शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हल्दीघाटी का युद्ध

समरानल की भीषण लपटें , हल्दीघाटी पर भभक उठी ।
विप्लव की भूखी प्यासी वह, जहरीली नागिन चमक उठी ।1।

तलवारों की आंधी आई , और तीरों का तूफ़ान उठा ।
नर मुण्डों का ढेर लगा , शोणित का पारावार बहा ।2।

मेवाड़ी वीर सपूतों ने , हर हर हर कर जब वार किया ।
लाखों यवनों को समर में , मृत्यु के घाट उतार दिया ।3।

 दंती पर अम्बारी भारी, जिसमें सलीम था झूम रहा ।
मस्ती से पलकें बंद किये, जो फूलों को था चूम रहा ।4।

यवनों को जब बढ़ते देखा, राणा को जोश उमड़ आया ।
जब एड़ लगी, चेतक लपका, सीधा शहजादे पर आया ।5।

राणा का ज़हर ज़हर बूझा भाला, दुर्भाग्य निशाना चुक गया ।
शहजादे को आई मूर्छा , तन का सब रक्त सूख गया ।6।

कट चुकी काट कर लाखों को छोटी सी सैना राणा की ।
वह भी तीरों से घायल था , थी दशा बुरी महाराणा की ।7।

वह समर धरा को छोड़ चला , सैनिक के मूक इशारे से ।
जिसने राणे का वेश किया , उसने कई शीश उतारे थे ।8।

राणा का भाई जो अब तक , वह शक्तिसिंह कहलाता था ।
मेवाड़ी सेना पर जो खड्ग , जहरीले बाण चलाता था ।9।

पर देख दशा भाई की यह, भाई का प्यार उमड़ आया ।
शक्ति की सूखी आँखों में, सावन का मेघ उमड़ आया ।10।

नयनों से फूट फूट झरनें बहते भाई का प्यार लिए ।
बहते वे अविरत जाते थे , महाराणा का अभिसार किए ।11।

रोना छोड़ा, जब ध्यान हुआ, कर्त्तव्य जागा, वह उछल पड़ा ।
राणा की जान बचाने को, शोणित भाई का उमड़ पड़ा ।12।

दृग से अंगारे भभक उठे, भोहों में सुकुड़न दीख पड़ी ।
जो दबी हुई सोई सी थी, ममता भाई की चीख पड़ी ।13।

घोड़े को देकर फिर लगाम , कर्त्तव्य और प्रस्थान किया ।
जो भूल गया था पथ अपना , पथ उसने निज पहिचान लिया ।14।

दोनों के मस्तक काट दिये, पैरों से नेत्र रोंध डाले ।
आगे बढ़ाते ही शक्त गया , फिर कौन रहे बढ़ने वाले ।15।

शक्ति को सन्मुख देख प्रथम राणा का मस्तक चकराया ।
घायल दिल को कुछ धैर्य मिला, था स्रोत रुधिर का बहा नया ।16।

मेरी छाती चीरी जाती , मुगलों की तुच्छ कटारी से ।
क्या ये आँखे कुचली जाती ? सचमुच उस मुग़ल भिखारी से ।17।

"सौभाग्य मेरा जो आये तुम, शक्ति? राणा यूँ बोल उठा ।
ये शब्द सुने जब शक्ति ने , विव्हल दिल उसका डोल उठा ।18।

"जल्दी शक्ति इस ग्रीवा पर , अपनी तलवार चलो तुम ।
भाई का उर प्राणांत अभी, भाई का प्यार जतादो तुम ।19।

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"सचमुच अपराध हुआ मुझ से, बच्चे सा रुदन किया भारी ।
आँखों से फूट पड़ी बदली, और आर्द्र हुई धवनीसारी ।20।

सचमुच बहि आगे निकली , राणा के दग से धार बही ।
दो भ्राताओं का महा-मिलन , उस सुख का पारावार नहीं ।21।







उक्त पंक्तिया किस कवि की है यह तो नहीं मालुम मगर आहुति नाम की पुस्तिका का पन्ना हमें पान की दूकान से प्राप्त हुआ जिसे मै यहाँ लगा रहा हूँ 

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