शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

डे विद इणिडयन इंग्लिश


डे विद इणिडयन इंग्लिश
गरमी के दिन आते है फिर स्कूलो की छुटिटया षुरू हो जाती है घर से बाहर दिन की धूप में लू लगने का डर, रात में मच्छरों के हमले। हा एक बात जरूर होती है कि इन उकताहट भरे दिनों में किसी ठण्डे स्थान की याद आती है।
ष्षादियों के दौर भी इन छुटिटयों में सर्वाधिक होते है। क्या करे, क्या न करें के सुझाव। षीतलपेय,कुल्फी,आर्इस्क्रीम,तरबूज,खरबूज,आम,कच्चीकैरी का पन्ना,लिकिवड फुड,श्रीखण्ड, लस्सी,करौदे,खजूर,इमली,षहतूत,खिरनी और न जाने क्या क्या। सुगंधित, खुषबूदार, मीठास से भरे चटपटे और खटटे मीठे स्वाद। क्या कहना इस ऋतु के खानपान का तब भी सुरम्य प्रकृति की गोद, हरे भरे बगीचे, रिष्तेदारो की मस्ती के बीच पर्यटन का अपना ही अलग मजा है।
तपता रेगिस्तान, उभस भरे समुद्री किनारे, सूखे खेतो  के बीच से निकलकर हर कोर्इ घने जंगल, हरे भरे पहाड, झरने, झील और बर्फीले स्थान के लिए उधत होकर जाना चाहता है।
दुनिया के कितने ही स्थान हम या आप सुनते रहे तब फिर भी वहा जब तक चले नही जाते मनोमसितष्क में छाया, सुना सुनाया अजूबा हमें वहा जाने को भीतर तक प्रेरित करता रहता है। किसी जगह जाकर आने के बाद वहा की स्मृति को संजोकर अपनी मित्र मण्डली को सुनाना। क्या किया, कहा गए, कहा ठहरे, क्या क्या देखा, क्या क्या सीखा, और कितना खर्च किया आदि अनेक तथ्य पर्यटन के साथ साथ हमारे दिमाग को उद्वेलित करते है।
पर्यटन के साथ हमें संस्कृति, सभ्यता, बोली, भाषाए और स्थानीय व्यवहारों तथा रिवाजो का अनुभव मिलता है। किताबों और कोर्स में पढे लिखेें अध्यायो से दूर जीवन की खुली किताबें, अचरजकारी दृष्यों का हमारा पिटारा जो अनेक माहितियों से भरा होता है हमारे अपने मित्रो मेें एक अलग धाक भी पैदा करता है।
पर्यटन स्थलों पर विरासत के अपने अलग चिन्ह स्थापित है जिनमें पुराने किले, महल, छतरिया आदि राजचिन्ह है। गुफाए, मंदिर वास्तुकला के धार्मिक मनोहर वृत्तांत। इन सभी बातो को मन में टटोलते, वन्य जीवन और विभिन्न तरह की यात्राओं के फेेरे अनुभव और ज्ञान में वृद्वि करते है। खोजी मानसिकता से रोमांचकारी स्थलों का चयन नही साहसिक यात्राओं की पृष्ठभूमि है तो अब तक एक समूह में संपूर्ण सुविधा के साथ टुर सुरक्षित यात्राओं का विचार । चलिए यात्राओं की तैयारी के सफर पर आधुनिक बच्चों के साथ

''भारतीय अंग्रेज और हमारी धरोहरें
दिस होलीडेज़ व्हेअर वी आर गोर्इंग पापा? बच्ची ने अपने पिताजी से पूछा।
योर ''दादी वाण्टस टू गो सम आफ द पिलग्रीम प्लेसेस सो रार्इट नाऊ वी आर प्लानिंग टू विजिट देअर। आल्सो योर माम सेज़ विद दिस तुम्हारा कल्चरल नालेज, इंडियन लार्इफ स्टार्इल वेल्यू और हिस्ट्री इंक्रीज हो जाएगी।
ओफ! से बोरिंग....... दादी को बोलिए न कहीं सी-शोर पर चलते है। प्लीज पापा ये मंदिर वंदिर रहने दो न। बहुत गंदा है ये सब। कितना क्राउड रहता है, फिर गंदे लोग, लंबी लार्इने और बेगर्स भी। कुछ और प्लनिंग करो न प्लीज़।
बट बेटे वी आर प्लानिंग अवर समर होलीडेज एट हिलटाप कूल नार्थइंडियन प्लेसेस.....ऋषिकेष, केदारनाथ एटसेट्रा। यू विल डेफिनेटली एन्जाय गेंजेस रिवर वेली। बहुत हरा भरा है। तुम अंकलजी से पूछ लो।
मैं अभी तक यह संवाद चुपचाप सुन रहा था। मेरा सिर इन सिरफिरें ''कान्वेंटी संवाद से चकराने लगा था। पर अब इस मसले में मुझे भी शामिल कर लिया गया तो एक जिम्मेदारी सी आ गर्इ थी मुझ पर। मैंने पूछा कि ''बच्चों की दादी केदारनाथ जैसी विकट चढ़ार्इ का सफर करने योग्य हैं क्या?
जवाब मिला - अरे भार्इ! मेरी माँ अभी मुझसे भी जवान है सेहत के मामले में। सवेरे चार बजे उठकर मार्निंग वाक, योगा और ब्रेदिंग एक्सरसार्इज रेग्यूलर करती हैं। मुझे तकलीफ हो सकती हैं मगर वे एकदम फौलाद की रखी हैं मानों।
पहली बार इन सज्जन के दफ्तर में आया था। बाकी के लोगों को जानता तक नहीं था। उनकी बात से समझ पाया कि कठिन परिश्रमी हैं उनकी माताजी।
वे बोलते चले गए, मैं सोचता चला गया। अभी बस यही पर्वतीय तीर्थ स्थल उनके शरीर और स्वास्थ्य के रहते करा दिए जाने चाहिए थे फिर बुढ़ापे का क्या भरोसा? बचे चारों धामों में से अन्यत्र इतनी कठिनार्इ भी नहीं थी। मैंने पूछा और आपके पिताजी क्या वे जा पाएंगे?
वे तो कभी घर छोड़ने तक को तैयार नहीं होते हैं यार जाना तो माँ को है और अब उनके साथ उनकी बहू भी रजामंद है यानि मेरी श्रीमति और तुम्हारी भाभी। मुझे तो कोर्इ फर्क नहीं पड़ता कहीं जाओ न जाओ।
बचिचयाँ बोल उठी- ओके। अंकलजी आप ही बताओ........... इज इट गुड टि्रप फार अवर एज?
मेरे पास परिसिथतियाँ जानने या समझने का समय नहीं था और षिक्षा से अंगरेज हो चले इन बच्चों को अपनी संस्कृति समझा कर भारतीय मूल्यों की रक्षा किए जाने का दायित्व जान पड़ा।
किसी के दफ्तर में इस प्रकार की बात हो जाएगी और मैं उनके पारिवारिक मसले में शामिल कर लिया जाउंगा समझ से परे था। मैं पसोपेष में पड़ गया। मैंने बच्चों से पूछा तुम हिमालय व गंगा के बारे में क्या जानते हो? क्या कभी तुमने वह इलाका देखा है?
वे बोले ''इलाका क्या होता है?
मुझे उनके शब्द ज्ञान पर हंसी आ गर्इ। मैं बोला ''हिमालय की वह जगहें जहाँ से होकर गंगा नदी गुजर रही है वह एरिया।
ओके, ओके...! नहीं हमनें नहीं देखा है। पर किताबों में पढ़ा था फिर न्यूज पेपर्स में भी इट इज वेरी डिस्गसिटंग। रिवर गेंजेस इज वेरी पाल्यूटेड विद डेड बाडिज, ऐष एण्ड मेनी मोर पाल्यूषन मेकिंग थिंग्स। वी डोंट बिलीव ट्रीप केन बी नार्इस टू दोज़ पाल्यूटेड प्लेसेस। ओ पापा हाऊ केन यू थिंक एन्जायमेंट नियर दिस? नो नो नो ............।
और हिमालय के बारे में क्या ख्याल है तुम लोगों का? जवाब मिला- ओके देट केन बी गुड प्लेसेस अनफाचर्ुनेटली बट एज वी नो देअर आर मेनी लेण्ड स्लार्इडस आकर्स?
मैं बोला ''पर गरमी के मौसम में समुद्र का किनारा चिपचिपा और समुद्री शैवाल की गंध लिए होता है तो फिर घर पर ही रहना ठीक रहेगा....... समुद्री शैवाल यानि फंगस....
नो नो नो समवेत स्वर गुंजा।
....... तो फिर....... किसी रिष्तेदार के यहाँ पर जाना कैसा रहेगा?
अरे अंकलजी कोर्इ ठीक बात करो न। आप तो टि्रप ही केंसल करा दोगे इस तरह से
चलो फिर तुम ही बताओं कहाँ और कैसे छुटिटयाँ मनाना पसंद करोगे? पिता का सवाल गुंजा।
इट शूड बी ब्यूटिफुल प्लेस विथ कोल्ड क्लार्इमेट वी थिंक। सो वेदर वाइज हिमालया इज़ गुड एण्ड कम्फर्टेबल।
मैं सोच रहा हूँ बचिचयों कि धार्मिक स्थल की वजह से तुम्हारा ''कान्वेन्टी सोच तुम्हें रोक रहा है। है न? लेकिन अभी तुमने वो जगह देखी नहीं है। जाओ जाकर देखो फिर लौटकर बताना। वैसे तुम्हें बता दूं कि रिवर वोटिंग व राफिटंग को तुम करोगे तो मजा आएगा साथ ही ट्रेकिंग और प्रकृति का आनंद भी तुम्हें जरूर आएगा।
बच्चे जब वापस लौटे तो उनके मिलने गया। यात्रा का वृतांत सुनाते वे थक नहीं रहे थे। लैपटाप पर विडिया और फोटोग्राफी के दृष्यों के साथ अपने संस्मरण सुनाते चले गए व्हाट अ ग्रीन वेली अंकल! ब्यूटिफुल ब्लू कलर्ड गंगा रिवर मार्वलस। येस वी डिड रिवर राफिटंग....... देट वाज अ नार्इस एक्सपिरियंस। या फेंडली क्लार्इमेट ठू। थेंक्यू अंकल वी रिअली एन्जाइड द टि्रप।
और धर्मस्थलों के बारे में क्या? मैने पूछा
दादी टोल्ड मेनी टेल्स देन वी कनिवंस्ड द सिपरिच्युआलिटी। इट इज रियली गुड हेरिटेज फार अस।
मैं अपने देष के इन अंग्रेजों के शब्दों में समझ पाया कि भाषा भले ही बदल जाए। संस्कारवान तो उन्हें पुरखों के किस्से और हमारे सांस्कृतिक महत्व के धर्मस्थलों का प्रभाव ही बना सकता है। और पर्यटन है कि उन्हें अनुभव की किताबें समझा सकता है।

राजेष घोटीकर
6, एल.आय.जी. 'बी
जवाहर नगर, रतलाम (म.प्र.)
98273-40835े


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