बुधवार, 6 अप्रैल 2011

करनी पर नियंत्रण ही अहिंसा

अहिंसा का देश भारत अपने बिगड़ते पर्यावरण के चलते किस दिशा में जा रहा है यह बात विचारणीयहैसरकारद्वारा पर्यावरण की सुदृढ़ता की दिशा में क्या कदम उठाए गए हैं अथवा क्या कदम उठाए जाने चाहिए आम लोगों तक ये बाते पहुँचाना जरुरी है। जंगल में बाघ की संख्या से पर्यावरण के पहलू उजागर करते समय हम यह भूल जाते हैं की जिस देश में आजादी के समय जो वनक्षेत्र थे आज उनका क्षेत्रफल क्या बचा है ? गुजरात के सिंहो (एशियाटिक लायन) की संख्या के लिहाज से वहां का वनक्षेत्र छोटा पड़ने लगा है जबकि मध्य प्रदेश का पन्ना टाईगर रिज़र्व बाघ विहीन हो चला था।


वन्य प्राणियों के रिज़र्व क्षेत्र टापुओं की भाँती छोटे छोटे टुकड़ों में विभाजित हैं जिन्हें अभयारण्य व् नॅशनल पार्क की संज्ञा दी जाती रही है। पालतू पशुओं के प्रति रुझान कम हो चला है तो गोचर भूमि भी गायब होने लगी है। तालाबों तथा स्टॉप डेम का पानी कृषि भूमि के लिया जाना अलग बात है मगर तालाब खाली कर खेती के उपयोग में लिए जाने के कार्य भी हुए हैं। विद्युत् की जीतनी अधिक आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचाने का काम हुआ है पानी का भूमिगत जलस्तर डांवाडोल हो गया है , यहाँ तक की पानी इस बेतरह खींचा जा रहा है की विद्युत् संयत्र जलस्तर के घट जाने से बरसात के कुछ ही माह बाद उत्पादन बंद कर देते है। अनियंत्रित शासकीय कार्यप्रणाली के चलते पर्यावरण समूचा नष्ट हो रहा है।


मध्यप्रदेश का पौधारोपण राजस्थान के पालतू पशुओं यानी भेड़ों तथा ऊँटों की चारागाह का सर्व श्रेष्ठ स्थान बन गया है। केंद्र शासन के निर्देशों के तहत स्थानान्तरण के लिए मार्ग दिया जाना अनिवार्य है । इस नियम का फ़ायदा राजस्थान के पशुपालक भली प्रकार उठा रहे हैं। वन विभाग की सुने तो उनके अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रो के जंगलों में चरवाहे रात में अपने जानवर लेकर घुस जाते हैं और रोके जाने पर अंधाधुंध आग्नेय अस्त्र चलाते हैं। हथियार चलाकर वे पुनः राजस्थान की सीमा में दाखिल हो जाते हैं जिससे उन्हें पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। दूसरी और कोई संयुक्त अभियान सुनाई नहीं देता जिसमे राजस्थान की मदद ली गई हो या पुलिस के साथ कोई शामिल अभियान ही छिड़ा हो। फिर जो भेड़ें परमिट लेकर किसी नियत रस्ते से गुजारने के लिए प्रविष्ट होती हैं उन्हें जहां तहां भटकाते देखा जा सकता है उनका कोई निर्दिष्ट मार्ग ही नज़र नहीं आता। रात में खेतों में "रेवड़" बिठाने के लिए किसानों द्वारा पैसा दिया जाता है जो निर्धारित मार्ग से भेड़ों को ले जाने से भटकाने का एक बड़े कारण के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार अनियंत्रित भटकाते हुए निकलने वाली रेवडों के प्रति कोई जवाबदेहि नज़र ही नहीं आती है। अनियंत्रित इस बर्ताव के पीछे भ्रष्टाचार की बू इसलिए आती है क्योंकि ये रेवड़ें यानी एक बड़ा पशु समूह कभी किसी खेत या निजी वृक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाता और जो नुकसान होता है वह सिर्फ और सिर्फ शासकीय वृक्षों और वृक्षारोपण को ही हानि पहुंचाता है । सीमावर्ती प्रान्तों के मध्य इस प्रकार की विसंगतियां लगातार चली आ रही जिन पर सोचना पड़ेगा ।


पेड़ों के बारे में उत्तरदायित्व की स्थित यह है की पेड़ जिस जमीन पर लगा होगा जिम्मेदारी उसी विभाग की होती है। जिम्मेदार विभाग वन विभाग की और कार्यवाही को लिख भेजता है और वन विभाग उनकी भूमि न होने की दशा में पंगु बताता है। आज राजस्व विभाग की सारी जमीने वृक्ष विहीन और सुखी पड़ी है कार्यवाही की कोई गुंजाइश कभी सुनने को नहीं मिलती। सिर्फ कुछ थोड़ी बहुत प्रजातियाँ है जिनकी सूचना पर कार्यवाही तो होती मगर लीपापोती की।


वन अपराध की स्थिति यह है की वन्य पशुओं के लिए बनाए गए अधिनियमों के तहत दी गए निर्देश कर्मचारियों को समझ में ही नहीं आते या दूसरी ओर कहें की वे समझना ही नहीं चाहते । किसी प्रेशर में होने पर वे किताबे टटोलते है और नए बहाने इजाद करते दीखते हैं।


पर्यावरण आखिर है क्या ? इसके बारे में विस्तार से समझने की जरुरत पड़ने लगी है। पद्मश्री मुज़फ्फर हुसैन अपनी पुस्तक "इस्लाम और शाकाहार" में लिखते हैं । "मनुष्य इस धरती पर अकेला जीवित नहीं रह सकता । उसे जीवन के लिए पृथ्वी पर कुदरत ने अनेक वस्तुए बनाई है जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में पर्यावरण की संज्ञा दी जा सकती है । कुदरत ने जो कुछ भी बनाया है वह सब मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है। "


आज हम अपने आस पास के वातावरण को परिवेश की भाँती लेकर उसके बिगड़ते जाने के प्रति चिंतित है मगर एनवायरोंमेंट का yah सही मायना नहीं है वह तो नदी जंगल पहाड़ों से है।


धरती पर उथल पुथल जारी है इसके चलते कितने जंगल बचेंगे और ऐसी कितनी जमीने बचेंगी जो खेती के योग्य हो क्योंकि मनुष्य की आबादी के रहने के लिए बनती जा रही नित नई कालोनियां खेती की श्रेष्ठ जमीनों तक को निगल चुकी हैं। जमीन के अभाव में पशुओं के लिए चारागाह कहाँ से आयेंगे ? वन भूमि चराई के काम में आने लगी है औरजो केटल प्रेशर के रूप में विदित होती आई हैं .... तब जंगल कहाँ बच रहेंगे ? सूखे बंजर पहाड़ खड़े रह जाने पर क्या नदियों का उद्गम अप्रभावित रह सकेगा ? खेती और जंगल जब घटेंगे तब आहार के लिए क्या हम शाकाहारी रह पायेंगे ?


समुद्र की गहराई तक को हमने अपना शिकारगाह बना रखा है बड़ी संख्या में मत्स्याखेट विश्व स्तर पर हो रहा है । पानी में ओक्सीज़न की कमी से मछलियों के मरने की खबरों में अब समंदर भी शामिल होने लगा है। बड़ी संख्या में शिकार से जलजीवों की संख्या बुरी तरह प्रभावित है ऐसे में नदियों का सूख जाना या बरसाती नाला बनकर रह जाना धरती पर पेयजल की उपलब्ध मात्रा को किस कदर घटा देगा ? विचार करना पडेगा।


धरती के प्रति चिंता रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वसुंधरा सम्मलेन का आयोजन किया और २०१५ तक मिलेनियम गोल के तहत संरक्षण उपाय किए जाकर पृथ्वी के पर्यावरण को बचाए जाने की बाते हुई। विश्व यानी धरती के बदलते पर्यावरण के प्रति हमारी प्रतिबद्धताए क्या होनी चाहिए इस विषय पर सभी देशों ने अपने प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए । हमने यानी भारत ने भी इसमे बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया । खेती की जरूरतों के लिए जल दोहन (अधिक उचित शब्द तो शोषण है) के प्रति विचार नहीं है। खेती के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभाव उसके बदलते जा रहे तौर तरीके अनदेखे हुए हैं। पशुपालन की वनक्षेत्र में घुसपैठ पर कोई कड़े नियम नहीं हैं अब वन्य पशु अपनी सरहदों के बाहर निकलने पर मजबूर हो चले हैं। तब फिर वे क्या उपाय है जो धरती को समृद्ध बनाने में कारगर रहेंगे? क्या महज वन्य पशुं की संख्या में बढ़ोतरी हो जाना पर्यावरण की समस्त भूमिका को प्रतिध्वनित कर पाने योग्य मन लिया जाए?


अब लोगों में यह जाग्रति तो है की चिड़िया को दाना पानी हर रोज़ रखा जाए मगर अभी इंतज़ार है की वे उन्हें एक स्वस्थ पर्यावास देकर एक बार पुनः "कोटर" दे पायेंगे? जहां से नए पंछी गीत गाते आसमान की उड़ान भरेंगे । इन सबके लिए बहुत कुछ है जिसका बलिदान करना होगा और मै सोचता हूँ किहर इंसान द्वारा किया गया यह बलिदान ही असल में अहिंसा होगा जिसमे इंसान को अपने साथ अन्य प्राणियों का पर्याप्त ध्यान रखकर अपनी करनी पर नियंत्रण करना पडेगा .......



राजेश घोटीकर


६/१६ एल आई जी "बी"


जवाहर नगर


रतलाम (म.प्र)


९८२७३४०८३५


* लेखक बर्ड्स वाचिंग ग्रुप के संथापक होकर वन विभाग में मानसेवी जिला वन्यप्राणी अभिरक्षक के रूप में कार्यरत रह चुके है। http://birdswatchinggroupratlam.blogspot/ log on karen


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