गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

"आप", "नोटा" और फ्लोटिंग वोट"

देश के पांच राज्यों के चुनाव हाल ही में संपन्न हुए हैं।  भारतीय जनता पार्टी ने तीन तो कांग्रेस ने एक राज्य पर विजय का वरण किया। दिल्ली जो देश की राजधानी का प्रदेश जो शिक्षित राज्यो में माना जाता है, यहाँ त्रिशंकु स्थिति बनी है। 
रमन सिंह, वसुंधरा राजे, शिवराज के साथ नरेंद्र मोदी की लहर का असर इन चुनावो में महसूस किए जाने के साथ त्रिशंकु स्थिति के बावजूद दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी स्थिति सिंगल लार्जेस्ट पार्टी के रूप में दर्ज की है। सरकार बनाने के अंक गणित ने दिल्ली में इस कदर चौंका दिया है की सत्ता किसी भी दल के हाथ सीधे से नहीं गयी है।  
आम आदमी पार्टी यानि "आप" ने सिर्फ दिल्ली में ही चुनाव लड़ा और पहले मुकाबले में सत्तासीन कांग्रेस को हटा दिया तो भाजपा को उसकी प्रचंड लहर के बावजूद सत्तासीन होने से रोक दिया है। सत्ता पाने की होड़ में सभी दल अपने अपने वादों के साथ उपस्थित थे मगर मतदाताओं का रुझान इन वादों के प्रति नगण्य दिखलाई पड़ा।  कांग्रेस कि नीतिया देश में विदेशी निवेश के जरिये अप्रत्य़क्ष विदेशी शासन कि हमराह बनते दिखने लगी और घर में बैठे व्यक्ति को विदेशी निवेश के रिटर्न की  आहट  से भय पैदा होने लगा है।  ऐसे में कांग्रेस का विरोध तो जायज हो सकता है इसके चलते भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलना बड़ी बात नहीं थी। आप को मिलने वाला वोट भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ तो था ही साथ ही यह अण्णा के आंदोलन का समर्थन भी माना जा रहा है।  शासन चलाने कि अनुभवहीनता के चलते "आप" का विपक्ष में बैठने का निर्णय और किसी भी दल को समर्थन न देना या न लेने का निर्णय भी राजनितिक दलो कि नीतियों से सामंजस्य के विपरीत अर्थों  को ही प्रकट करता है।  
कांग्रेस का पूरा ध्यान युवाओं  को आगे लाने में लगा था।  राहुल और ज्योतिरादित्य को स्टार प्रचारक के रूप में इस बात को महसूस किया जा सकता है।  मीडिया ने भी राहुल बनाम मोदी का इलेक्शन मैनेजमेंट रोचक तरीके से प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने अपने कार्यो को श्रेष्ठ मानने  कि गलती कि और जनता की  कसमसाहट को दर किनार किया जिसका हश्र तो उसने प्रचंड हार के रूप में देखना तो दूर आपसी जूतम पैजार में अभव्यक्त करना प्रारम्भ कर दिया।  उतारे गए कांग्रेस प्रत्याशियों के प्रति जन भावना कांग्रेस के कार्यो के प्रति न होकर युवा ब्रिगेड को उभरने से रोकने की मानसिकता से दर्ज हुई।  स्थापित नेताओं के दुमछल्लों कि बात भी यहाँ चर्चा में हुई। सोनिया जी द्वारा बुलाई गई बैठक में भी कोई गम्भीर दृष्टिकोण स्थापित न होकर सेबोटेज का मसला ही उजागर रहा।  
देखा जाए तो सारे देश में पहली बार NOTA कि आमद दर्ज हुई।  हालांकि पहले NOTA  कि व्यवस्था से इंकार नहीं किया जा सकता है फिर भी इलेकट्रोनिक वोटिंग मशीन में पहचान का खुलासा न होने के चलते लोगो ने अपना वोट पार्टी के रूप में न बदलकर सीधे NOTA के रूप में अभिव्यक्त किया। राजस्थान में फ्लोटिंग वोट का असर पार्टीगत अभिरुचि में व्यक्त होता रहा है।  इस बार भी कांग्रेस को नकारते हुए यहाँ बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला।  फ्लोटिंग होने वाला वोट अब NOTA के रूप में भी अभिव्यक्त होने लगा है।  मध्य प्रदेश में जितना वोटिंग प्रतिशत बढ़ा लगभग उतना ही प्रतिशत वोट NOTA  में गिरा हुआ नजर आया है।  दिल्ली में जो प्रत्य्क्ष रूझान नजर आया है "आप" के स्वरुप में देश कि पार्टियों कि नीतियों के प्रति असहमति को भी इससे मजबूती मिलती है।  जनता की  मांगों को नकारने , व्यवस्थागत बदलावों पर रूझान न दिखाने का खामियाजा प्रमुख दलों को भुगतना पड़ा है।  प्रमुख दलों द्वारा मनचाहे तरीके से शासन न चले जनता की  साझेदारी सीधे रहे।  सिर्फ जन प्रतिनिधि चुन कर सदन में भेज देने से जनता के मनोगत उत्कर्ष भाव को सबलता नहीं मिलती यह अब राईट टू रिजेक्ट के रूप में विदित होती है।  
प्रमुख प्रत्याशियों की सीटों पर भी NOTA  का असर रहा।  शिवराज सिंह जी चौहान , वसुंधरा राजे को भी NOTA रिजेक्शन मिला होना पार्टियों के प्रति , उनकी नीतियों के प्रति जनता का विपरीत होना दिखलाई पड़ता है।  इसे महसूस किये जाने से नकारा जा सकता है फिर भी कहीं तो कुछ है जो NOTA  का विषय महत्वपूर्ण हो गया है।  
UPA  और NDA  गठबंधन के तौर तरीकों से भी जनता ने भ्रष्टाचार को महसूस किया है सीधे सता किसी भी महत्वपूर्ण राजनितिक दल से दूर रही है बावजूद इसके जनता कि भावनाओं को दर किनार किया जाना शायद  NOTA, राईट टू  रिजेक्ट , राईट टू  रिकाल जैसे तरीकों से हल हो पायेगा ऐसी सोच बनी है।  अब UPA  और NDA  का भी सत्ता में आ पाना लगभग तय नहीं है।  जनता कैसे अपने वोट को इस्तेमाल करेगी यह समय ही बतलायेगा मगर अण्णा  के आंदोलन को मिल रहा समर्थन जाहिर हो चूका है दिल्ली के चुनावों से।  "आप" को हलके में लेना भरी पड़ा यह बात भी उजागर हुई है।  अण्णा  नीतिगत विरोध के लिए सत्ता से दूर बने रहने वाली शख्सियत हैं उनकी टीम से निकल कर आम आदमी पार्टी के रूप में गतिविधि चला रहे दल का भी सत्ता का विपक्ष स्वीकारना प्रमुख राजनितिक दलों कि गतिविधियों पर अंकुश समान विदित है ऐसे में आगामी लोकसभा में "आप" का प्रदर्शन सबल विपक्ष रह पाएगा या नहीं? NOTA  क्या असर करेगा ? जैसे प्रश्नो के उत्तर तय नहीं है।  फिर भी कसक महसूस कर रहे व्यक्ति का रिप्रेजेंटेशन इन्ही दो साधनो में दिखलाई पड़ने कि सम्भावना अधिक है।  राजनैतिक दल किस तरह इस चुनौती को ले पाते है यह समय के साथ ही दिखेगा। 
जनता का मौन वोट कि ताकत के रूप में उभरता रहा है परन्तु इसकी कोई संगठात्मकता नहीं रही है जिससे इसका इस्तेमाल दोषपूर्ण तरीके से होता आया है।  आगामी समय में NOTA  राजनितिक दलों के प्रत्याशी चयन तक ही शायद सीमित न रहे।  अब वक्त है हमें मौन कि भाषा को सीखने का।  बयानो के बजाय अब मौन जो अधिक संवेदनशील हो चला है 













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