बुधवार, 14 अगस्त 2013

परम्पराओं पर एतराज और संशय क्यों

समाज एक दर्पण है, जिसमे हम अपना अक्स निरंतर देखते रहते है।  कई लोग उस बच्चे के समान नजर आते है जो बड़ा दिखने की उम्मीद में दर्पण पर दाढ़ी मूछें बनाकर अनुमान लगाता है।  कुछ लोग उस चिड़िया की तरह जो अपने ही अक्स को देख दर्पण पर चोंच मारती देखी जाती है, अपने ही अक्स को प्रतिद्वंद्वी मान बैठते है।  अनेक लोग उस बन्दर का अनुसरण करते दीखते हैं, जो आईने के सामने से देख कर उसके पीछे खड़े किसी अन्य बन्दर से मिलने को लालायित नजर आता है।  कुल मिलाकर इंसान भ्रमित दशा में दुनिया को समझने का जतन  करता है।  समाज का दर्पण मान्यताओं का है, परिपाटीपूर्ण है और इन्ही की तह में संस्कृति छिपी हुई है।  संस्कृति अवधारणाओं पर आधारित सत्य है।  सत्य भी एसा जो मात्र परिलक्षित होता है।
एक व्यक्ति ने दुसरे व्यक्ति से पूछा " मिस्टर एक्स , कहाँ है ?"
दुसरे ने जवाब दिया " अभी उन्ही के चेंबर से निकल कर आ रहा हूँ। "
यह बात जानकर पहला व्यक्ति उनके चेंबर पर पहुंचा।  मगर वे वहां नहीं मिले।
अब सवाल उठता है कि सत्यता क्या है? क्या दूसरा व्यक्ति झूठ बोला था? जब वे वहां पहुंचे तो क्या मिस्टर एक्स ने स्थान छोड़ दिया था ?  कुछ भी रहा हो मगर सत्य एक अनुमान भर है।
तब सवाल ये उठता  है की सत्य आखिर है क्या ?
समय और परिस्थिति का जिस बस नहीं चले शायद वो सत्य कहलाए।  सत्य पहली तरह का अनुमान ही है।  इसे भ्रम या मयाजाल मान लेना भी उचित नहीं होगा।  सत्य अनुमान की तरह भ्रमित करता है।  एक दर्पण की तरह जो वास्तविक बिम्ब को प्रतिबिम्ब के स्वरुप में प्रस्तुत या रूपांकित करता है।
नै पीढ़ी  सत्यता से प्रेरित है।  वे अनुमान, अटकलों, अवधारणाओं या परिपाटीजन्य सत्य को बार बार नकारती है।  बुजुर्गों के पास कई बातों के कोई जवाब जब नहीं मिलते।
शकर की मिठास महसूस होती है , नजर नहीं आती।  कडुआ या कसैला शब्द पढ़ लेने से जबान का स्वाद नहीं बदलता।  शक्कर की मिठास को आदिकाल से मिठास ही माना गया यदि इसे कडुआ माना जाता तो क्या ? मान्यता में शक्कर कडुवी नहीं कहलाती ??? परिपाटी से चला शब्द जब हमें स्वीकार है इसीलिए शक्कर मीठी हुई ना ??
तो फिर संस्कारों के लिए परिपाटीजन्य शब्दों और परम्पराओं पर एतराज और संशय क्यों है भाई ??? 

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