सोमवार, 25 अप्रैल 2011

अक्स



bluetit



पानी पीने चली

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

it could be good news for palpur kuno

Indian

african
indoafrican???????
African lions probably 2 distinct species
18/04/2011 20:08:39
April 2011: There is a remarkable difference between the lions of west and central Africa compared to those in the east and south of the continent, according to new research.
The study suggests that lions from west and central Africa are genetically different from lions in east and southern Africa. The researchers analysed a region on the mitochondrial DNA of lions from across Africa and India, including sequences from extinct lions such as the Atlas lions in Morocco.
Surprisingly, lions from West and Central Africa seemed to be more related to lions from the Asiatic subspecies than to their counterparts in East and Southern Africa. Previous research has already suggested that lions in West and Central Africa are smaller in size and weight, have smaller manes, live in smaller groups, eat smaller prey and may also differ in the shape of their skull, compared to their counterparts in east and southern Africa. However, this research was not backed by conclusive scientific evidence. The present research findings show that the difference is also reflected in the genetic makeup of the lions.
The distinction between lions from the two areas of Africa can partially be explained by the location of natural structures that may form barriers for lion dispersal. These structures include the Central African rainforest and the Rift Valley, which stretches from Ethiopia to Tanzania and from the Democratic Republic of Congo to Mozambique.
Another aspect explaining the unique genetic position of the West and Central African lion is the climatological history of this part of the continent.
It is hypothesised that a local extinction occurred, following periods of severe drought 18,000-40,000 years ago. During this period, lions continuously ranged deep into Asia and it is likely that conditions in the Middle East were still sufficiently favourable to sustain lion populations. The data suggests that West and Central Africa was recolonised by lions from areas close to India, which explains the close genetic relationship between lions from these two areas.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

करनी पर नियंत्रण ही अहिंसा

अहिंसा का देश भारत अपने बिगड़ते पर्यावरण के चलते किस दिशा में जा रहा है यह बात विचारणीयहैसरकारद्वारा पर्यावरण की सुदृढ़ता की दिशा में क्या कदम उठाए गए हैं अथवा क्या कदम उठाए जाने चाहिए आम लोगों तक ये बाते पहुँचाना जरुरी है। जंगल में बाघ की संख्या से पर्यावरण के पहलू उजागर करते समय हम यह भूल जाते हैं की जिस देश में आजादी के समय जो वनक्षेत्र थे आज उनका क्षेत्रफल क्या बचा है ? गुजरात के सिंहो (एशियाटिक लायन) की संख्या के लिहाज से वहां का वनक्षेत्र छोटा पड़ने लगा है जबकि मध्य प्रदेश का पन्ना टाईगर रिज़र्व बाघ विहीन हो चला था।


वन्य प्राणियों के रिज़र्व क्षेत्र टापुओं की भाँती छोटे छोटे टुकड़ों में विभाजित हैं जिन्हें अभयारण्य व् नॅशनल पार्क की संज्ञा दी जाती रही है। पालतू पशुओं के प्रति रुझान कम हो चला है तो गोचर भूमि भी गायब होने लगी है। तालाबों तथा स्टॉप डेम का पानी कृषि भूमि के लिया जाना अलग बात है मगर तालाब खाली कर खेती के उपयोग में लिए जाने के कार्य भी हुए हैं। विद्युत् की जीतनी अधिक आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचाने का काम हुआ है पानी का भूमिगत जलस्तर डांवाडोल हो गया है , यहाँ तक की पानी इस बेतरह खींचा जा रहा है की विद्युत् संयत्र जलस्तर के घट जाने से बरसात के कुछ ही माह बाद उत्पादन बंद कर देते है। अनियंत्रित शासकीय कार्यप्रणाली के चलते पर्यावरण समूचा नष्ट हो रहा है।


मध्यप्रदेश का पौधारोपण राजस्थान के पालतू पशुओं यानी भेड़ों तथा ऊँटों की चारागाह का सर्व श्रेष्ठ स्थान बन गया है। केंद्र शासन के निर्देशों के तहत स्थानान्तरण के लिए मार्ग दिया जाना अनिवार्य है । इस नियम का फ़ायदा राजस्थान के पशुपालक भली प्रकार उठा रहे हैं। वन विभाग की सुने तो उनके अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रो के जंगलों में चरवाहे रात में अपने जानवर लेकर घुस जाते हैं और रोके जाने पर अंधाधुंध आग्नेय अस्त्र चलाते हैं। हथियार चलाकर वे पुनः राजस्थान की सीमा में दाखिल हो जाते हैं जिससे उन्हें पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। दूसरी और कोई संयुक्त अभियान सुनाई नहीं देता जिसमे राजस्थान की मदद ली गई हो या पुलिस के साथ कोई शामिल अभियान ही छिड़ा हो। फिर जो भेड़ें परमिट लेकर किसी नियत रस्ते से गुजारने के लिए प्रविष्ट होती हैं उन्हें जहां तहां भटकाते देखा जा सकता है उनका कोई निर्दिष्ट मार्ग ही नज़र नहीं आता। रात में खेतों में "रेवड़" बिठाने के लिए किसानों द्वारा पैसा दिया जाता है जो निर्धारित मार्ग से भेड़ों को ले जाने से भटकाने का एक बड़े कारण के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार अनियंत्रित भटकाते हुए निकलने वाली रेवडों के प्रति कोई जवाबदेहि नज़र ही नहीं आती है। अनियंत्रित इस बर्ताव के पीछे भ्रष्टाचार की बू इसलिए आती है क्योंकि ये रेवड़ें यानी एक बड़ा पशु समूह कभी किसी खेत या निजी वृक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाता और जो नुकसान होता है वह सिर्फ और सिर्फ शासकीय वृक्षों और वृक्षारोपण को ही हानि पहुंचाता है । सीमावर्ती प्रान्तों के मध्य इस प्रकार की विसंगतियां लगातार चली आ रही जिन पर सोचना पड़ेगा ।


पेड़ों के बारे में उत्तरदायित्व की स्थित यह है की पेड़ जिस जमीन पर लगा होगा जिम्मेदारी उसी विभाग की होती है। जिम्मेदार विभाग वन विभाग की और कार्यवाही को लिख भेजता है और वन विभाग उनकी भूमि न होने की दशा में पंगु बताता है। आज राजस्व विभाग की सारी जमीने वृक्ष विहीन और सुखी पड़ी है कार्यवाही की कोई गुंजाइश कभी सुनने को नहीं मिलती। सिर्फ कुछ थोड़ी बहुत प्रजातियाँ है जिनकी सूचना पर कार्यवाही तो होती मगर लीपापोती की।


वन अपराध की स्थिति यह है की वन्य पशुओं के लिए बनाए गए अधिनियमों के तहत दी गए निर्देश कर्मचारियों को समझ में ही नहीं आते या दूसरी ओर कहें की वे समझना ही नहीं चाहते । किसी प्रेशर में होने पर वे किताबे टटोलते है और नए बहाने इजाद करते दीखते हैं।


पर्यावरण आखिर है क्या ? इसके बारे में विस्तार से समझने की जरुरत पड़ने लगी है। पद्मश्री मुज़फ्फर हुसैन अपनी पुस्तक "इस्लाम और शाकाहार" में लिखते हैं । "मनुष्य इस धरती पर अकेला जीवित नहीं रह सकता । उसे जीवन के लिए पृथ्वी पर कुदरत ने अनेक वस्तुए बनाई है जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में पर्यावरण की संज्ञा दी जा सकती है । कुदरत ने जो कुछ भी बनाया है वह सब मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है। "


आज हम अपने आस पास के वातावरण को परिवेश की भाँती लेकर उसके बिगड़ते जाने के प्रति चिंतित है मगर एनवायरोंमेंट का yah सही मायना नहीं है वह तो नदी जंगल पहाड़ों से है।


धरती पर उथल पुथल जारी है इसके चलते कितने जंगल बचेंगे और ऐसी कितनी जमीने बचेंगी जो खेती के योग्य हो क्योंकि मनुष्य की आबादी के रहने के लिए बनती जा रही नित नई कालोनियां खेती की श्रेष्ठ जमीनों तक को निगल चुकी हैं। जमीन के अभाव में पशुओं के लिए चारागाह कहाँ से आयेंगे ? वन भूमि चराई के काम में आने लगी है औरजो केटल प्रेशर के रूप में विदित होती आई हैं .... तब जंगल कहाँ बच रहेंगे ? सूखे बंजर पहाड़ खड़े रह जाने पर क्या नदियों का उद्गम अप्रभावित रह सकेगा ? खेती और जंगल जब घटेंगे तब आहार के लिए क्या हम शाकाहारी रह पायेंगे ?


समुद्र की गहराई तक को हमने अपना शिकारगाह बना रखा है बड़ी संख्या में मत्स्याखेट विश्व स्तर पर हो रहा है । पानी में ओक्सीज़न की कमी से मछलियों के मरने की खबरों में अब समंदर भी शामिल होने लगा है। बड़ी संख्या में शिकार से जलजीवों की संख्या बुरी तरह प्रभावित है ऐसे में नदियों का सूख जाना या बरसाती नाला बनकर रह जाना धरती पर पेयजल की उपलब्ध मात्रा को किस कदर घटा देगा ? विचार करना पडेगा।


धरती के प्रति चिंता रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वसुंधरा सम्मलेन का आयोजन किया और २०१५ तक मिलेनियम गोल के तहत संरक्षण उपाय किए जाकर पृथ्वी के पर्यावरण को बचाए जाने की बाते हुई। विश्व यानी धरती के बदलते पर्यावरण के प्रति हमारी प्रतिबद्धताए क्या होनी चाहिए इस विषय पर सभी देशों ने अपने प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए । हमने यानी भारत ने भी इसमे बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया । खेती की जरूरतों के लिए जल दोहन (अधिक उचित शब्द तो शोषण है) के प्रति विचार नहीं है। खेती के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभाव उसके बदलते जा रहे तौर तरीके अनदेखे हुए हैं। पशुपालन की वनक्षेत्र में घुसपैठ पर कोई कड़े नियम नहीं हैं अब वन्य पशु अपनी सरहदों के बाहर निकलने पर मजबूर हो चले हैं। तब फिर वे क्या उपाय है जो धरती को समृद्ध बनाने में कारगर रहेंगे? क्या महज वन्य पशुं की संख्या में बढ़ोतरी हो जाना पर्यावरण की समस्त भूमिका को प्रतिध्वनित कर पाने योग्य मन लिया जाए?


अब लोगों में यह जाग्रति तो है की चिड़िया को दाना पानी हर रोज़ रखा जाए मगर अभी इंतज़ार है की वे उन्हें एक स्वस्थ पर्यावास देकर एक बार पुनः "कोटर" दे पायेंगे? जहां से नए पंछी गीत गाते आसमान की उड़ान भरेंगे । इन सबके लिए बहुत कुछ है जिसका बलिदान करना होगा और मै सोचता हूँ किहर इंसान द्वारा किया गया यह बलिदान ही असल में अहिंसा होगा जिसमे इंसान को अपने साथ अन्य प्राणियों का पर्याप्त ध्यान रखकर अपनी करनी पर नियंत्रण करना पडेगा .......



राजेश घोटीकर


६/१६ एल आई जी "बी"


जवाहर नगर


रतलाम (म.प्र)


९८२७३४०८३५


* लेखक बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के संथापक होकर वन विभाग में मानसेवी जिला वन्यप्राणी अभिरक्षक के रूप में कार्यरत रह चुके है। http://birdswatchinggroupratlam.blogspot/ log on karen


सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मंदिर प्रांगण में वाटर कूलर लगवाया

भगवान् श्री राम के वनवासकाल से अयोध्या लौट आने की ख़ुशी में गुडी पडवा का पर्व चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन मनाया जाता है। माँ शक्ति की आराधना का नौ दिवसीय पर्व भी नव संवत्सर के स्वरुप में प्रारंभ होता है। सृष्टि की रचना के आरम्भ का दिन भी इसे कहते आये हैं।


सृष्टि प्रारंभ होने के विशेष दिवस पर बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के प्रयासों एवं प्रेरणा से सैलाना के श्री ऐ के जैन द्वारा अपनी माताजी के जन्म तिथि के उपलक्ष में सम्पूर्ण व्यवस्था के साथ एक वाटर कूलर माही नदी के समीप राजापुरा ग्राम स्थित गढ़खंखाई माताजी के मंदिर प्रागण में लगवाया गया। वाटर कूलर स्थापित करने गए दल में सर्वश्री ऐ के जैन, वीरम मीणा, पवन, तुषार कोठारी, दशरथ पाटीदार आदि ग्रुप सदस्य एवं पदाधिकारी मौजूद थे। उक्त जानकारी प्रदान करते हुए बर्ड्स वाचिंग ग्रुप संस्थापक श्री राजेश घोटीकर ने बताया कि वाटर कूलर लग जाने से अब शीतल जल कि सुविधा यहाँ धर्म क्षेत्र में प्राप्त हो गई है परन्तु धर्मालुजनो की सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए यहाँ एक प्याऊ की आवश्यकता महसूस की जा रही है जिसे शीघ्र निर्माण कराए जाने के प्रयास किए जाएंगे।

अब यह समाचार लिखते लिखते एक यू वी फिल्टर लगवाने के लिए छोटुभाई ने अपना योगदान दिया है जो अब कल जाकर लगवाया जा सकेगा ।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

वन्यजीवन को समर्पित एक दिन

चच चचचच च्व्हीट खड़क, फुर्र ,फुट ,चीट ,चीट ,चीट ,चेंप की ध्वनि रोज़ की तरह आज सुबह फिर सुनाई दे रही है। घरों के आस पास का वातावरण कलरवों से गूंज रहा है। गुलमोहर, पलाश, आंकड़ा, अशोक के अतिरिक्त बागीचे में लगे शोभादार फूलदार पौधों-झाड़ियों-बेलों में से चटकीले रंग के फूल अब बसंत का आभास दिला रहे हैं।


शांत नीरव वातावरण के बीच दूर से मोटरसायकल, कार,बस के होर्न के स्वर भी यदा कदा सुनाई दे रहे हैं। बच्चों का विद्यालय मुख्य मार्ग से दूर एक खेल मैदान के पीछे बना हुआ है। खेल का यह बड़ा मैदान स्कूल का ही है। एक कार्यक्रम तय करने के लिए आज मै यहाँ पहुंचा हूँ। स्कूल के परिसर में सुन्दर हरियाली है, रंगबिरंगे फूल गमलों और बगीचे में लगे पौधों पर खिले हैं। घांस के बड़े मैदान के समीप ऊँचे खड़े पेड़ों की कतार भी नज़र आ रही है। छोटे बच्चों के लिए लगाए गए खेल साधनों के पास झाड़ीनुमा सुन्दरता से कटेछटे मेहराबदार पौधे दिख रहे हैं। मौसम का बदलाव है मगर सवेरे स्वेटर की जरुरत पड़ रही है।


पार्किंग से पैदल चलते हुए यह दृष्य देख रहा हूँ। भवन से करीब ५० मीटर दूर हूँ और मोर मोरनियो के एक झुण्ड ने बगीचे में अपनी उपस्थिति से मुझे प्रभावित कर दिया है। सुन्दर प्राकृतिक वातावरण लिए इस स्कूल के समीप एक तालाब भी है। जिसमे कमल, कुमुदनी लगे होने का आभास हो रहा जो नज़दीक जाकर देखने से ठीक ठीक पता चलेगा।


स्कूल के प्रवेश द्वार पर खड़े सुरक्षा गार्ड ने सेल्यूट देकर साथ में चलते हुए ऑफिस के बारे में बताया है। मै एक बड़े खुले फर्शदार प्रांगन में पहुंचा हूँ यहाँ चारों तरफ की दीवारों पर नोटिस बोर्ड लगे दिख रहे हैं जिन पर सूचनाओं के कागज़ पिन अप किए लगाए गए हैं। बीच में एक बड़ा सा फिशपोट है जिसमे रंगीन मछलियाँ तैर रही हैं।


आईये ! वेलकम सर ! की आवाज़ से आकृष्ट हुआ हूँ। स्कूल के संचालक, प्राचार्या और कुछ शिक्षक एक कमरे के बाहर खड़े हैं। स्कूल का यह अतिथि कक्ष है। मै अभी स्कूल की सजावट और आर्किटेक्चर देखना चाता हूँ परन्तु स्कूल संचालक ने आगे आते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाकर हेंडशेक करना शुरू किया तो मुझे भी अभिवादन की मुद्रा (पोश्चर) में आना पडा है। स्वागत कक्ष करीने से सजा हुआ है सोफा सेंटर टेबल कारपेट और पर्दों के अतिरिक्त टेलिविज़न कंप्यूटर जैसी आधुनिल सुविधाओं के साथ खिड़की में से छनकर आता हुआ प्रकाश भी देख पा रहा हूँ जो कांच से बनी दीवार पर लटकाए परदे की ओट से झाँक सा रहा है। इसी दीवार से पार लगे पाम तथा अन्य सजावट के पौधों को भी मैं देख पा रहा हूँ।


बैठिये कहकर संचालक महोदय ने हाथ से इशारा किया और सोफे पर बैठने का निवेदन किया फिर अपने दोनों हाथों से कोट को थामते हुए पास के सोफे पर बैठ गए। स्कूल की प्राचार्या ने एक गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया। यह गुलदस्ता एक गमले में लगा जीता जागता पौधा है। मैंने धन्यवाद देने का उपक्रम किया ...और फिर बाते प्रारंभ की। इसी बीच बिस्किट और टी पोट हमारे सामने रख दिए गए । स्कूल की एक शिक्षिका ने प्याले में उबाली काली चाय उदेलनी प्रारंभ की फिर उसमे मिल्क पोट से गरम दूध मिलाया फिर मुझसे कितनी चीनी लेंगे लाह जवाब चाहा। मैंने उन्हें वैसे ही दे देने को कहा। दुसरे रखे प्याले में संचालक महोदय ने बगैर दूध मिलाए ब्लेक टी ली और शुगर क्यूब मिलाए ।


आप किस तरह के संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहेंगे अपने प्रेजेंटेशन के लिए ? कंप्यूटर और प्रोजेक्टर की आवश्यकता जताते हुए मैंने अपने कार्यक्रम की रूप रेखा के बारे में बताया। मैंने उनसे सभागृह दिखलाने की बात की और हम सीढीयों से ऊपर की और बने सभ्ग्रुह की और चल पड़े। नीचे जिस खुले प्रांगन में मैं प्रविष्ट हुआ था ठीक उसी के ऊपर यहाँ हाल बनाया जाकर ऑडिटोरियम की भाँती निर्माण हुआ नज़र आया । छत पर प्रोजेक्टर नज़र आया और दीवारें प्लास्टर से ऐसी बना दी गई हैं ताकि आवाज़ न गूंजे। स्टेज के समीप बने दो कमरे अभी कार्यालय के रूप में काम में लिए जा रहे हैं जबकि ये सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सुविधा के लिए बने हैं। सुन्दर सुसज्जित मंच पर तमाम आधुनिक सुविधाए हैं । रोशनी के लिए तथा वेंटिलेशन का भरपूर ध्यान रखा गया है। स्कूल के वनस्पति शास्त्र और जीव विज्ञान के शिक्षकों से मुलाक़ात कर स्कूल के स्तर का आभास किया है। कार्यक्रम के दिन का निर्धारण कर मै वापस अपने काम पर लौट आया।


निर्धारित दिन को अपने सहयोगी सथियों के साथ स्कूल पहुचा सारी चाही गई व्यवस्थाए वहां उपलब्ध करा दी गई थी । हाल में उपस्थित छात्र समुदाय ने स्वागत में करतल ध्वनि से माहौल गरमा दिया । मैं अपना कार्यक्रम शुरू करता इसके पहले बच्चों ने पर्यावरण से जुड़े समस्त पहलुओं पर बनाए गए नाटक का मंचन कर दिया । नदी, पर्वत, पेड़ , फूल, चिड़िया, तितली, पतंगे, भालू ,बन्दर, शेर, डोल्फिन, पेंग्विन , सियार, लोमड़ी, हिरन, चमगादड़, उल्लू , कुता बिल्ली के अलावा घोड़ा, गाय, भैंस, बकरी, भेड़ें भी इस मंचन में प्रदर्शित थी। समूचा वातावरण उन्होंने प्रकृतिमय बना डाला था। स्कूल संचालक ने हमारी उपस्थिति पर प्रकाश डाल कर मंच पर आमंत्रित किया फिर स्वागत उपरान्त मंच हमारे हवाले कर दिया। लाईट का फोकस अब हम पर था । दी गई प्रस्तुति की सराहना कर हमने कार्यक्रम की शुरुआत सामान्य जानकारी से की।


टेलिविज़न पर आने वाले कार्यक्रमों की जानकारी ली । फ़िल्मी कलाकारों की जानकारी में बच्चे बड़े जोर शोर से हिस्सा लेने लगे । फिर ऑडियो रिकार्डिंग सुनाकर सवाल पूछे तो आवाज़ मात्र सुनकर गाड़ियों की ध्वनि और फ़िल्मी सितारों की आवाजें पहचानी जाने लगी। इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपई की आवाज़ को बच्चों ने सहजता से पहचाना । इन सबका उपयोग सिर्फ इसलिए था ताकि बच्चे सहज हो कर मुखर हो सकें।


अब हमने पशु पक्षियों की आडियो सुनाई तो कुत्ते भैंस बकरी से आगे बढ़ाते हुए वन्य जीवों की ध्वनि सुनाई अब प्रतिभागी सिमटने लगे थे । बिग केट्स के बाद चिड़ियाँ तक आते हुए हमने पाया की उत्तर बड़ी मुश्किल से आ पाए । कौवे मोर तोते कोयल गौरैया की बोलीं अस्सानी से पहचानी गई मगर पर्पल सनबर्ड, रूफ़स ट्रीपाई, जंगल वेब्लर, कोपरस्मिथ बारबेट, धनेश, तीतर की आवाज़े उनके लिए नई थी।


अब अगले दौर में स्लाईड शो में वन्य पशु पक्षी पहचाने जाने थे । वन्य पशु पहचानने में दिक्कते कम थी मगर स्वदेशी विदेशी का भेद वे नहीं कर पाए । पक्षियों के रंगों से प्रभावित थे मगर नाम बताना कठिन दिखलाई दिया। जलचरों को दिक्कतों के बाद पहचान लिया।


स्लाइड्स के बाद पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिये सिमटते जा रहे वन क्षेत्रों और मनुष्य की बढाती भयावह आबादी के दृष्य और प्राकृतिक दृश्यों का मिला जुला संगीतमय कम्पोजीशन देख कर बच्चे और बड़े खुश हो गए।


पर्यावरण रक्षा को समर्पित संगीत दिखलाया तो धुन उनके दिमाग में रच बस गई थी। तो दिखलाए गए दृश्यों से वे स्तब्ध थे। तीन मिनट के इस गीत को पुनः दिखलाए जाने का आग्रह हुआ ।


टेलिविज़न और कंप्यूटर वेब साईट की जानकारी बच्चो को भरपूर थी ।


मेरे सहयोगियों ने साहित्य ,पेन ,बर्ड्स वाचिंग की पी केप्स और एक प्रश्न पत्र वितरित किया । प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों के जवाब देने के लिए दस मिनिट का समय दिया गया था । १० प्रश्नों के जवाब सिर्फ सही जवाब पर टिक लगा कर देना था जबकि ५ सवालों के जवाब उन्हें लिख कर देने थे। प्रश्न पत्र जाँच कर आते तब तक मनोविनोद का कार्यक्रम और पिछली कक्षाओं में पठ्यक्रम के तहत पढाए गए सवाल स्कूल शिक्षकों द्वारा पूछे गए।


जीतने वाले तीन विद्यार्थियों को शानदार गिफ्ट हेम्पर और वन्य जीव अभयारण्य जाने के लिए खर्च सम्बन्धी टोकन प्रदान किए गए । स्कूल ने भी पारितोषिक प्रदान किए।


अपने कुछ संस्मरण उन्हें सुनाए फिर उनसे पूछा की बड़े होकर वे क्या बनाना चाहेंगे ? मुझे हैरत हुई यह जानकर की कई बच्चे जिनमे लडकियां भी शामिल थी , वन विभाग में नौकरी किए जाने की चाहत लिए थे। आयोजन तो मात्र ९० मिनिट में ख़तम हो गया मगर इस आयोजन के बाद बच्चों के घर से मुझे फोन आये की "प्रकृति दर्शन और देशाटन के पीछे जीवदया एक सेवाकारी आवश्यकता और आजीविका हो सकती है और महज छोटी छोटी जानकारियाँ के माध्यम से आपने आजीविका के ऐसे संसाधन की ओर ध्यान दिलाया जो धरती की सेवा कर लम्बे समय तक जैव विविधता के जरिए हमारी पृथ्वी को जीवित रखने में महत्त्वपूर्ण है " तो मुझे लगा की आज मेरा प्रयास सार्थक हो गया है।

स्थापना दिवस पर संकल्प दोहराए

चिड़िया की चहचहाहट एक बार फिर गुंजायमान हो इसके नेपथ्य में बर्ड्स वाचिंग ग्रुप कार्यशील है । पर्यावरण रक्षा में पक्षियों के महत्त्व के बारे में अनेको वैज्ञानिक तथ्य मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि वे कितने मददगार हैं । कीट नियंत्रण में चिडियों की उपयोगिता सर्वविदित है। हमारे लोकगीतों की चिरैया और घर के नन्हे का पहला खिलौना रही चिड़िया आज संकट के दौर में है तो हमारे निष्ठुर स्वार्थपरक रवैये की वजह से। हमें धरती पर श्रेष्ठता के लिए सहभागी रूप में जीना चाहिए न कि उनके प्रति क्रूर बनकर। उपरोक्त विचार एक अप्रैल को बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित बैठक में वक्ताओं ने अभिव्यक्त किए । ग्रुप संस्थापक श्री राजेश घोटीकर ने कहा कि बदलता तापमान हम इंसानों के लिए चुनौती बन कर खडा होने लगा है तब प्राणियों कि जीवन रक्षा कि जिम्मेदारी का बोध भी हमें होना चाहिए । प्यास से बेहाल पशु परिंदों कि व्यवस्था में हर जीव दया प्रेमी के मन में भाव जागने जरुरी हैं । सतह पर शुद्ध पेयजल बना रहे इसके सतत प्रयासों कि महती आवश्यकता है। पर्यावरण के प्रति अपनी भूमिका का निर्वहन प्रत्येक व्यक्ति को समर्पित भाव से करने कि जरुरत है। शोषक और शासक मनोवृत्ति से उबरकर देने की प्रवृत्ति धारण करे । मानव जीवन बदहाल न हो इसके लिए जीव दया के प्रति संकल्पित हों। साहित्यकार श्री सत्यनारायण जी भटनागर के निवास पर आयोजित बैठक में पर्यावरण जाग्रति मंच के ईश्वर पाटीदार , राधेश्याम सोनी , सुरेश पुरोहित, मुकेश पंवार, नवीन व्यास , शेखर गुप्ता , एम् एल पडियार आदि ने अपने विचार व्यक्त कर पौधों और जीवों की रक्षा हेतु आगामी ग्रीष्म में प्रतिदिन पेयजल और अन्न प्रबंध का संकल्प दोहराया गया ।