बुधवार, 17 अप्रैल 2013

प्रतिस्पर्धा का महत्व


यात्रा संस्मरण

प्रतिस्पर्धा का महत्व उत्थान को समर्पित है। प्रतिस्पर्धाएँ व्यक्तित्व को निखारती है। शीर्ष स्थान को पा लेने पर प्रसिद्वि और सम्मान आपका दिल खोलकर स्वागत करते है। पंचतंत्र और हितोपदेश के अतिरिक्त विभिन्न देशों  की लोकगाथाएँ नैतिक चरित्र और सूझबूझ को प्रेरणा प्रदान करने में सहायक है। अनेको साहस गाथाएँ  भी है जो मनोबल बढाती है। समाज के ताने बाने में गुंथा इंसान सामाजिक व्यवस्था और साहचर्य के गुणों के साथ जीवन समृद्व बनाता आया है।
प्रतिस्पर्धाएँ जीवन के हर पहलु को स्पर्श करती है। शिक्षा, व्यवसाय, खेल नौकरियां, यहाँ तक कि निर्वाचन भी प्रतिस्पर्धा से लबरेज है।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में हताशा, निराशा, वैमनस्य को रोकने के लिए एक शब्द ''स्पोर्ट्समेनस्पिरिट'' का उपयोग लगातार होता आया है। अब मोबाइल पर एस.एम.एस. की दुनिया में भी मनोबल बढाए जाने के संदेश  का एक नमूना पेश है। वैसे तो श्री श्याम विंचुरकर जी ने मुझे यह महज फारवर्ड किया है। जिसका अनुवादित संदेश इस प्रकार है '' जिंदगी बहुत कुछ बॉक्सिंग रिंग के समान है। जहाँ हार तब घोषित नही की जाती है जब आप गिर जाते है। यह हार तब घोषित होती है। जब उठने से इंकार कर देते है।'' सच ही है ''मन के हारे हार है, मन के जीते जीत''।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में नैतिकता या " स्पोर्टसमेनशिप '' का भाव हमारे वातावरण से नदारद होने लगा है। दूसरों में दोष ढूंढना, खामियाँ निकालना यहाँ तक कि बेइमानी को प्रोत्साहन और सच्चाई पर परदा जैसे अवगुण हमारे जीवन मूल्यों का अंग बनने लगे है तो उपरोक्त मोबाईल संदेश का जवाब देना बनता था। यह लाजमी भी था, सो जवाब बनाया, जिसका अर्थ इस प्रकार अभिव्यक्त होता है - ''शतरंज के खेल में राजा पर शह और उसके बच न पाने की सूरत में ही हार नही होती, यह तब भी मात होती है, जब राजा या शेष अन्य सैनिकों के पास चलने को कोई चाल नही बचती। सिर्फ बॉक्सिंग रिंग में गिरकर उठ खडे न होने की दशा से जीवन का मूल्य प्रस्तुत नही किया जा सकता, क्योंकि यह खेल के स्वरूप में उसी प्रकार बदलती है जो खेल आप खेलते हैं और यह भी अनथक सत्य है कि प्रेम हमेशा विजयी होता है।''
जीवन के मूल्यों में प्रेम की शाश्वतता को नकारा नही जा सकता है। अभी एक ताजातरीन संस्मरण याद आया जो धनुर्विद्या अर्थात ''आर्चरी '' से जुडा है। जो खेलती प्रतिस्पर्धी टीमों के मध्य प्रेममय स्पोर्टसमेनशिप का अनोखा स्पर्श और खुशबु बिखेर रहा है। खेलभावना की नैतिक पराकाष्ठा को छूता यह प्रसंग मुझे हमारी पूर्वात्तरी सीमा पर स्थित भूटान देश के प्रवेश नगर फुन्त्शोलिंग के समीप अनुभव हुआ है। भूटान में विगत जनवरी 2012 में तुषार कोठारी, आशुतोष नवाल, संतोष त्रिपाठी और नरेन्द्र शर्मा के साथ यात्रा का कार्यक्रम संपन्न हुआ है। 2, 3 और 4 जनवरी को इस त्यौहार को मनाए जाने की वजह से यहाँ समस्त शासकीय कार्यालयों में अवकाश भी घोषित था। '' त्रोंग्सा त्सेचु'' Trongsa Tsechu  नामक यह पर्व '' त्रोंग्सा '' नामक स्थान पर मनाए जाने की वजह से '' त्रोंग्सा त्सेचु'' कहा जा रहा था। धार्मिक प्रार्थना, परिक्रमा के सार्वजनिक स्वरूप् में ''त्सेचु'' संपूर्ण देश भर  मे मनाया जा रहा था। फुंत्शोलिंग में प्रवेश के पूर्व से ही इस पर्व के बारे में ज्ञात था, परन्तु अवकाश के बारे में यहीं आकर ज्ञात हुआ। ''त्सेचु'' के अवकाश की वजह से शासकीय अधिकारियों का एक दल पहाडी वादियों में तीरदांजी खेलते और पिकनिक मनाते मिला।
ऊँचे बाँस पर खडी लटकाई पताकाओं से घिरा प्रांगण देखकर जानकारी लेना चाही। गाडी मै ड्राईव कर रहा था तो रूकती गाडी की वजह सभी ने पूछी। मैने उन्हे कहा पीछे '' गोम्फा '' के बारे में लोग कह रहे थे, तो यहाँ जो लोग खडे है इनसे पूछ लेते है। उतरकर कच्ची पगडंडी से नीचे उतरते रास्ते पर आगे बढा तो यहाँ हाथों में धनुष बाण लेकर नृत्य कर रहे लोगो को देखकर मै ठिठका। मुझे थोडी देर तक इस प्रकार के नृत्य करने का तात्पर्य समझ में नही आया। नृत्य और गीत की समाप्ती पर "वोहो वोहो वोहोहो हो" कर हाथ ऊँचे किए गए और लक्ष्य में धंसे तीर को जो नीले रंग के बाहरी सर्कल में लगा था, खींचकर निकाला गया और लक्ष्य के पास करीने से लटकाए गए नीले रंग के दुपटटे को उचका कर छोडा दिया गया। फिर इसी कोने पर खडे एक धनुर्धर ने बाण उठाकर प्रत्यंचा पर तान लगाई तो मरी निगाह में सामने दूर पहाडी समतल पर खडी टीम नजर आई। उस टीम के पास (मेरी निगाह से) से बायी और दो टेबलें लगी थी और दाहिनी तरफ एक समूह नृत्य कर रहा था। महिला पुरूष इसमें एक गोल घेरा बनाकर नाच रहे थे।
मैं अपनी बायी तरफ की कच्ची पगडंडी पर नीचे उतरने लगा और बाकी सभी को गाड़ी से नीचे आने की हिदायत दी। कमर पर लगे पाउच से कैमेरा निकाल कर मैं आगे बढ़ा था और इस तरफ हो चुके इस नृत्य को कैमरे में संजो चुका था। आगे ऊँचे नीचे चलते पगडंडी के उस पार हो रही गतिविधि ने मुझे वहाँ पहुंचने को मजबूर कर दिया। मैं वहाँ का जायजा लेने चल पड़ा तो नरेन्द्र मेरे साथ हो लिया, जबकि तुषार, आशुतोष और संतोष गाड़ी से नीचे उतर आए थे। हम सभी इस आयोजन का आनंद लेने लगे। रास्ते में आते कुछ धनुर्धारी मिले उनके फोटोग्राफ बनाकर आगे बढ़े। नीचे उतरती पहाड़ी के नीचे नजर आते मकानों से कुत्तों के भौंकने की आवाजें गुंजने लगी। मैं दूसरी ओर की पहाड़ी पर चढ़ रहा था। बाई ओर संकरे रास्ते पर रखे पत्थर से गुजरता हुआ अब दाई तरफ घुमा तो वहाँ मेरी दाई  तरफ शराब की छोटी स्टाल बनाई  गई  थी और उसके आगे रस्ते के पार सामने की ओर कपड़े रखे गए थे। मैं नृत्य कर रहे समूह की तरफ तेजी से बढ़ा तो बीच में धनुर्धरों की दूसरी टीम लक्ष्य के पास खड़ी थी और यहाँ से तीर चलाया जा रहा था उस छोर पर, जहाँ से मैं चला था।
नृत्य किसी गीत को गाते हुए किया जा रहा था। पास में भूटानी स्थानीय वाद्ययंत्र रखे हुए थे। इस दृष्य का विडियो बनाकर मैं तीरदांजों के बीच पहुँचा।
उनके बताए अनुसार यहाँ बारह-बारह सदस्यों की दो टीमें बनाई गई थी। ओलिम्पिक खेलों में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक धनुष और बाण से इनमें प्रतियोगिता हो रही थी। प्रत्येक तीरंदाज को बारह मौके लक्ष्य बींधने के मिलने की बात बताई गई । लक्ष्य सफेद रंग का एक पटिया था जो भीतर से बाहर की तरफ क्रमश: सफेद, लाल, पीला, हरा और नीले रंग के सर्कल में पुता था। लक्ष्य के दोनों और बाँस खड़े किए गए थे जिस पर दुपटटेनुमा कपड़े लटके थे। जमीन से ढ़ाई फुट की ऊँचाई पर दोनों ओर जिस प्रकार भीतर से बाहर लक्ष्य पर रंग पुते थे उन्हीं रंगों का संयोजन दुपट्टों द्वारा व्यक्त किया गया था। आगे और पीछे लम्बे ऊँचे बाँस बांधकर पताकाएँ लटका दी गई थी ताकि जब तीर इस छोर पर चलाया जाए तो यह सीमा के स्वरूप में अभिव्यक्त हो। दोनों रखे गए लक्ष्यों के मध्य अनुमानित दूरी कोई डेढ़ सौ मीटर थी। सभी उपसिथति लोग शराब पी रहे थे और आनंद मना रहे थे। नशे की अवस्था में तीर चलाकर वे मानों अपना मानसिक नियंत्रण भी आजमा रहे मालूम होते थे। प्रत्येंक खिलाडी अपना अवसर आने पर निशाना साधता और तीर चलाता। निशाना सही लगने की दशा में खिलाड़ी स्वयं ही नृत्य करते थे, यहाँ कोई चीयर लीडर्स नही थे। निशाना लक्ष्य पर बने जिस किसी रंग के गोले पर लगता उसी रंग का कपडा उसे पास बने कपडें की स्टाल से, जो स्कोर टेबल था असल  में, सम्मान प्रदान कर कमर पर बेल्ट से लटका दिया जाता। असल मे नृत्य - गान निशाने के सटीक लगने का सम्मान था और दूर दूसरी पहाडी पर बने केन्द्र पर खडे लोगो को यह सूचना प्रदान करता था।
अंपायरिंग की जरूरत यहाँ नही थी और स्कोरर को भी खिलाडी ही जाकर सूचना दे देते थे। अपनी पदक पटिटयाँ लेने तीरंदाज का छोर बदलना पडता था। दोनों प्रतिस्पर्धी टीमें सम्मानपूर्वक ईमानदारी से खेल रही थी। तकनीक, खेल, आधुनिकता और नशे में मानसिक नियंत्रण के अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी का सम्मान, नृत्यगान और पदक पटटी का दिया जाना मुझे एक सुदृढ अनुशासन प्रतीत हुआ।
मुझे अपना बचपन याद आ गया जब पतंग की डोर और बाँस की सलाई से धनुष बनाते फिर दीवार पर गोल  निशान बनाकर लक्ष्य पर फुलझाडू की डंडी के बने बाण चलाते। छोटी-छोटी सी बातों पर लडा करते। निशाना झूठा बताकर चिढाते। कई तरह की बेईमानियाँ किया करते। लडाई इतनी उग्र हो जाती कि एक दूसरे के धनुष बाण तोड दिया करते। कई बार तो बडों को भी हमारी लडाई में आना पडता। मार भी पडती। हमारे आँसू पोछने के लिए रंग बिरंगे  काग़ज से सजे धनुष बाण लाए जातें नए सुंदर धनुष से शत्रुपक्ष को चिढाया जाता था। एक बार पुन: लडाई की संभावना बढ जाती थी।
भानजे अभिमन्यू की मांग पर मुझे झाबुआ जिले के आदिवासी क्षेत्र में प्रचलित धनुष-बाण खरीदकर उसे देना पडा था। उसकी अपनी ऊँचाई से दुगुना बडा धनुष जिसकी प्रत्यंचा चढानं कठिन काम भी है, पाकर उसकी देखने लायक खुशी याद आ रही थी। अब इस यात्रा की बात उसे बताई तो उसने भूटान की करेंसी, क्वाईन की मांग रखी जो मैं लेकर वापस आया हूं। वापसी पर तीरंदाजी की बात बताई तो उसने शराब पीने की बात पर आश्चर्य व्यक्त किया। वह इस बात से खुश था कि बगैर लडे झगडे उत्सव की भांति एक प्राचीन विद्या सहेजी गई  है। मुझे अब किसी खेल को परंपरा की तरह सहेज में राजशाही की उपयोगिता नजर आने लगी। एक कडा अनुशासन और नैतिक मनोबल देखने में जो आया था। बालपन की गलतियाँ और लडाईयाँ तो बरसों का वृतांत है, परन्तु भूटान की खेल प्रवृत्ति में वहाँ कि विरासत की झलक दिखाई दे रही थी। हमारा समृद्व इतिहास धार्मिक मनोवृति और संस्कृति का द्योतक रहा है। भूटान का यह दौरा अब मुझे हमारी वर्तमान व्यवस्था,भ्रष्ट और अमर्यादित होते आचरण से परेशानी दे रहा था। हर बात पर ठिठौली और नीचा दिखाने की मानसिकता का वरण किए हम लोग लोकतंत्र की स्वतंत्रता में कितना गिर रहे है। मैं यह सोचने की विवशता को प्रेरित हो रहा था। दिल कह रहा था काश ! हम भी कडी प्रतिस्पर्धी मानसिकता के बावजूद अनुशासित हों, हमारा नैतिक मनोबल ऊँचा बना रहे।

राजेश घोटीकर
6, एल.आय.जी.बी.
जवाहर नगर रतलाम
मो. 09827340835


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