सोमवार, 15 अप्रैल 2013

अंग्रेज हो रहे भारतीय बच्चो की यात्रा

गरमी के दिन आते है फिर स्कूलो की छुटिटयां शुरू हो जाती है घर से बाहर दिन की धूप में लू लगने का डर, रात में मच्छरों के हमले। हाँ एक बात जरूर होती है कि इन उकताहट भरे दिनों में किसी ठण्डे स्थान की याद जरुर आती है।

शादियों के दौर भी इन छुटिटयों में सर्वाधिक होते है।गर्मी से बचाव के लिए क्या करें, क्या न करें के सुझाव। शीतलपेय,कुल्फी, आइस्क्रीम,तरबूज,खरबूज,आम,कच्चीकैरी का पन्ना,लिकिवड फुड,श्रीखण्ड, लस्सी,करौदे,खजूर,इमली, शहतूत, खिरनी और न जाने क्या क्या सुगंधित, खुशबूदार, मीठास से भरे चटपटे और खटटे मीठे स्वाद। क्या कहना इस ऋतु के खानपान का तब भी सुरम्य प्रकृति की गोद, हरे भरे बगीचे, रिश्तेदारों की मस्ती के बीच पर्यटन का अपना ही अलग मजा है।

 तपता रेगिस्तान, उमस भरे समुद्री किनारे, सूखे खेतो  के बीच से निकलकर हर कोई घने जंगल, हरे भरे पहाड, झरने, झील और पर्वतीय बर्फीले स्थान के लिए उद्यत होकर जाना चाहता है।

दुनिया के कितने ही स्थान हम या आप सुनते रहे हो तब फिर भी वहाँ जब तक चले नही जाते मनोमस्तिष्क में छाया, सुना सुनाया अजूबा हमें वहाँ जाने को भीतर तक प्रेरित करता रहता है। किसी जगह जाकर आने के बाद वहाँ  की स्मृति को संजोकर अपनी मित्र मण्डली को सुनाना। क्या किया, कहाँ गए, कहाँ ठहरे, क्या क्या देखा, क्या क्या सीखा, और कितना खर्च किया आदि अनेक तथ्य पर्यटन के साथ साथ हमारे दिमाग को उद्वेलित करते है।

पर्यटन के साथ हमें संस्कृति, सभ्यता, बोली, भाषाए और स्थानीय व्यवहारों तथा रिवाजो का अनुभव मिलता है। किताबों और कोर्स में पढे लिखे अध्यायो से दूर जीवन की खुली किताबें, अचरजकारी दृष्यों का हमारा पिटारा जो अनेक माहितियों से भरा होता है हमारे अपने मित्रो मे एक अलग धाक भी पैदा करता है।
पर्यटक स्थलों पर विरासत के अपने अलग चिन्ह स्थापित है जिनमें पुराने किले, महल, छतरियां  आदि राजचिन्ह है तो दूसरी तरफ मंदिर आदि वास्तुकला के धार्मिक मनोहर वृत्तांत। इन सभी बातो को मन में टटोलते, वन्य जीवन, प्राकृतिक गुफाओं, झीलों, नदी तटों और विभिन्न तरह की यात्राओं के फेरे, अनुभव और ज्ञान में वृद्वि करते है। खोजी मानसिकता से रोमांचकारी स्थलों का चयन जहाँ साहसिक यात्राओं की पृष्ठभूमि है तो अब एक समूह में संपूर्ण सुविधा के साथ टूर करना सुरक्षित यात्राओं का विचार। चलिए यात्राओं की तैयारी के सफर पर आधुनिक बच्चों के साथ..............

दिस होलीडेज़ व्हेअर वी आर गोइंग पापा? परिधि ने अपने पिताजी से पूछा।
 "योर दादी वाण्टस टू गो सम आफ द पिलग्रीम प्लेसेस सो राइट नाऊ वी आर प्लानिंग टू विजिट देअर." आल्सो योर माँम  सेज़ विद दिस योर कल्चरल नॉलेज, इंडियन लाइफ स्टाइल वेल्यू और हिस्ट्री नॉलेज इंक्रीज हो जाएँगे।
 ओफ! सो बोरिंग....... दादी को बोलिए न कहीं सी-शोर पर चलते है। प्लीज पापा ये मंदिर वंदिर रहने दो न। बहुत गंदा है ये सब। कितना क्राउड रहता है, फिर गंदे लोग, लंबी लाइने और बेगर्स भी। कुछ और प्लनिंग करो न प्लीज़।
 बट बेटे; वी आर प्लानिंग अवर समर होलीडेज एट हिलटाप कूल नार्थ इंडियन प्लेसेस..... यमुनोत्री, गंगोत्री, ऋषिकेष, केदारनाथ,देहरादून, मसूरी, टिहरी, राजाजी व  जिम कोर्बेट नेशनल पार्क एटसेट्रा। यू विल डेफिनेटली एन्जाय गेंजेस रिवर वेली। बहुत हरा भरा है। तुम अंकलजी से पूछ लो।
 मैं अभी तक यह संवाद चुपचाप सुन रहा था। मेरा सिर इन सिरफिरें ''कान्वेंटी संवाद" से चकराने लगा था। पर अब इस मसले में मुझे भी शामिल कर लिया गया तो एक जिम्मेदारी सी आ गई थी मुझ पर। मैंने पूछा कि ''बच्चों की दादी  यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ जैसी विकट चढ़ाई का सफर करने योग्य हैं क्या?
 जवाब मिला - अरे भाई! मेरी माँ अभी मुझसे भी जवान है सेहत के मामले में। सवेरे चार बजे उठकर मार्निंग वाक, योगा और ब्रेदिंग एक्सरसाइज रेग्यूलर करती हैं। मुझे तकलीफ हो सकती हैं मगर वे एकदम फौलाद की रखी हैं मानों।
 पहली बार इन सज्जन के दफ्तर में आया था। बाकी के लोगों को जानता तक नहीं था। उनकी बात से समझ पाया कि कठिन परिश्रमी हैं उनकी माताजी।
 वे बोलते चले गए, मैं सोचता चला गया। अभी बस यही पर्वतीय तीर्थ स्थल उनके शरीर और स्वास्थ्य के रहते करा दिए जाने चाहिए थे फिर बुढ़ापे का क्या भरोसा? बचे चारों धामों में से अन्यत्र इतनी कठिनाई भी नहीं थी। मैंने पूछा और आपके पिताजी क्या वे जा पाएंगे?
 वे तो कभी घर छोड़ने तक को तैयार नहीं होते हैं यार, जाना तो माँ को है और अब उनके साथ उनकी बहू भी रजामंद है यानि मेरी श्रीमति और तुम्हारी भाभी। मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता कहीं जाओ न जाओ।
किसी दफ्तर में इस प्रकार की बात हो जाएगी और मैं उनके पारिवारिक मसले में शामिल कर लिया जाउंगा समझ से परे था। मैं पसोपेश  में पड़ गया। मेरे पास परिस्थितियाँ जानने या समझने का समय नहीं था फिर  शिक्षा से अंगरेज हो चले इन बच्चों को अपनी संस्कृति समझा कर भारतीय मूल्यों की रक्षा किए जाने का दायित्व जान पड़ा।समुद्री इलाके खास तौर पर व्यावसायिक केंद्र तथा पाश्चात्य संस्कृति तथा कॉस्मोपोलिटन कल्चर के लिए प्रसिद्ध हैं तो फिर वहां भारतीय संस्कृति और उसका अध्यात्म कैसे महसूस हो सकता है ? अर्थात ही वहाँ हमारी संस्कृति के दर्शन होना मुश्किल बात है. ऐसे में गंगा नदी का तट अनेक धार्मिक वृत्तांतों से भरा देखा हुआ जानकर मै स्वयं भी अपने मित्र के हिमालय की वादियों के इन धार्मिक और पर्यटकीय स्थानों तरफ जाने के प्रस्ताव से सहमत और समर्थन में था।
पारुल बोल उठी- ओके। अंकलजी आप ही बताओ........... इज इट गुड ट्रिप फॉर अवर एज?
मैंने बच्चों से पूछा तुम हिमालय व गंगा के बारे में क्या जानते हो? क्या कभी तुमने वह इलाका देखा है?
 वे बोले ''इलाका क्या होता है?"
 मुझे उनके शब्द ज्ञान पर हंसी आ गई। मैं बोला ''हिमालय की वह जगहें जहाँ से होकर गंगा नदी गुजर रही है वह एरिया।
 ओके, ओके...! नहीं हमनें नहीं देखा है। पर किताबों में पढ़ा था फिर न्यूज पेपर्स में भी इट इज वेरी डिस्गसिटंग। रिवर गेंजेस इज वेरी पाल्यूटेड विद डेड बाडिज, ऐश एण्ड मेनी मोर पाल्यूषन मेकिंग थिंग्स। वी डोंट बिलीव ट्रीप केन बी नाइस टू दोज़ पाल्यूटेड प्लेसेस। ओ पापा हाऊ केन यू थिंक एन्जायमेंट नियर दिस? नो नो नो ............।
 और हिमालय के बारे में क्या ख्याल है तुम लोगों का? जवाब मिला- ओके देट केन बी गुड प्लेसेस अन्फ़ार्चुनेटली बट एज वी नो देअर आर मेनी लेण्ड स्लाइडस आकर्स?
 मैं बोला ''पर गरमी के मौसम में समुद्र का किनारा चिपचिपा और समुद्री शैवाल यानि फंगस... और मछलियों की उबाऊ गंध भी लिए होता है तो फिर घर पर ही रहना ठीक रहेगा........
 नो नो नो समवेत स्वर गुंजा।
 ....... तो फिर....... किसी रिश्तेदार के यहाँ पर जाना कैसा रहेगा?
 अरे अंकलजी कोई ठीक बात करो न। आप तो ट्रिप ही केंसल करा दोगे इस तरह से। शिकायती लहजा गुंजा।
 चलो फिर तुम ही बताओं कहाँ और कैसे छुटिटयाँ मनाना पसंद करोगे? पिता ने सवाल दागा।
परिधि बोली -  इट शूड बी ब्यूटिफुल प्लेस विथ कोल्ड क्लाइमेट वी थिंक। सो वेदर वाइज हिमालया इज़ गुड एण्ड कम्फर्टेबल। पारुल के चहरे पर भी सहमति के भाव विद्यमान थे, वो हल्का सा मुस्कुरा भी रही थी।
मै  बोला- मैं सोच रहा हूँ बच्चियों कि धार्मिक स्थल की वजह से तुम्हारा ''कान्वेन्टी सोच" तुम्हें रोक रहा है। है न? लेकिन अभी तुमने वो जगह देखी नहीं है। जाओ जाकर देखो फिर लौटकर बताना। वैसे तुम्हें बता दूं कि रिवर बोटिंग व राफ्टिंग को तुम करोगे तो मजा आएगा साथ ही ट्रेकिंग और प्रकृति का आनंद भी तुम्हें जरूर आएगा। वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, फिर टेन्ट में रुकने का मजा भी वहां ले पाओगे. एक बात और भी की वहां जाने से तुम्हे पेड़ो का महत्व भी समझ में आने लगेगा और आधुनिकता की दौड़ से हो रहे नुक्सान को भी तुम समझ पाओगे.
 बच्चे जब वापस लौटे तो उनके मिलने गया। यात्रा का वृतांत सुनाते वे थक नहीं रहे थे। लैपटाप पर विडियो और फोटोग्राफी के दृष्यों के साथ अपने संस्मरण सुनाते चले गए व्हाट अ ग्रीन वेली अंकल! ब्यूटिफुल ब्लू कलर्ड गंगा रिवर मार्वलस। येस वी डिड रिवर राफिटंग....... देट वाज़  मार्वलस एंड अ नाइस एक्सपिरियंस। या फ्रेंडली क्लाइमेट ठू। थेंक्यू अंकल वी रिअली एन्जाइड द ट्रिप। आपने ठीक ही कहा था, लैंड स्लाइड्स की वजह पेड़ों की कटाई ही है और नदी में कई जगहें पानी के साथ बह कर आई पहाड़ी चट्टानों, मिटटी और रेत के कारण से उभर आई है, नदी उथली हो गई है कई जगह बने बाँध इस बही मिटटी और चट्टानों के कारण गले गले तक भर गए हैं जो विकास के चलते विनाश को बताते है. पेड़ कितने महत्वपूर्ण हैं ये हमारी समझ में आ गया है, हम इस बार पेड़ बनने के लिए पौधे  लगायेंगे.
 और धर्मस्थलों के बारे में क्या? मैने पूछा
 दादी टोल्ड मेनी टेल्स देन वी कनविंस्ड द स्पिरिचुआलिटी। इट इज रियली गुड हेरिटेज फॉर अस।
 मैं अपने देश के इन अंग्रेजों के शब्दों में समझ पाया कि भाषा भले ही बदल जाए। संस्कारवान तो उन्हें पुरखों के किस्से और हमारे सांस्कृतिक महत्व के धर्मस्थलों का प्रभाव ही बना सकता है। और पर्यटन है कि उन्हें अनुभव की किताबें समझा सकता है। मुझे उनकी बातो में झलक कर निकल एक नारा भी मिला जो था " पेड़ बनने के लिए करें पौधारोपण "

राजेश  घोटीकर
6, एल.आय.जी. 'बी
जवाहर नगर, रतलाम (म.प्र.)
98273-40835

भारतीय अंग्रेजो की ग्रीष्म यात्रा 

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