शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

वन्यजीवन को समर्पित एक दिन

चच चचचच च्व्हीट खड़क, फुर्र ,फुट ,चीट ,चीट ,चीट ,चेंप की ध्वनि रोज़ की तरह आज सुबह फिर सुनाई दे रही है। घरों के आस पास का वातावरण कलरवों से गूंज रहा है। गुलमोहर, पलाश, आंकड़ा, अशोक के अतिरिक्त बागीचे में लगे शोभादार फूलदार पौधों-झाड़ियों-बेलों में से चटकीले रंग के फूल अब बसंत का आभास दिला रहे हैं।


शांत नीरव वातावरण के बीच दूर से मोटरसायकल, कार,बस के होर्न के स्वर भी यदा कदा सुनाई दे रहे हैं। बच्चों का विद्यालय मुख्य मार्ग से दूर एक खेल मैदान के पीछे बना हुआ है। खेल का यह बड़ा मैदान स्कूल का ही है। एक कार्यक्रम तय करने के लिए आज मै यहाँ पहुंचा हूँ। स्कूल के परिसर में सुन्दर हरियाली है, रंगबिरंगे फूल गमलों और बगीचे में लगे पौधों पर खिले हैं। घांस के बड़े मैदान के समीप ऊँचे खड़े पेड़ों की कतार भी नज़र आ रही है। छोटे बच्चों के लिए लगाए गए खेल साधनों के पास झाड़ीनुमा सुन्दरता से कटेछटे मेहराबदार पौधे दिख रहे हैं। मौसम का बदलाव है मगर सवेरे स्वेटर की जरुरत पड़ रही है।


पार्किंग से पैदल चलते हुए यह दृष्य देख रहा हूँ। भवन से करीब ५० मीटर दूर हूँ और मोर मोरनियो के एक झुण्ड ने बगीचे में अपनी उपस्थिति से मुझे प्रभावित कर दिया है। सुन्दर प्राकृतिक वातावरण लिए इस स्कूल के समीप एक तालाब भी है। जिसमे कमल, कुमुदनी लगे होने का आभास हो रहा जो नज़दीक जाकर देखने से ठीक ठीक पता चलेगा।


स्कूल के प्रवेश द्वार पर खड़े सुरक्षा गार्ड ने सेल्यूट देकर साथ में चलते हुए ऑफिस के बारे में बताया है। मै एक बड़े खुले फर्शदार प्रांगन में पहुंचा हूँ यहाँ चारों तरफ की दीवारों पर नोटिस बोर्ड लगे दिख रहे हैं जिन पर सूचनाओं के कागज़ पिन अप किए लगाए गए हैं। बीच में एक बड़ा सा फिशपोट है जिसमे रंगीन मछलियाँ तैर रही हैं।


आईये ! वेलकम सर ! की आवाज़ से आकृष्ट हुआ हूँ। स्कूल के संचालक, प्राचार्या और कुछ शिक्षक एक कमरे के बाहर खड़े हैं। स्कूल का यह अतिथि कक्ष है। मै अभी स्कूल की सजावट और आर्किटेक्चर देखना चाता हूँ परन्तु स्कूल संचालक ने आगे आते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाकर हेंडशेक करना शुरू किया तो मुझे भी अभिवादन की मुद्रा (पोश्चर) में आना पडा है। स्वागत कक्ष करीने से सजा हुआ है सोफा सेंटर टेबल कारपेट और पर्दों के अतिरिक्त टेलिविज़न कंप्यूटर जैसी आधुनिल सुविधाओं के साथ खिड़की में से छनकर आता हुआ प्रकाश भी देख पा रहा हूँ जो कांच से बनी दीवार पर लटकाए परदे की ओट से झाँक सा रहा है। इसी दीवार से पार लगे पाम तथा अन्य सजावट के पौधों को भी मैं देख पा रहा हूँ।


बैठिये कहकर संचालक महोदय ने हाथ से इशारा किया और सोफे पर बैठने का निवेदन किया फिर अपने दोनों हाथों से कोट को थामते हुए पास के सोफे पर बैठ गए। स्कूल की प्राचार्या ने एक गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया। यह गुलदस्ता एक गमले में लगा जीता जागता पौधा है। मैंने धन्यवाद देने का उपक्रम किया ...और फिर बाते प्रारंभ की। इसी बीच बिस्किट और टी पोट हमारे सामने रख दिए गए । स्कूल की एक शिक्षिका ने प्याले में उबाली काली चाय उदेलनी प्रारंभ की फिर उसमे मिल्क पोट से गरम दूध मिलाया फिर मुझसे कितनी चीनी लेंगे लाह जवाब चाहा। मैंने उन्हें वैसे ही दे देने को कहा। दुसरे रखे प्याले में संचालक महोदय ने बगैर दूध मिलाए ब्लेक टी ली और शुगर क्यूब मिलाए ।


आप किस तरह के संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहेंगे अपने प्रेजेंटेशन के लिए ? कंप्यूटर और प्रोजेक्टर की आवश्यकता जताते हुए मैंने अपने कार्यक्रम की रूप रेखा के बारे में बताया। मैंने उनसे सभागृह दिखलाने की बात की और हम सीढीयों से ऊपर की और बने सभ्ग्रुह की और चल पड़े। नीचे जिस खुले प्रांगन में मैं प्रविष्ट हुआ था ठीक उसी के ऊपर यहाँ हाल बनाया जाकर ऑडिटोरियम की भाँती निर्माण हुआ नज़र आया । छत पर प्रोजेक्टर नज़र आया और दीवारें प्लास्टर से ऐसी बना दी गई हैं ताकि आवाज़ न गूंजे। स्टेज के समीप बने दो कमरे अभी कार्यालय के रूप में काम में लिए जा रहे हैं जबकि ये सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सुविधा के लिए बने हैं। सुन्दर सुसज्जित मंच पर तमाम आधुनिक सुविधाए हैं । रोशनी के लिए तथा वेंटिलेशन का भरपूर ध्यान रखा गया है। स्कूल के वनस्पति शास्त्र और जीव विज्ञान के शिक्षकों से मुलाक़ात कर स्कूल के स्तर का आभास किया है। कार्यक्रम के दिन का निर्धारण कर मै वापस अपने काम पर लौट आया।


निर्धारित दिन को अपने सहयोगी सथियों के साथ स्कूल पहुचा सारी चाही गई व्यवस्थाए वहां उपलब्ध करा दी गई थी । हाल में उपस्थित छात्र समुदाय ने स्वागत में करतल ध्वनि से माहौल गरमा दिया । मैं अपना कार्यक्रम शुरू करता इसके पहले बच्चों ने पर्यावरण से जुड़े समस्त पहलुओं पर बनाए गए नाटक का मंचन कर दिया । नदी, पर्वत, पेड़ , फूल, चिड़िया, तितली, पतंगे, भालू ,बन्दर, शेर, डोल्फिन, पेंग्विन , सियार, लोमड़ी, हिरन, चमगादड़, उल्लू , कुता बिल्ली के अलावा घोड़ा, गाय, भैंस, बकरी, भेड़ें भी इस मंचन में प्रदर्शित थी। समूचा वातावरण उन्होंने प्रकृतिमय बना डाला था। स्कूल संचालक ने हमारी उपस्थिति पर प्रकाश डाल कर मंच पर आमंत्रित किया फिर स्वागत उपरान्त मंच हमारे हवाले कर दिया। लाईट का फोकस अब हम पर था । दी गई प्रस्तुति की सराहना कर हमने कार्यक्रम की शुरुआत सामान्य जानकारी से की।


टेलिविज़न पर आने वाले कार्यक्रमों की जानकारी ली । फ़िल्मी कलाकारों की जानकारी में बच्चे बड़े जोर शोर से हिस्सा लेने लगे । फिर ऑडियो रिकार्डिंग सुनाकर सवाल पूछे तो आवाज़ मात्र सुनकर गाड़ियों की ध्वनि और फ़िल्मी सितारों की आवाजें पहचानी जाने लगी। इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपई की आवाज़ को बच्चों ने सहजता से पहचाना । इन सबका उपयोग सिर्फ इसलिए था ताकि बच्चे सहज हो कर मुखर हो सकें।


अब हमने पशु पक्षियों की आडियो सुनाई तो कुत्ते भैंस बकरी से आगे बढ़ाते हुए वन्य जीवों की ध्वनि सुनाई अब प्रतिभागी सिमटने लगे थे । बिग केट्स के बाद चिड़ियाँ तक आते हुए हमने पाया की उत्तर बड़ी मुश्किल से आ पाए । कौवे मोर तोते कोयल गौरैया की बोलीं अस्सानी से पहचानी गई मगर पर्पल सनबर्ड, रूफ़स ट्रीपाई, जंगल वेब्लर, कोपरस्मिथ बारबेट, धनेश, तीतर की आवाज़े उनके लिए नई थी।


अब अगले दौर में स्लाईड शो में वन्य पशु पक्षी पहचाने जाने थे । वन्य पशु पहचानने में दिक्कते कम थी मगर स्वदेशी विदेशी का भेद वे नहीं कर पाए । पक्षियों के रंगों से प्रभावित थे मगर नाम बताना कठिन दिखलाई दिया। जलचरों को दिक्कतों के बाद पहचान लिया।


स्लाइड्स के बाद पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिये सिमटते जा रहे वन क्षेत्रों और मनुष्य की बढाती भयावह आबादी के दृष्य और प्राकृतिक दृश्यों का मिला जुला संगीतमय कम्पोजीशन देख कर बच्चे और बड़े खुश हो गए।


पर्यावरण रक्षा को समर्पित संगीत दिखलाया तो धुन उनके दिमाग में रच बस गई थी। तो दिखलाए गए दृश्यों से वे स्तब्ध थे। तीन मिनट के इस गीत को पुनः दिखलाए जाने का आग्रह हुआ ।


टेलिविज़न और कंप्यूटर वेब साईट की जानकारी बच्चो को भरपूर थी ।


मेरे सहयोगियों ने साहित्य ,पेन ,बर्ड्स वाचिंग की पी केप्स और एक प्रश्न पत्र वितरित किया । प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों के जवाब देने के लिए दस मिनिट का समय दिया गया था । १० प्रश्नों के जवाब सिर्फ सही जवाब पर टिक लगा कर देना था जबकि ५ सवालों के जवाब उन्हें लिख कर देने थे। प्रश्न पत्र जाँच कर आते तब तक मनोविनोद का कार्यक्रम और पिछली कक्षाओं में पठ्यक्रम के तहत पढाए गए सवाल स्कूल शिक्षकों द्वारा पूछे गए।


जीतने वाले तीन विद्यार्थियों को शानदार गिफ्ट हेम्पर और वन्य जीव अभयारण्य जाने के लिए खर्च सम्बन्धी टोकन प्रदान किए गए । स्कूल ने भी पारितोषिक प्रदान किए।


अपने कुछ संस्मरण उन्हें सुनाए फिर उनसे पूछा की बड़े होकर वे क्या बनाना चाहेंगे ? मुझे हैरत हुई यह जानकर की कई बच्चे जिनमे लडकियां भी शामिल थी , वन विभाग में नौकरी किए जाने की चाहत लिए थे। आयोजन तो मात्र ९० मिनिट में ख़तम हो गया मगर इस आयोजन के बाद बच्चों के घर से मुझे फोन आये की "प्रकृति दर्शन और देशाटन के पीछे जीवदया एक सेवाकारी आवश्यकता और आजीविका हो सकती है और महज छोटी छोटी जानकारियाँ के माध्यम से आपने आजीविका के ऐसे संसाधन की ओर ध्यान दिलाया जो धरती की सेवा कर लम्बे समय तक जैव विविधता के जरिए हमारी पृथ्वी को जीवित रखने में महत्त्वपूर्ण है " तो मुझे लगा की आज मेरा प्रयास सार्थक हो गया है।

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