गुरुवार, 30 अगस्त 2012

बुधवार, 29 अगस्त 2012

दिल की कहानी



दिल की कहानी 

रविवार, 26 अगस्त 2012

Sense Positive


शनिवार, 25 अगस्त 2012

Logo BJP


बुधवार, 22 अगस्त 2012

वजूद है ये मेरा कि


अपने वजूद पे इतना तो यकीन है मुझे 

कि

कोई दूर तो हो सकता है मुझसे !

पर 

भूला नहीं सकता 

सोमवार, 20 अगस्त 2012

परिधि के बर्थडे 19 जुलाई 2012 को खीचा गया फोटो



परिधि के बर्थडे 19 जुलाई 2012 को खीचा गया फोटो 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

किंग फिशर

किंग फिशर  

मस्जिद अबाबील


‘‘मानवीय संवेदना में जंगल’’


बारिश का दौर प्रारंभ हो गया। धरती ने हरियाली की चादर ओढ़ ली। शहर भर के प्रकृति प्रेमियों का जमावड़ा होने लगा। पौधे लगाने के कार्यक्रमों का मानस बन आया। लोग मुफ्त के पौधे तलाषने लगे। चाहत तो ट्री गार्ड पाने की भी रही जिनमें कुछ लोग सफल हुए और अनेक निराष। नेता, अधिकारी और कार्यक्रम का खर्च उठाने में सक्षम समाज सेवियों को गली मुहल्ले में बगीचों के लिए खुले छोड़े गए स्थानों पर बुलावाया गया और उनके हाथों में पौधे थमाकर जमीन में रोपते हुए फोटो खींचवाए गए। बगीचे की हालत सुधारे जाने की चर्चा की गई। पर्यावरण की रक्षा में पेड़ों का योगदान विषय पर संभाषण हुए। नाष्ता करते हुए प्रेस में समाचार देने की कवायद की गई। कौन-कौन वहां आया इस बात पर मंथन हुआ। पौधा रोपण के साथ नए नए संगठन उभरने लगे। नए ‘‘एन्वायरोन्मेट सेलीब्रिटी’’ बढ़ने लगे।
लगाए गए पौधे अतिवर्षा से सड़ गल गए जिन्हें बगैर पोलीथीन हटाए रोपा गया था। पौधों की पोलीथीन हटाते समय जड़ें तोड़ दिए जाने से कुछ पौधे सूख गए। थोड़े बहुत अच्छे पनपे तो उन्हें बकरियाँ और पालतू ढोरों ने आहार बना लिया।
गरमी के दिनों में वन विभाग में प्रषिक्षण दिया जा रहा था। रोपणी का प्रबंध कैसे किया जाए। प्लांटेषन बेड़ कैसे बनाए जाएँ। पानी किस प्रकार से दिया जाए। बेग्स कब षिफ्ट करें। संख्या एवं गणना चार्ट किस तरह बनाएँ। कौनसी प्रजाति के बीच लगाने है तथा वितरण व्यवस्था क्या होगी? इत्यादि।
बीजों की खरीद। पोलीथीन बेग में मिट्टी भरकर उन्हें लगाना। हरे कपड़े की छाँह में तपन से बचाकर पानी लगाना। पौधा तैयार हो जाने पर उनका ट्रांसपोर्टेषन और निगरानी पर खर्च फिर तय किए शुल्क को प्राप्त किए बिना मुफ्त की बंटाई करना विभाग की मजबूरी है।
एक दिन ज्ञात हुआ कि बगीचे में रोपे गए पौधों वाले स्थान पर अब मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। जानकारी में यह भी आया कि यह बगीचा अचानक से कचराघर बन गया था। सफाई पसंद नागरिकों के मोहल्ले में किसी सुदूर अंतरिक्ष निवासियों द्वारा रात के अंधेरे में कचरा फेंका जाना मालूम होने लगा था। बस इसी बात से मंदिर समिति का गठन कर पैसे वसूले गए फिर ताबड़तोड़ मंदिर निर्माण भी प्रारंभ हो गया। बुलवाए गए नेताओं का योगदान भी यहां प्राप्त हुआ। अब यह मंदिर किसी विषेष व्यक्ति की निगरानी में है। पर्यावरण सुरक्षा के इस मंदिर में पुजारी से जो जानकारी मिली उसने अभिभूत कर दिया। पेड़, पत्ते, फूल और फल सभी के प्रति भावनाएं यहाँ उपजाई जा रही थी। लोग दूर दूर से अनेक के पौधों को तोड़कर उसके पत्ते ईष्वर को भेंट कर रहे थे कोई अनार के पत्ते ला रहा था कोई बेल के पूरा मंदिर फूल पत्तों से भरा जाता था। मैं समझ नहीं पाया कि कचराघर ये तब था या अब है। फिर मुझे याद आई यहां की बुनियाद जो बगीचा उजाड़कर बसाई गई थी। यहां भजन बज रहा था ‘‘श्री कृष्ण शरणम् मम’’। इसके बोलों में पेड़ पौधे पशु पक्षी सभी श्री कृष्ण से शरण प्राप्त करने की दुहाई दे रहे महसूस हो रहे थे।
अचानक मुझे याद आई एक कचरा बीनकर आजिविका चलाने वाली चीनी महिला की जिसने 30 से अधिक बच्चों को मर जाने से बचाया और कचरा पेटी से लाकर छह बच्चों की परवरिष स्वयं की। नितांत गरीबी के बावजूद उसने सिखाया कि परोपकार सिर्फ पैसों से नहीं होता।
यह परोपकार की बात पेड़ों पर भी लागू होती है। वे आजीवन प्राण वायू, जल संरक्षण, मृदा निर्माण एवं संरक्षण, सुंदरता एवं शीतलता के अलावा इंधन एवं इमारती लकड़ी का उत्पादन करते हैं मगर मुझे एक नई जानकारी मिली और तब से मैं स्तब्ध हूँ। परोपकारी इन वृक्षों एवं वनस्पतियों की वजह से लाखों हेक्टेयर जमीने बेकार हैं जो अनेकों उपयोगों में ली जाकर विकासषील देष को समृद्धता प्रदान कर सकती है। मुफ्त के इंधन एवं फल फूलों के कारण हमारे लोग आलसी हैं वे नाॅन प्रोडक्टिव की गिनती में हैं। प्रकृति पर निर्भर लोग अपनी भागीदारी अर्थतंत्र के सूचकांक पर सीधे से नहीं डालते है जिसकी वजह से हमारा राष्ट्र अब तक विकासशील ही बना हुआ है।
अब वनवासियों को पट्टों का वितरण किया जाकर उन्नयन किया जा रहा है। देष का लाखों हेक्टेयर जंगल अब कृषि व अन्य उपयोगों में आएगा और हमारी समृद्धता में वृद्धि होगी।
मेरी स्तब्धता में विचार का एक झटका और भी लगा जब मुझे एक नए शब्द में परिचित होना पड़ा वह शब्द था ‘‘सांकेतिक वृक्षारोपण’’।
सांकेतिक वृक्षारोपण के चलते तबाए हुए जंगल, खेत, खेल के मैदान, फिर बढ़ना प्रदूषण ये सभी मेरी आंखो के सामने से गुजरे और मैं कायल हो गया जंगलों के प्रति मानवीय संवेदना का।

राजेष घोटीकर
6/16 एल.आय.जी. ‘बी’
जवाहर नगर,
रतलाम (म.प्र.)

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

You Can


सोमवार, 6 अगस्त 2012

यमुना तीरे



7x 800 travelling expences =      5600
3 A/C Room accomodation =    7500
banners for display 15x (6x4)=
handbill printing 20000 =
distribution of banners & Handbills =
rent of venue =
food =
its all over 45000

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012