बुधवार, 29 मई 2013


मंगलवार, 28 मई 2013

4th day after birth stilt running


chicks camoflage activity


running lapwing



बालिका माता सम्मान की रिपोर्ताज पांचवां स्तम्भ के मई अंक में

देखें  अभिनव कार्यक्रम की झलकी 









बालिका माता सम्मान की रिपोर्ताज
पांचवां स्तम्भ के मई अंक में

साथ ही श्री सेवा संस्थान के मिशन हिमोग्लोबिन पर भी एक नज़र 


सोमवार, 27 मई 2013

running red wetleg lapwing chick


black billed herons



black winged stilt eggs n mother


black winged stilt was found near a pond


growth of Black winged stilt

 Date : 20 May 2013


Date : 21 may 2013



Date : 24 May 2013






Date : 26 May 2013





red welted lapwing








रविवार, 19 मई 2013

शनिवार, 18 मई 2013

Mother's day celebrated






Mother's day celebrated with pregnant anaemic mother's at Shivgarh PHC
30 Mother Treated for anaemia
worst thing was out of them 70% mothers wah having Haemoglobin below 6gm%

शुक्रवार, 17 मई 2013

ॐ श्री सिद्धि विनायक धाम इसरथुनी तीर्थ स्थल बनेगा





इसरथुनी 
पंचमुखी प्रतिमा के कारण ग्राम इसरथुनी में स्थापित ॐ श्री सिद्धि विनायक धाम सारे देश में तीर्थ के रूप में ख्याति प्राप्त करेगा। धर्मालुजनो की निष्ठा से वह दिन भी दूर नहीं जब श्री गणेश अतिशीघ्र अपना परिवार यहाँ बसाएँगे। उक्त बात प पू संत श्री चिदाम्बरानंद जी महाराज ने अपने आशीर्वचनो में कही प्रकृति की गोद में कोलाहल से दूर बन रहे मंदिर तथा परिसर की प्रगति देख कर उन्होंने प्रसन्नता जताई। 
संत श्री के आगमन के अवसर पर भव्य आरती का आयोजन भी किया गया। निर्माण किए जा रहे मुख्य द्वार का शीलापूजन इस अवसर पर संत श्री के कर कमलों से संपन्न हुआ। 
आयोजन की इस बेला में संत श्री का स्वागत एवं आशीर्वाद ॐ श्री सिद्धि विनायक धाम के ओम नारायण शर्मा, राजेश घोटीकर, महेश दुबे, डॉ राधेश्याम सोनी, डॉ ईश्वर पाटीदार,  डॉ राजेश शर्मा, अशोक गंगवाल, सुरेश भालेराव, डॉ मुकुंद वाणी, श्री भट्ट, मनोहर पुजारी एवं बड़ी संख्या में उपस्थित ग्रामीण जनों ने लिया। 

      

शुक्रवार, 3 मई 2013

" लिव इन रिलेशनशिप" पर सामाजिक बहस हो.


पृथ्वी पर मानव जीवन पा लेना श्रेष्ठ माना गया है. जन्म को मानव रूप में पा लेना अनेक पूर्व कर्मों का पुण्य भी कहा गया है. मनुष्य को अपनी समस्त क्रियाएं इस हेतु से इश्वर को समर्पित किए जाने का भाव रखने की सलाह दी गई है. मानव जीवन कठीनता से मिलता है अतः इसकी सार्थकता मोक्ष में है, यह बात अनेको साधू संत और धर्म ग्रन्थ बताते है.
जीवन किस प्रकार जीना चाहिए इसके लिए संस्कारों की रचना की गई है. विश्व भर में संस्कारों की महत्ता का विचार विभिन्न धर्म गर्न्थों में लिखा गया है. जन्म से मृत्यु तक विभिन्न संस्कारों का किया जाना धर्म के आधार पर दर्शित हुआ है.
आप चाहे जिस धर्म के अनुयायी क्यों न हो बच्चे के जन्म  की ख़ुशी का इज़हार करते है फिर बच्चे का नामकरण भी करते है. इसके लिए धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा भी लेते है. एसा कोई धर्म नहीं है जिसमे विवाह को संस्कार रुपी उत्सव के स्वरुप में न मनाया जाता हो. निकाह, मैरेज, शादी इत्यादि विवाह के पर्यायवाची शब्द के रूप में विभिन्न भाषाओं में परिलक्षित होते दीख पड़ते है. अंतिम संस्कार की भी धार्मिक अवधारणा एवं रीतियाँ है ही. अब जब संस्कारों की महत्ता पर कानूनी दृष्टिकोण को आधार बनाते हुए पानी फेरा जाने लगे तब शासक दलों का यह रूख जिसमे क़ानून के मसले में उनका मौन बना रहना है एक चिर परिचित बात है. ऐसे में सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किनके हाथो में होगा यह प्रश्न विचारणीय है.
अब कन्याओं के विवाह और उनकी स्वेच्छाचारिता के बारे में संसद में बड़ी बहस हुई, मिलाप की आयु १८ से घटाने के लिए चर्चा चली. समाज के बड़े वर्ग से विरोध झलका तो अब नया शगूफा जिसमे विवाह व्यवस्था के स्वरुप का विभाजन "" लिव इन रिलेशन" के रूप में चल पडा है. समिति का गठन कर अविवाहित रहते हुए महिला पुरुष संबंधों की चर्या को कानूनी जामा पहनाए जाने की बात उठाने लगी है. समाज जिन संबंधों को नैतिकता की कसौटी पर ठीक नहीं मानता उन्हें अब कानूनी मान्यता से श्रेष्ठता प्रदान किए जाने का प्रयास हुआ है
भारतीय दर्शन की खोज करें तो अनेकों प्रसंग मिलते हैं जिसमे कन्याओं द्वारा अपना वर चुनना एक अधिकार प्रतीत होता है. स्वयंवर के अनेकों किस्से है. शिव धनुष का रामायण कालीन प्रसंग हो या महाभारत कालीन प्रसंग जिसमे उबलते तेल में परछाई देखते हुए मछलीनुमा घुमती आकृति की आँख को निशाना बनाए जाने की शर्त. हमारे देश में विभिन्न श्रेष्ठता को प्रेरित स्वयंवर को समझाती है। सती - शिव विवाह का प्रसंग भी कन्या की मनोगत दशा का उपाख्यान निर्देशित करता है.
चाहे कितने ही काल खंड गुजर गए हों धर्म रुपी बाध्यताओं से संस्कारों को सींचने का काम होता रहा है. देश की आजादी हो चाहे विदेशी आक्रान्ताओं का शासन संस्कारों को मानी स्वरुप में स्वीकार किया जाता रहा है.. अब सेक्युलरिज्म के बाने में संस्कारों को देखा जाए तो समस्त विद्यमान धर्म में कोई भी धर्म विवाह के संस्कार को नकारता नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे अंतिम संस्कार को किए जाने में सबकी आस्था है. चाहे परम्पराएं भिन्न ही हो.
देश विदेश की चर्चा करें फिर पाश्चात्य संस्कृति की, कन्या भ्रूण ह्त्या की श्रुंखला हमारे अतिरिक्त कही अन्य सुनाई नहीं देती। इस तरह की विसंगतियों के लिए क़ानून बनाने पड़े क्योंकि सामाजिक विकृति की ये जड़ रही   है. वैचारिकता में परिवर्तन के लिए इस तरह का क़ानून ठीक लगा। राजा राममोहन रॉय का सती प्रथा के विरुद्ध अलख भी जिस तरह समाज के भीतर व्याप्त बुराई को दूर करने का निश्चय था उसी तरह कन्या भ्रूण हत्याओं से उपजने वाली कुरीतियाँ क़ानून के माध्यम से दूर करने के प्रयासों का स्वागत था। वस्तुतः सती ने जो आत्म दाह किया वह शिव को पतिवरण करने पश्चात अपने पति के सम्मान पर हो रहे आघात के विरुद्ध था न की पति की मृत्यु  पर उसकी चिता में स्वाहा होने का उपक्रम। राधा कृष्ण के प्रसंग का उल्लेख करे तो निश्चल प्रेम को समझने के बजाय महिला पुरुष संबंधों की भाँती देखा जाने का उपक्रम होना भी ठीक प्रतीत नहीं होता है .
अब आज सर्वमान्य विवाह संस्कार जैसी संतोषप्रद व्यवस्था पर " लिव इन रिलेशनशिप" के अपनाए जाने से पैदा होने वाली परिणति को क्यों स्वीकारा जाए इस पर सामाजिक बहस की आवश्यकता है। सामाजिक बहस के बजाय कानूनी बदलाव के लिए समिति गठित की गई है और यह समिति एक असामान्य आचरण को विधिवत व्यवस्था प्रदान करने की तैयारी कर चुकी है।
महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा के नाम पर शोषण किस प्रकार होगा उसकी बुनियाद " लिव इन रिलेशन" का यह क़ानून बनेगा फिर देश के भीतर स्वतन्त्रता स्वच्छंदता को प्राप्त करेगी और बाहुबल और धनबल की पशुवृत्ति में बढ़ोतरी होगी क्योंकि इस प्रकार के अनावश्यक व्यवस्थाओं में विकृति फ़ैलाने के खतरे ही अधिक है. इस बारे में समाज विज्ञानियों की चुप्पी बनी रहना भी ठीक नही…….


राजेश घोटीकर
6 / 16  L I G B
जवाहर नगर
रतलाम म.प्र.