गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

Wow Zimbabwe




माहि नदी का उद्गम संरक्षित किए जाने योग्य


रतलाम

बदलते  समय  के  साथ  नदियों  की  दशा  भी  बदल  गई  है .  नहरों  के  जाल  से  हमने  समृद्धि  की  नई इबारत  लिखी  है  मगर  आधुनिकता  की  दौड़  में  हमने  कई  सदा  नीरा  नदियों  को  बरसाती  एवं प्रदूषित नालों  में  बदलते  देखा  है . माहि  नदी  का  उद्गम  धार  जिले  में  है  और  यह  संरक्षित  किए  जाने  योग्य  है . उक्त  बात  बर्ड्स  वाचिंग  ग्रुप  संस्थापक  राजेश  घोटीकर ने  विश्व  वरुन्धरा  दिवस (अर्थ डे) के  दिन  राज्य  सभा  सांसद  श्री  विक्रम  जी  वर्मा  से  भेंट  के  दौरान  उनके  धार  निवास  पर  कही .

रतलाम  से  धार  गए  दल  में  पंडित  बाबूलाल  जी  जोशी , नरेन्द्र  सिंह  पंवार  तथा  कुशलगढ़  के  मुकेश  नाहटा  शामिल  थे .

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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

प्रतिस्पर्धा का महत्व


यात्रा संस्मरण

प्रतिस्पर्धा का महत्व उत्थान को समर्पित है। प्रतिस्पर्धाएँ व्यक्तित्व को निखारती है। शीर्ष स्थान को पा लेने पर प्रसिद्वि और सम्मान आपका दिल खोलकर स्वागत करते है। पंचतंत्र और हितोपदेश के अतिरिक्त विभिन्न देशों  की लोकगाथाएँ नैतिक चरित्र और सूझबूझ को प्रेरणा प्रदान करने में सहायक है। अनेको साहस गाथाएँ  भी है जो मनोबल बढाती है। समाज के ताने बाने में गुंथा इंसान सामाजिक व्यवस्था और साहचर्य के गुणों के साथ जीवन समृद्व बनाता आया है।
प्रतिस्पर्धाएँ जीवन के हर पहलु को स्पर्श करती है। शिक्षा, व्यवसाय, खेल नौकरियां, यहाँ तक कि निर्वाचन भी प्रतिस्पर्धा से लबरेज है।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में हताशा, निराशा, वैमनस्य को रोकने के लिए एक शब्द ''स्पोर्ट्समेनस्पिरिट'' का उपयोग लगातार होता आया है। अब मोबाइल पर एस.एम.एस. की दुनिया में भी मनोबल बढाए जाने के संदेश  का एक नमूना पेश है। वैसे तो श्री श्याम विंचुरकर जी ने मुझे यह महज फारवर्ड किया है। जिसका अनुवादित संदेश इस प्रकार है '' जिंदगी बहुत कुछ बॉक्सिंग रिंग के समान है। जहाँ हार तब घोषित नही की जाती है जब आप गिर जाते है। यह हार तब घोषित होती है। जब उठने से इंकार कर देते है।'' सच ही है ''मन के हारे हार है, मन के जीते जीत''।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में नैतिकता या " स्पोर्टसमेनशिप '' का भाव हमारे वातावरण से नदारद होने लगा है। दूसरों में दोष ढूंढना, खामियाँ निकालना यहाँ तक कि बेइमानी को प्रोत्साहन और सच्चाई पर परदा जैसे अवगुण हमारे जीवन मूल्यों का अंग बनने लगे है तो उपरोक्त मोबाईल संदेश का जवाब देना बनता था। यह लाजमी भी था, सो जवाब बनाया, जिसका अर्थ इस प्रकार अभिव्यक्त होता है - ''शतरंज के खेल में राजा पर शह और उसके बच न पाने की सूरत में ही हार नही होती, यह तब भी मात होती है, जब राजा या शेष अन्य सैनिकों के पास चलने को कोई चाल नही बचती। सिर्फ बॉक्सिंग रिंग में गिरकर उठ खडे न होने की दशा से जीवन का मूल्य प्रस्तुत नही किया जा सकता, क्योंकि यह खेल के स्वरूप में उसी प्रकार बदलती है जो खेल आप खेलते हैं और यह भी अनथक सत्य है कि प्रेम हमेशा विजयी होता है।''
जीवन के मूल्यों में प्रेम की शाश्वतता को नकारा नही जा सकता है। अभी एक ताजातरीन संस्मरण याद आया जो धनुर्विद्या अर्थात ''आर्चरी '' से जुडा है। जो खेलती प्रतिस्पर्धी टीमों के मध्य प्रेममय स्पोर्टसमेनशिप का अनोखा स्पर्श और खुशबु बिखेर रहा है। खेलभावना की नैतिक पराकाष्ठा को छूता यह प्रसंग मुझे हमारी पूर्वात्तरी सीमा पर स्थित भूटान देश के प्रवेश नगर फुन्त्शोलिंग के समीप अनुभव हुआ है। भूटान में विगत जनवरी 2012 में तुषार कोठारी, आशुतोष नवाल, संतोष त्रिपाठी और नरेन्द्र शर्मा के साथ यात्रा का कार्यक्रम संपन्न हुआ है। 2, 3 और 4 जनवरी को इस त्यौहार को मनाए जाने की वजह से यहाँ समस्त शासकीय कार्यालयों में अवकाश भी घोषित था। '' त्रोंग्सा त्सेचु'' Trongsa Tsechu  नामक यह पर्व '' त्रोंग्सा '' नामक स्थान पर मनाए जाने की वजह से '' त्रोंग्सा त्सेचु'' कहा जा रहा था। धार्मिक प्रार्थना, परिक्रमा के सार्वजनिक स्वरूप् में ''त्सेचु'' संपूर्ण देश भर  मे मनाया जा रहा था। फुंत्शोलिंग में प्रवेश के पूर्व से ही इस पर्व के बारे में ज्ञात था, परन्तु अवकाश के बारे में यहीं आकर ज्ञात हुआ। ''त्सेचु'' के अवकाश की वजह से शासकीय अधिकारियों का एक दल पहाडी वादियों में तीरदांजी खेलते और पिकनिक मनाते मिला।
ऊँचे बाँस पर खडी लटकाई पताकाओं से घिरा प्रांगण देखकर जानकारी लेना चाही। गाडी मै ड्राईव कर रहा था तो रूकती गाडी की वजह सभी ने पूछी। मैने उन्हे कहा पीछे '' गोम्फा '' के बारे में लोग कह रहे थे, तो यहाँ जो लोग खडे है इनसे पूछ लेते है। उतरकर कच्ची पगडंडी से नीचे उतरते रास्ते पर आगे बढा तो यहाँ हाथों में धनुष बाण लेकर नृत्य कर रहे लोगो को देखकर मै ठिठका। मुझे थोडी देर तक इस प्रकार के नृत्य करने का तात्पर्य समझ में नही आया। नृत्य और गीत की समाप्ती पर "वोहो वोहो वोहोहो हो" कर हाथ ऊँचे किए गए और लक्ष्य में धंसे तीर को जो नीले रंग के बाहरी सर्कल में लगा था, खींचकर निकाला गया और लक्ष्य के पास करीने से लटकाए गए नीले रंग के दुपटटे को उचका कर छोडा दिया गया। फिर इसी कोने पर खडे एक धनुर्धर ने बाण उठाकर प्रत्यंचा पर तान लगाई तो मरी निगाह में सामने दूर पहाडी समतल पर खडी टीम नजर आई। उस टीम के पास (मेरी निगाह से) से बायी और दो टेबलें लगी थी और दाहिनी तरफ एक समूह नृत्य कर रहा था। महिला पुरूष इसमें एक गोल घेरा बनाकर नाच रहे थे।
मैं अपनी बायी तरफ की कच्ची पगडंडी पर नीचे उतरने लगा और बाकी सभी को गाड़ी से नीचे आने की हिदायत दी। कमर पर लगे पाउच से कैमेरा निकाल कर मैं आगे बढ़ा था और इस तरफ हो चुके इस नृत्य को कैमरे में संजो चुका था। आगे ऊँचे नीचे चलते पगडंडी के उस पार हो रही गतिविधि ने मुझे वहाँ पहुंचने को मजबूर कर दिया। मैं वहाँ का जायजा लेने चल पड़ा तो नरेन्द्र मेरे साथ हो लिया, जबकि तुषार, आशुतोष और संतोष गाड़ी से नीचे उतर आए थे। हम सभी इस आयोजन का आनंद लेने लगे। रास्ते में आते कुछ धनुर्धारी मिले उनके फोटोग्राफ बनाकर आगे बढ़े। नीचे उतरती पहाड़ी के नीचे नजर आते मकानों से कुत्तों के भौंकने की आवाजें गुंजने लगी। मैं दूसरी ओर की पहाड़ी पर चढ़ रहा था। बाई ओर संकरे रास्ते पर रखे पत्थर से गुजरता हुआ अब दाई तरफ घुमा तो वहाँ मेरी दाई  तरफ शराब की छोटी स्टाल बनाई  गई  थी और उसके आगे रस्ते के पार सामने की ओर कपड़े रखे गए थे। मैं नृत्य कर रहे समूह की तरफ तेजी से बढ़ा तो बीच में धनुर्धरों की दूसरी टीम लक्ष्य के पास खड़ी थी और यहाँ से तीर चलाया जा रहा था उस छोर पर, जहाँ से मैं चला था।
नृत्य किसी गीत को गाते हुए किया जा रहा था। पास में भूटानी स्थानीय वाद्ययंत्र रखे हुए थे। इस दृष्य का विडियो बनाकर मैं तीरदांजों के बीच पहुँचा।
उनके बताए अनुसार यहाँ बारह-बारह सदस्यों की दो टीमें बनाई गई थी। ओलिम्पिक खेलों में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक धनुष और बाण से इनमें प्रतियोगिता हो रही थी। प्रत्येक तीरंदाज को बारह मौके लक्ष्य बींधने के मिलने की बात बताई गई । लक्ष्य सफेद रंग का एक पटिया था जो भीतर से बाहर की तरफ क्रमश: सफेद, लाल, पीला, हरा और नीले रंग के सर्कल में पुता था। लक्ष्य के दोनों और बाँस खड़े किए गए थे जिस पर दुपटटेनुमा कपड़े लटके थे। जमीन से ढ़ाई फुट की ऊँचाई पर दोनों ओर जिस प्रकार भीतर से बाहर लक्ष्य पर रंग पुते थे उन्हीं रंगों का संयोजन दुपट्टों द्वारा व्यक्त किया गया था। आगे और पीछे लम्बे ऊँचे बाँस बांधकर पताकाएँ लटका दी गई थी ताकि जब तीर इस छोर पर चलाया जाए तो यह सीमा के स्वरूप में अभिव्यक्त हो। दोनों रखे गए लक्ष्यों के मध्य अनुमानित दूरी कोई डेढ़ सौ मीटर थी। सभी उपसिथति लोग शराब पी रहे थे और आनंद मना रहे थे। नशे की अवस्था में तीर चलाकर वे मानों अपना मानसिक नियंत्रण भी आजमा रहे मालूम होते थे। प्रत्येंक खिलाडी अपना अवसर आने पर निशाना साधता और तीर चलाता। निशाना सही लगने की दशा में खिलाड़ी स्वयं ही नृत्य करते थे, यहाँ कोई चीयर लीडर्स नही थे। निशाना लक्ष्य पर बने जिस किसी रंग के गोले पर लगता उसी रंग का कपडा उसे पास बने कपडें की स्टाल से, जो स्कोर टेबल था असल  में, सम्मान प्रदान कर कमर पर बेल्ट से लटका दिया जाता। असल मे नृत्य - गान निशाने के सटीक लगने का सम्मान था और दूर दूसरी पहाडी पर बने केन्द्र पर खडे लोगो को यह सूचना प्रदान करता था।
अंपायरिंग की जरूरत यहाँ नही थी और स्कोरर को भी खिलाडी ही जाकर सूचना दे देते थे। अपनी पदक पटिटयाँ लेने तीरंदाज का छोर बदलना पडता था। दोनों प्रतिस्पर्धी टीमें सम्मानपूर्वक ईमानदारी से खेल रही थी। तकनीक, खेल, आधुनिकता और नशे में मानसिक नियंत्रण के अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी का सम्मान, नृत्यगान और पदक पटटी का दिया जाना मुझे एक सुदृढ अनुशासन प्रतीत हुआ।
मुझे अपना बचपन याद आ गया जब पतंग की डोर और बाँस की सलाई से धनुष बनाते फिर दीवार पर गोल  निशान बनाकर लक्ष्य पर फुलझाडू की डंडी के बने बाण चलाते। छोटी-छोटी सी बातों पर लडा करते। निशाना झूठा बताकर चिढाते। कई तरह की बेईमानियाँ किया करते। लडाई इतनी उग्र हो जाती कि एक दूसरे के धनुष बाण तोड दिया करते। कई बार तो बडों को भी हमारी लडाई में आना पडता। मार भी पडती। हमारे आँसू पोछने के लिए रंग बिरंगे  काग़ज से सजे धनुष बाण लाए जातें नए सुंदर धनुष से शत्रुपक्ष को चिढाया जाता था। एक बार पुन: लडाई की संभावना बढ जाती थी।
भानजे अभिमन्यू की मांग पर मुझे झाबुआ जिले के आदिवासी क्षेत्र में प्रचलित धनुष-बाण खरीदकर उसे देना पडा था। उसकी अपनी ऊँचाई से दुगुना बडा धनुष जिसकी प्रत्यंचा चढानं कठिन काम भी है, पाकर उसकी देखने लायक खुशी याद आ रही थी। अब इस यात्रा की बात उसे बताई तो उसने भूटान की करेंसी, क्वाईन की मांग रखी जो मैं लेकर वापस आया हूं। वापसी पर तीरंदाजी की बात बताई तो उसने शराब पीने की बात पर आश्चर्य व्यक्त किया। वह इस बात से खुश था कि बगैर लडे झगडे उत्सव की भांति एक प्राचीन विद्या सहेजी गई  है। मुझे अब किसी खेल को परंपरा की तरह सहेज में राजशाही की उपयोगिता नजर आने लगी। एक कडा अनुशासन और नैतिक मनोबल देखने में जो आया था। बालपन की गलतियाँ और लडाईयाँ तो बरसों का वृतांत है, परन्तु भूटान की खेल प्रवृत्ति में वहाँ कि विरासत की झलक दिखाई दे रही थी। हमारा समृद्व इतिहास धार्मिक मनोवृति और संस्कृति का द्योतक रहा है। भूटान का यह दौरा अब मुझे हमारी वर्तमान व्यवस्था,भ्रष्ट और अमर्यादित होते आचरण से परेशानी दे रहा था। हर बात पर ठिठौली और नीचा दिखाने की मानसिकता का वरण किए हम लोग लोकतंत्र की स्वतंत्रता में कितना गिर रहे है। मैं यह सोचने की विवशता को प्रेरित हो रहा था। दिल कह रहा था काश ! हम भी कडी प्रतिस्पर्धी मानसिकता के बावजूद अनुशासित हों, हमारा नैतिक मनोबल ऊँचा बना रहे।

राजेश घोटीकर
6, एल.आय.जी.बी.
जवाहर नगर रतलाम
मो. 09827340835


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

अंग्रेज हो रहे भारतीय बच्चो की यात्रा

गरमी के दिन आते है फिर स्कूलो की छुटिटयां शुरू हो जाती है घर से बाहर दिन की धूप में लू लगने का डर, रात में मच्छरों के हमले। हाँ एक बात जरूर होती है कि इन उकताहट भरे दिनों में किसी ठण्डे स्थान की याद जरुर आती है।

शादियों के दौर भी इन छुटिटयों में सर्वाधिक होते है।गर्मी से बचाव के लिए क्या करें, क्या न करें के सुझाव। शीतलपेय,कुल्फी, आइस्क्रीम,तरबूज,खरबूज,आम,कच्चीकैरी का पन्ना,लिकिवड फुड,श्रीखण्ड, लस्सी,करौदे,खजूर,इमली, शहतूत, खिरनी और न जाने क्या क्या सुगंधित, खुशबूदार, मीठास से भरे चटपटे और खटटे मीठे स्वाद। क्या कहना इस ऋतु के खानपान का तब भी सुरम्य प्रकृति की गोद, हरे भरे बगीचे, रिश्तेदारों की मस्ती के बीच पर्यटन का अपना ही अलग मजा है।

 तपता रेगिस्तान, उमस भरे समुद्री किनारे, सूखे खेतो  के बीच से निकलकर हर कोई घने जंगल, हरे भरे पहाड, झरने, झील और पर्वतीय बर्फीले स्थान के लिए उद्यत होकर जाना चाहता है।

दुनिया के कितने ही स्थान हम या आप सुनते रहे हो तब फिर भी वहाँ जब तक चले नही जाते मनोमस्तिष्क में छाया, सुना सुनाया अजूबा हमें वहाँ जाने को भीतर तक प्रेरित करता रहता है। किसी जगह जाकर आने के बाद वहाँ  की स्मृति को संजोकर अपनी मित्र मण्डली को सुनाना। क्या किया, कहाँ गए, कहाँ ठहरे, क्या क्या देखा, क्या क्या सीखा, और कितना खर्च किया आदि अनेक तथ्य पर्यटन के साथ साथ हमारे दिमाग को उद्वेलित करते है।

पर्यटन के साथ हमें संस्कृति, सभ्यता, बोली, भाषाए और स्थानीय व्यवहारों तथा रिवाजो का अनुभव मिलता है। किताबों और कोर्स में पढे लिखे अध्यायो से दूर जीवन की खुली किताबें, अचरजकारी दृष्यों का हमारा पिटारा जो अनेक माहितियों से भरा होता है हमारे अपने मित्रो मे एक अलग धाक भी पैदा करता है।
पर्यटक स्थलों पर विरासत के अपने अलग चिन्ह स्थापित है जिनमें पुराने किले, महल, छतरियां  आदि राजचिन्ह है तो दूसरी तरफ मंदिर आदि वास्तुकला के धार्मिक मनोहर वृत्तांत। इन सभी बातो को मन में टटोलते, वन्य जीवन, प्राकृतिक गुफाओं, झीलों, नदी तटों और विभिन्न तरह की यात्राओं के फेरे, अनुभव और ज्ञान में वृद्वि करते है। खोजी मानसिकता से रोमांचकारी स्थलों का चयन जहाँ साहसिक यात्राओं की पृष्ठभूमि है तो अब एक समूह में संपूर्ण सुविधा के साथ टूर करना सुरक्षित यात्राओं का विचार। चलिए यात्राओं की तैयारी के सफर पर आधुनिक बच्चों के साथ..............

दिस होलीडेज़ व्हेअर वी आर गोइंग पापा? परिधि ने अपने पिताजी से पूछा।
 "योर दादी वाण्टस टू गो सम आफ द पिलग्रीम प्लेसेस सो राइट नाऊ वी आर प्लानिंग टू विजिट देअर." आल्सो योर माँम  सेज़ विद दिस योर कल्चरल नॉलेज, इंडियन लाइफ स्टाइल वेल्यू और हिस्ट्री नॉलेज इंक्रीज हो जाएँगे।
 ओफ! सो बोरिंग....... दादी को बोलिए न कहीं सी-शोर पर चलते है। प्लीज पापा ये मंदिर वंदिर रहने दो न। बहुत गंदा है ये सब। कितना क्राउड रहता है, फिर गंदे लोग, लंबी लाइने और बेगर्स भी। कुछ और प्लनिंग करो न प्लीज़।
 बट बेटे; वी आर प्लानिंग अवर समर होलीडेज एट हिलटाप कूल नार्थ इंडियन प्लेसेस..... यमुनोत्री, गंगोत्री, ऋषिकेष, केदारनाथ,देहरादून, मसूरी, टिहरी, राजाजी व  जिम कोर्बेट नेशनल पार्क एटसेट्रा। यू विल डेफिनेटली एन्जाय गेंजेस रिवर वेली। बहुत हरा भरा है। तुम अंकलजी से पूछ लो।
 मैं अभी तक यह संवाद चुपचाप सुन रहा था। मेरा सिर इन सिरफिरें ''कान्वेंटी संवाद" से चकराने लगा था। पर अब इस मसले में मुझे भी शामिल कर लिया गया तो एक जिम्मेदारी सी आ गई थी मुझ पर। मैंने पूछा कि ''बच्चों की दादी  यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ जैसी विकट चढ़ाई का सफर करने योग्य हैं क्या?
 जवाब मिला - अरे भाई! मेरी माँ अभी मुझसे भी जवान है सेहत के मामले में। सवेरे चार बजे उठकर मार्निंग वाक, योगा और ब्रेदिंग एक्सरसाइज रेग्यूलर करती हैं। मुझे तकलीफ हो सकती हैं मगर वे एकदम फौलाद की रखी हैं मानों।
 पहली बार इन सज्जन के दफ्तर में आया था। बाकी के लोगों को जानता तक नहीं था। उनकी बात से समझ पाया कि कठिन परिश्रमी हैं उनकी माताजी।
 वे बोलते चले गए, मैं सोचता चला गया। अभी बस यही पर्वतीय तीर्थ स्थल उनके शरीर और स्वास्थ्य के रहते करा दिए जाने चाहिए थे फिर बुढ़ापे का क्या भरोसा? बचे चारों धामों में से अन्यत्र इतनी कठिनाई भी नहीं थी। मैंने पूछा और आपके पिताजी क्या वे जा पाएंगे?
 वे तो कभी घर छोड़ने तक को तैयार नहीं होते हैं यार, जाना तो माँ को है और अब उनके साथ उनकी बहू भी रजामंद है यानि मेरी श्रीमति और तुम्हारी भाभी। मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता कहीं जाओ न जाओ।
किसी दफ्तर में इस प्रकार की बात हो जाएगी और मैं उनके पारिवारिक मसले में शामिल कर लिया जाउंगा समझ से परे था। मैं पसोपेश  में पड़ गया। मेरे पास परिस्थितियाँ जानने या समझने का समय नहीं था फिर  शिक्षा से अंगरेज हो चले इन बच्चों को अपनी संस्कृति समझा कर भारतीय मूल्यों की रक्षा किए जाने का दायित्व जान पड़ा।समुद्री इलाके खास तौर पर व्यावसायिक केंद्र तथा पाश्चात्य संस्कृति तथा कॉस्मोपोलिटन कल्चर के लिए प्रसिद्ध हैं तो फिर वहां भारतीय संस्कृति और उसका अध्यात्म कैसे महसूस हो सकता है ? अर्थात ही वहाँ हमारी संस्कृति के दर्शन होना मुश्किल बात है. ऐसे में गंगा नदी का तट अनेक धार्मिक वृत्तांतों से भरा देखा हुआ जानकर मै स्वयं भी अपने मित्र के हिमालय की वादियों के इन धार्मिक और पर्यटकीय स्थानों तरफ जाने के प्रस्ताव से सहमत और समर्थन में था।
पारुल बोल उठी- ओके। अंकलजी आप ही बताओ........... इज इट गुड ट्रिप फॉर अवर एज?
मैंने बच्चों से पूछा तुम हिमालय व गंगा के बारे में क्या जानते हो? क्या कभी तुमने वह इलाका देखा है?
 वे बोले ''इलाका क्या होता है?"
 मुझे उनके शब्द ज्ञान पर हंसी आ गई। मैं बोला ''हिमालय की वह जगहें जहाँ से होकर गंगा नदी गुजर रही है वह एरिया।
 ओके, ओके...! नहीं हमनें नहीं देखा है। पर किताबों में पढ़ा था फिर न्यूज पेपर्स में भी इट इज वेरी डिस्गसिटंग। रिवर गेंजेस इज वेरी पाल्यूटेड विद डेड बाडिज, ऐश एण्ड मेनी मोर पाल्यूषन मेकिंग थिंग्स। वी डोंट बिलीव ट्रीप केन बी नाइस टू दोज़ पाल्यूटेड प्लेसेस। ओ पापा हाऊ केन यू थिंक एन्जायमेंट नियर दिस? नो नो नो ............।
 और हिमालय के बारे में क्या ख्याल है तुम लोगों का? जवाब मिला- ओके देट केन बी गुड प्लेसेस अन्फ़ार्चुनेटली बट एज वी नो देअर आर मेनी लेण्ड स्लाइडस आकर्स?
 मैं बोला ''पर गरमी के मौसम में समुद्र का किनारा चिपचिपा और समुद्री शैवाल यानि फंगस... और मछलियों की उबाऊ गंध भी लिए होता है तो फिर घर पर ही रहना ठीक रहेगा........
 नो नो नो समवेत स्वर गुंजा।
 ....... तो फिर....... किसी रिश्तेदार के यहाँ पर जाना कैसा रहेगा?
 अरे अंकलजी कोई ठीक बात करो न। आप तो ट्रिप ही केंसल करा दोगे इस तरह से। शिकायती लहजा गुंजा।
 चलो फिर तुम ही बताओं कहाँ और कैसे छुटिटयाँ मनाना पसंद करोगे? पिता ने सवाल दागा।
परिधि बोली -  इट शूड बी ब्यूटिफुल प्लेस विथ कोल्ड क्लाइमेट वी थिंक। सो वेदर वाइज हिमालया इज़ गुड एण्ड कम्फर्टेबल। पारुल के चहरे पर भी सहमति के भाव विद्यमान थे, वो हल्का सा मुस्कुरा भी रही थी।
मै  बोला- मैं सोच रहा हूँ बच्चियों कि धार्मिक स्थल की वजह से तुम्हारा ''कान्वेन्टी सोच" तुम्हें रोक रहा है। है न? लेकिन अभी तुमने वो जगह देखी नहीं है। जाओ जाकर देखो फिर लौटकर बताना। वैसे तुम्हें बता दूं कि रिवर बोटिंग व राफ्टिंग को तुम करोगे तो मजा आएगा साथ ही ट्रेकिंग और प्रकृति का आनंद भी तुम्हें जरूर आएगा। वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, फिर टेन्ट में रुकने का मजा भी वहां ले पाओगे. एक बात और भी की वहां जाने से तुम्हे पेड़ो का महत्व भी समझ में आने लगेगा और आधुनिकता की दौड़ से हो रहे नुक्सान को भी तुम समझ पाओगे.
 बच्चे जब वापस लौटे तो उनके मिलने गया। यात्रा का वृतांत सुनाते वे थक नहीं रहे थे। लैपटाप पर विडियो और फोटोग्राफी के दृष्यों के साथ अपने संस्मरण सुनाते चले गए व्हाट अ ग्रीन वेली अंकल! ब्यूटिफुल ब्लू कलर्ड गंगा रिवर मार्वलस। येस वी डिड रिवर राफिटंग....... देट वाज़  मार्वलस एंड अ नाइस एक्सपिरियंस। या फ्रेंडली क्लाइमेट ठू। थेंक्यू अंकल वी रिअली एन्जाइड द ट्रिप। आपने ठीक ही कहा था, लैंड स्लाइड्स की वजह पेड़ों की कटाई ही है और नदी में कई जगहें पानी के साथ बह कर आई पहाड़ी चट्टानों, मिटटी और रेत के कारण से उभर आई है, नदी उथली हो गई है कई जगह बने बाँध इस बही मिटटी और चट्टानों के कारण गले गले तक भर गए हैं जो विकास के चलते विनाश को बताते है. पेड़ कितने महत्वपूर्ण हैं ये हमारी समझ में आ गया है, हम इस बार पेड़ बनने के लिए पौधे  लगायेंगे.
 और धर्मस्थलों के बारे में क्या? मैने पूछा
 दादी टोल्ड मेनी टेल्स देन वी कनविंस्ड द स्पिरिचुआलिटी। इट इज रियली गुड हेरिटेज फॉर अस।
 मैं अपने देश के इन अंग्रेजों के शब्दों में समझ पाया कि भाषा भले ही बदल जाए। संस्कारवान तो उन्हें पुरखों के किस्से और हमारे सांस्कृतिक महत्व के धर्मस्थलों का प्रभाव ही बना सकता है। और पर्यटन है कि उन्हें अनुभव की किताबें समझा सकता है। मुझे उनकी बातो में झलक कर निकल एक नारा भी मिला जो था " पेड़ बनने के लिए करें पौधारोपण "

राजेश  घोटीकर
6, एल.आय.जी. 'बी
जवाहर नगर, रतलाम (म.प्र.)
98273-40835

भारतीय अंग्रेजो की ग्रीष्म यात्रा 

रविवार, 14 अप्रैल 2013

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

डे विद इणिडयन इंग्लिश


डे विद इणिडयन इंग्लिश
गरमी के दिन आते है फिर स्कूलो की छुटिटया षुरू हो जाती है घर से बाहर दिन की धूप में लू लगने का डर, रात में मच्छरों के हमले। हा एक बात जरूर होती है कि इन उकताहट भरे दिनों में किसी ठण्डे स्थान की याद आती है।
ष्षादियों के दौर भी इन छुटिटयों में सर्वाधिक होते है। क्या करे, क्या न करें के सुझाव। षीतलपेय,कुल्फी,आर्इस्क्रीम,तरबूज,खरबूज,आम,कच्चीकैरी का पन्ना,लिकिवड फुड,श्रीखण्ड, लस्सी,करौदे,खजूर,इमली,षहतूत,खिरनी और न जाने क्या क्या। सुगंधित, खुषबूदार, मीठास से भरे चटपटे और खटटे मीठे स्वाद। क्या कहना इस ऋतु के खानपान का तब भी सुरम्य प्रकृति की गोद, हरे भरे बगीचे, रिष्तेदारो की मस्ती के बीच पर्यटन का अपना ही अलग मजा है।
तपता रेगिस्तान, उभस भरे समुद्री किनारे, सूखे खेतो  के बीच से निकलकर हर कोर्इ घने जंगल, हरे भरे पहाड, झरने, झील और बर्फीले स्थान के लिए उधत होकर जाना चाहता है।
दुनिया के कितने ही स्थान हम या आप सुनते रहे तब फिर भी वहा जब तक चले नही जाते मनोमसितष्क में छाया, सुना सुनाया अजूबा हमें वहा जाने को भीतर तक प्रेरित करता रहता है। किसी जगह जाकर आने के बाद वहा की स्मृति को संजोकर अपनी मित्र मण्डली को सुनाना। क्या किया, कहा गए, कहा ठहरे, क्या क्या देखा, क्या क्या सीखा, और कितना खर्च किया आदि अनेक तथ्य पर्यटन के साथ साथ हमारे दिमाग को उद्वेलित करते है।
पर्यटन के साथ हमें संस्कृति, सभ्यता, बोली, भाषाए और स्थानीय व्यवहारों तथा रिवाजो का अनुभव मिलता है। किताबों और कोर्स में पढे लिखेें अध्यायो से दूर जीवन की खुली किताबें, अचरजकारी दृष्यों का हमारा पिटारा जो अनेक माहितियों से भरा होता है हमारे अपने मित्रो मेें एक अलग धाक भी पैदा करता है।
पर्यटन स्थलों पर विरासत के अपने अलग चिन्ह स्थापित है जिनमें पुराने किले, महल, छतरिया आदि राजचिन्ह है। गुफाए, मंदिर वास्तुकला के धार्मिक मनोहर वृत्तांत। इन सभी बातो को मन में टटोलते, वन्य जीवन और विभिन्न तरह की यात्राओं के फेेरे अनुभव और ज्ञान में वृद्वि करते है। खोजी मानसिकता से रोमांचकारी स्थलों का चयन नही साहसिक यात्राओं की पृष्ठभूमि है तो अब तक एक समूह में संपूर्ण सुविधा के साथ टुर सुरक्षित यात्राओं का विचार । चलिए यात्राओं की तैयारी के सफर पर आधुनिक बच्चों के साथ

''भारतीय अंग्रेज और हमारी धरोहरें
दिस होलीडेज़ व्हेअर वी आर गोर्इंग पापा? बच्ची ने अपने पिताजी से पूछा।
योर ''दादी वाण्टस टू गो सम आफ द पिलग्रीम प्लेसेस सो रार्इट नाऊ वी आर प्लानिंग टू विजिट देअर। आल्सो योर माम सेज़ विद दिस तुम्हारा कल्चरल नालेज, इंडियन लार्इफ स्टार्इल वेल्यू और हिस्ट्री इंक्रीज हो जाएगी।
ओफ! से बोरिंग....... दादी को बोलिए न कहीं सी-शोर पर चलते है। प्लीज पापा ये मंदिर वंदिर रहने दो न। बहुत गंदा है ये सब। कितना क्राउड रहता है, फिर गंदे लोग, लंबी लार्इने और बेगर्स भी। कुछ और प्लनिंग करो न प्लीज़।
बट बेटे वी आर प्लानिंग अवर समर होलीडेज एट हिलटाप कूल नार्थइंडियन प्लेसेस.....ऋषिकेष, केदारनाथ एटसेट्रा। यू विल डेफिनेटली एन्जाय गेंजेस रिवर वेली। बहुत हरा भरा है। तुम अंकलजी से पूछ लो।
मैं अभी तक यह संवाद चुपचाप सुन रहा था। मेरा सिर इन सिरफिरें ''कान्वेंटी संवाद से चकराने लगा था। पर अब इस मसले में मुझे भी शामिल कर लिया गया तो एक जिम्मेदारी सी आ गर्इ थी मुझ पर। मैंने पूछा कि ''बच्चों की दादी केदारनाथ जैसी विकट चढ़ार्इ का सफर करने योग्य हैं क्या?
जवाब मिला - अरे भार्इ! मेरी माँ अभी मुझसे भी जवान है सेहत के मामले में। सवेरे चार बजे उठकर मार्निंग वाक, योगा और ब्रेदिंग एक्सरसार्इज रेग्यूलर करती हैं। मुझे तकलीफ हो सकती हैं मगर वे एकदम फौलाद की रखी हैं मानों।
पहली बार इन सज्जन के दफ्तर में आया था। बाकी के लोगों को जानता तक नहीं था। उनकी बात से समझ पाया कि कठिन परिश्रमी हैं उनकी माताजी।
वे बोलते चले गए, मैं सोचता चला गया। अभी बस यही पर्वतीय तीर्थ स्थल उनके शरीर और स्वास्थ्य के रहते करा दिए जाने चाहिए थे फिर बुढ़ापे का क्या भरोसा? बचे चारों धामों में से अन्यत्र इतनी कठिनार्इ भी नहीं थी। मैंने पूछा और आपके पिताजी क्या वे जा पाएंगे?
वे तो कभी घर छोड़ने तक को तैयार नहीं होते हैं यार जाना तो माँ को है और अब उनके साथ उनकी बहू भी रजामंद है यानि मेरी श्रीमति और तुम्हारी भाभी। मुझे तो कोर्इ फर्क नहीं पड़ता कहीं जाओ न जाओ।
बचिचयाँ बोल उठी- ओके। अंकलजी आप ही बताओ........... इज इट गुड टि्रप फार अवर एज?
मेरे पास परिसिथतियाँ जानने या समझने का समय नहीं था और षिक्षा से अंगरेज हो चले इन बच्चों को अपनी संस्कृति समझा कर भारतीय मूल्यों की रक्षा किए जाने का दायित्व जान पड़ा।
किसी के दफ्तर में इस प्रकार की बात हो जाएगी और मैं उनके पारिवारिक मसले में शामिल कर लिया जाउंगा समझ से परे था। मैं पसोपेष में पड़ गया। मैंने बच्चों से पूछा तुम हिमालय व गंगा के बारे में क्या जानते हो? क्या कभी तुमने वह इलाका देखा है?
वे बोले ''इलाका क्या होता है?
मुझे उनके शब्द ज्ञान पर हंसी आ गर्इ। मैं बोला ''हिमालय की वह जगहें जहाँ से होकर गंगा नदी गुजर रही है वह एरिया।
ओके, ओके...! नहीं हमनें नहीं देखा है। पर किताबों में पढ़ा था फिर न्यूज पेपर्स में भी इट इज वेरी डिस्गसिटंग। रिवर गेंजेस इज वेरी पाल्यूटेड विद डेड बाडिज, ऐष एण्ड मेनी मोर पाल्यूषन मेकिंग थिंग्स। वी डोंट बिलीव ट्रीप केन बी नार्इस टू दोज़ पाल्यूटेड प्लेसेस। ओ पापा हाऊ केन यू थिंक एन्जायमेंट नियर दिस? नो नो नो ............।
और हिमालय के बारे में क्या ख्याल है तुम लोगों का? जवाब मिला- ओके देट केन बी गुड प्लेसेस अनफाचर्ुनेटली बट एज वी नो देअर आर मेनी लेण्ड स्लार्इडस आकर्स?
मैं बोला ''पर गरमी के मौसम में समुद्र का किनारा चिपचिपा और समुद्री शैवाल की गंध लिए होता है तो फिर घर पर ही रहना ठीक रहेगा....... समुद्री शैवाल यानि फंगस....
नो नो नो समवेत स्वर गुंजा।
....... तो फिर....... किसी रिष्तेदार के यहाँ पर जाना कैसा रहेगा?
अरे अंकलजी कोर्इ ठीक बात करो न। आप तो टि्रप ही केंसल करा दोगे इस तरह से
चलो फिर तुम ही बताओं कहाँ और कैसे छुटिटयाँ मनाना पसंद करोगे? पिता का सवाल गुंजा।
इट शूड बी ब्यूटिफुल प्लेस विथ कोल्ड क्लार्इमेट वी थिंक। सो वेदर वाइज हिमालया इज़ गुड एण्ड कम्फर्टेबल।
मैं सोच रहा हूँ बचिचयों कि धार्मिक स्थल की वजह से तुम्हारा ''कान्वेन्टी सोच तुम्हें रोक रहा है। है न? लेकिन अभी तुमने वो जगह देखी नहीं है। जाओ जाकर देखो फिर लौटकर बताना। वैसे तुम्हें बता दूं कि रिवर वोटिंग व राफिटंग को तुम करोगे तो मजा आएगा साथ ही ट्रेकिंग और प्रकृति का आनंद भी तुम्हें जरूर आएगा।
बच्चे जब वापस लौटे तो उनके मिलने गया। यात्रा का वृतांत सुनाते वे थक नहीं रहे थे। लैपटाप पर विडिया और फोटोग्राफी के दृष्यों के साथ अपने संस्मरण सुनाते चले गए व्हाट अ ग्रीन वेली अंकल! ब्यूटिफुल ब्लू कलर्ड गंगा रिवर मार्वलस। येस वी डिड रिवर राफिटंग....... देट वाज अ नार्इस एक्सपिरियंस। या फेंडली क्लार्इमेट ठू। थेंक्यू अंकल वी रिअली एन्जाइड द टि्रप।
और धर्मस्थलों के बारे में क्या? मैने पूछा
दादी टोल्ड मेनी टेल्स देन वी कनिवंस्ड द सिपरिच्युआलिटी। इट इज रियली गुड हेरिटेज फार अस।
मैं अपने देष के इन अंग्रेजों के शब्दों में समझ पाया कि भाषा भले ही बदल जाए। संस्कारवान तो उन्हें पुरखों के किस्से और हमारे सांस्कृतिक महत्व के धर्मस्थलों का प्रभाव ही बना सकता है। और पर्यटन है कि उन्हें अनुभव की किताबें समझा सकता है।

राजेष घोटीकर
6, एल.आय.जी. 'बी
जवाहर नगर, रतलाम (म.प्र.)
98273-40835े


बुधवार, 10 अप्रैल 2013