सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

आधुनिक शिष्य

गुरु के दरबार में बैठे घमंडी आधुनिक शिष्य से चर्चा चल रही थी। शिष्य अपनी उपलब्धियों और कमाई का घमंड लिए बैठा था। उसने गुरु से कहा की " गुरुदेव आज मैं कई घरों तक रोटियाँ पहुंचे इसलिए रोज़गार उपलब्ध करा रहा हूँ।
गुरु ने शिष्य से पूछा की बताओ तुम्हारी साईट आज कल कहाँ चल रही है। शिष्य ने जवाब दिया "पास ही के गाँव में सड़क बना रहा हूँ।"
गुरु ने उससे कहा " वहां दक्षिण में एक पत्थर मिलेगा, जाओ जाकर उसे तुडवाना। आकर बताना, क्या हुआ? ठीक है.......?
शिष्य ने सोचा क्या बड़ी बात होगी। वह साईट पर पहुंचा तो बताई दिशा में पत्थर मिल गया। उसने मजदूर बुलवाए और पत्थर तुड़वाया।
पत्थर तोड़ने पर उसमे एक गड्ढा मिला जिसमे मछलियाँ तैर रही थी। मछलियों को उसने मुक्त किया और पास के तालाब में छुडवाया।
गुरु के पास आकर बोला " गुरुदेव आज मैं आपके आशीर्वाद से मुक्तिदाता/जीवनदाता बन गया हूँ।
गुरु ने पूछा वह कैसे? तो उसने बताया की पत्थर में मछलियाँ तैर रही थी उन्हें मुक्त किया फिर तालाब में छुडवा दिया है तो मैं जीवनदाता मुक्तिदाता ही तो हुआ ना।
गुरु ने सोचा कहाँ तो मैं इस घमंडी का घमंड दूर करना चाह रहा था और कहाँ ये है कि नया घमंड पाले चला आया।
गुरु तो सोच रहा था कि शिवाजी और उनके गुरु के किस्से वे कई बार सुना चुके हैं शायद यह सम्हल जाए। मगर यहाँ तो बिलकुल ही उलटा था।
गुरु तब से कोई चमत्कार नहीं करते क्योंकि आधुनिक शिष्य अपने ज्ञान और घमंड से बाज जो नहीं आते...........

2 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर, धन्यवाद

Atul Shrivastava ने कहा…

अच्‍छी रचना।
मौजूदा हालात को दर्शाती रचना के लिए बधाई।