क्रेस्टेड किंग फिशर के भेद जानने को मिले. सिद्धार्थ ने एक ही जगह पर स्थिर उड़ रहे पक्षी की और इशारा किया जो बाद में झाड़ियों के बीच कहीं लपकता सा गोता लगाता नज़र आया उसे बाज की प्रजाति के रूप में बताते हुए बताया कि फाल्कन की हमारे यहाँ कई प्रजातियाँ हैं और अक्सर खेतों के बीच इसी तरह की उड़ान आप सब गाहेबगाहे देख सकते हैं। बाज की विभिन्न प्रजातियों के बारे में सुनकर भी सभी स्तब्ध थे।
आंकड़े के फूल पर पराग पीते चटखदार नीलाभ रंग लिए पक्षी को किसी बच्चे ने हमिंग बर्ड के रूप में पहचाना तो बताना पडा कि यह शकरखोरा कहलाता है जिसे इंडियन सनबर्ड कहते हैं। इसकी मादा इतनी सुर्ख रंग की नहीं होती। हमारे यहाँ सारस, स्टोर्क जैसे पक्षियों के अलावा ग्रीन बी ईटर, केनेरी फ्लाय केचर आदि अनेक पक्षी मौसम बदलने के साथ आते हैं और मौसम बदलते ही चले भी जाते हैं । इन्हें हम "मायग्रेटरी बर्ड्स" कहते हैं।
सुबह तालाब के किनारे टहलते हुए कब चार (4) किलोमीटर चल लिए पता ही नहीं चला। अब बच्चों को भूख लग आई थी और वे साथ लाए बिस्किट और पानी का आनंद लेने लगे। चिड़ियों के चित्ताकर्षक रंग देख वे खुशियों से सराबोर थे। हम वापस लौटने लगे और अब जितनी जानकारी उन्हें मिली थी उनके आधार पर वे चिड़िया पहचानते चल रहे थे। आपस में बतियाते सुबह जहां से सफ़र शुरू किया था वहां पहुंचे तो नाश्ते का आयोजन था। नाश्ता कर चाय पी फिर पौधारोपण किया। यहाँ बने एक कमरे में नेचर कलब के सदस्यों ने फोटो प्रदर्शनी लगाई थी जिनमे इसी तालाब पर आने वाले पक्षियों के फोटो लगाए गए थे। इसे देखते वक्त भी चिड़िया पहचानने का जतन हुआ। फिलहाल यह कार्यक्रम इतना ही रखकर समाप्त किया गया। दोपहर और शाम के बदलते समय के परिदृष्य और आचार व्यवहार बताने के लिए सभा समाप्ति का कार्यक्रम हुआ जिसमे कई बाते उजागर हुई। बच्चो में प्रकृति के प्रति स्वाभाविक रुझान का अनुभव कंप्यूटर युग में देखा जाना ख़ुशी भर गया और मैं लौट आया अपने शहर ......

कोई टिप्पणी नहीं: