सोमवार, 14 मार्च 2011

इंसान विपदा और प्रकृतिधर्म

रोने लगे कुत्ते, घबडा गए थे पशु
परिंदों ने भी भरी ऊँची उड़ान थी ।

वो चीखा, वो चिल्लाया
वो देखो भागा-दौड़ा ।

उस सवेरे थरथराई थी धरती
कहते है आया था भूकंप ही
कुछ सोचते करते , मकान /दीवारें आ गिरी
कांपे थे लोग सभी ,
फर्नीचर , भांडे बर्तन भी।

छोटे बड़े और गगनचुम्बी निर्माण, पलभर में
हुए थे तब्दील मलबे में ।

ह्रदय विदारक दृष्य था
गूंज उठा था नाद , क्रन्द्रन का
मदद में आए कम्बल, कपडे, दवाई , तम्बू और भोजन ,
पहुंचने लगे चिकित्सक, फ़ौज और स्वयंसेवी संगठन ।

प्रकृति ने है जताया
मनुष्य उससे जीत नहीं सकता ।

पर्यावरण से छेड़खानी के
भुगतने पड़े हैं दुष्परिणाम
कहीं अवर्षा सूखा है
कही बाढ़ तो भूस्खलन है
शहरों में भर गया है पानी
समंदर तट को धकेल गया सुनामी
अमरीकी रीना, केटरीना स्टैन जैसे चक्रवात भी तूफानी
ज्वालामुखी और परमाणु संयत्र का ख़तरा भी भारी

दूषित हुआ है पेयजल
तो हुआ है वन विनाश भी
मारे गए हैं वन्य-पशु परिंदे
हुआ है, पारिस्थितिकी का नाश भी ।

मत बन अब हैवान
उठ जाग ऐ इंसान
अतिभौतिकतावाद एवं व्यावसायिकीकरण को
देकर तिलांजलि , जीवित कर मानवीयता को ।

प्राकृतिक विपदा से है तुझे सबक सीखना
धर्म प्रकृति का अब तो लो अपना
इस प्रार्थना को ईश्वर भी अवश्य सुनेगा
प्राकृतिक विपदाओं का कहर भी, तब कम ही बरसा करेगा ।

राजेश घोटीकर
६/१६ एल आई जी "बी"
जवाहर नगर
रतलाम (म.प्र।)
मो : ०९८२७३ ४०८३५

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